अग्निपुराण — अध्याय 370
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ सत्तरवाँ अध्याय
शरीर के अवयव
शरीरावयवविभागवर्णनं

अग्निदेव कहते हैं – वसिष्ठजी ! कान, त्वचा, नेत्र, जिह्वा और नासिका — ये ज्ञानेन्द्रियाँ हैं । आकाश सभी भूतों में व्यापक है । शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध – ये क्रमशः आकाश आदि पाँच भूतों के गुण हैं । गुदा, उपस्थ (लिङ्ग या योनि), हाथ, पैर और वाणी — ये ‘कर्मेन्द्रिय’ कहे गये हैं। मलत्याग, विषयजनित आनन्द का अनुभव, ग्रहण, चलन तथा वार्तालाप — ये क्रमशः उपर्युक्त इन्द्रियों के कार्य हैं । पाँच कर्मेन्द्रिय, पाँच ज्ञानेन्द्रिय, पाँच इन्द्रियों के विषय, पाँच महाभूत, मन, बुद्धि, आत्मा ( महत्तत्त्व), अव्यक्त (मूल प्रकृति ) — ये चौबीस तत्त्व हैं । इन सबसे परे है — पुरुष । वह इनसे संयुक्त भी रहता है और पृथक् भी; जैसे मछली और जल — ये दोनों एक साथ संयुक्त भी रहते हैं और पृथक् भी। रजोगुण, तमोगुण और सत्त्वगुण — ये अव्यक्त के आश्रित हैं । अन्तःकरण की उपाधि से युक्त पुरुष ‘जीव’ कहलाता है, वही निरुपाधिक स्वरूप से ‘परब्रह्म’ कहा गया है, जो सबका कारण है । जो मनुष्य इस परम पुरुष को जान लेता है, वह परमपद को प्राप्त होता है । इस शरीर के भीतर सात ‘आशय’ माने गये हैं — पहला रुधिराशय, दूसरा श्लेष्माशय, तीसरा आमाशय, चौथा पित्ताशय, पाँचवाँ पक्वाशय, छठा वाताशय और सातवाँ मूत्राशय । स्त्रियों के इन सात के अतिरिक्त एक आठवाँ आशय भी होता है, जिसे ‘गर्भाशय’ कहते हैं। ‘अग्नि से पित्त और पित्त से पक्वाशय होता है। ऋतुकाल में स्त्री की योनि कुछ फैल जाती है। उसमें स्थापित किया हुआ वीर्य गर्भाशय तक पहुँच जाता है। गर्भाशय कमल के आकार का होता है। वही अपने में रज और वीर्य को धारण करता है । वीर्य से शरीर और समयानुसार उसमें केश प्रकट होते हैं । ऋतुकाल में भी यदि योनि वात, पित्त और कफ से आवृत्त हो तो उसमें विकास (फैलाव ) नहीं आता। (ऐसी दशा में वह गर्भ धारण के योग्य नहीं रहती ।) महाभाग ! बुक्क से पुक्कस, प्लीहा, यकृत्, कोष्ठाङ्ग, हृदय, व्रण तथा तण्डक होते हैं। ये सभी आशय में निबद्ध हैं । प्राणियों के पकाये जाने वाले रस के सार से प्लीहा और यकृत् होते हैं । धर्म के ज्ञाता वसिष्ठजी ! रक्त के फेनसे  पुक्कस की उत्पत्ति होती है । इसी प्रकार रक्त, पित्त तथा तण्डक भी उत्पन्न होते हैं। मेदा और रक्त के प्रसार से बुक्का की उत्पत्ति होती है। रक्त और मांस के प्रसार से देहधारियों की आँतें बनती हैं। पुरुष की आँतों का परिमाण साढ़े तीन व्याम बताया जाता है और वेदवेत्ता पुरुष स्त्रियों की आँतें तीन व्याम लंबी बतलाते हैं । रक्त और वायु के संयोग से काम का उदय होता है । कफ के प्रसार से हृदय प्रकट होता है । उसका आकार कमल के समान है। उसका मुख नीचे की ओर होता है तथा उसके मध्य का जो आकाश है, उसमें जीव स्थित रहता है। चेतनता से सम्बन्ध रखने वाले सभी भावों की स्थिति वही है । हृदय वामभाग में प्लीहा और दक्षिणभाग में यकृत् है तथा इसी प्रकार हृदयकमल के दक्षिणभाग में क्लोम (फुफ्फुस ) — की भी स्थिति बतायी गयी है । इस शरीर में कफ और रक्त को प्रवाहित करने वाले जो-जो स्रोत हैं, उनके भूतानुमान से इन्द्रियों की उत्पत्ति होती है। नेत्रमण्डल का जो श्वेतभाग है, वह कफ से उत्पन्न होता है । उसका प्राकट्य पिता के वीर्य से माना गया है तथा नेत्रों का जो कृष्ण — भाग है, वह माता के रज एवं वात के अंश से प्रकट होता है। त्वचामण्डल की उत्पत्ति पित्त से होती है । इसे माता और पिता – दोनों के अंश से उत्पन्न समझना चाहिये । मांस, रक्त और कफ से जिह्वा का निर्माण होता है। मेदा, रक्त, कफ और मांस से अण्डकोष की उत्पत्ति होती है । प्राण के दस आश्रय जानने चाहिये – मूर्द्धा, हृदय, नाभि, कण्ठ, जिह्वा, शुक्र, रक्त, गुद, वस्ति (मूत्राशय) और गुल्फ (पाँव की गाँठ या घुट्टी) तथा ‘कण्डरा ‘ (नसें ) सोलह बतायी गयी हैं । दो हाथ में, दो पैर में, चार पीठ में, चार गले में तथा चार पैर से लेकर सिर तक समूचे शरीर में हैं । इसी प्रकार ‘जाल’ भी सोलह बताये गये हैं । मांसजाल, स्नायुजाल, शिराजाल और अस्थिजाल — ये चारों पृथक्-पृथक् दोनों कलाइयों और पैर की दोनों गाँठों में परस्पर आबद्ध हैं । इस शरीर में छः कूर्च माने गये हैं। मनीषी पुरुषों ने दोनों हाथ, दोनों पैर, गला और लिङ्ग — इन्हीं में उनका स्थान बताया है। पृष्ठ के मध्यभाग  जो मेरुदण्ड है, उसके निकट चार मांसमयी डोरियाँ हैं तथा उतनी ही पेशियाँ भी हैं, जो उन्हें बाँधे रखती हैं । सात सीरणियाँ हैं । इनमें से पाँच तो मस्तक के आश्रित हैं और एक-एक मेढ्र (लिङ्ग) तथा जिह्वा में है। हड्डियाँ अठारह हजार हैं । सूक्ष्म और स्थूल — दोनों मिलाकर चौसठ दाँत हैं। बीस नख हैं । इनके अतिरिक्त हाथ और पैरों की शलाकाएँ हैं, जिनके चार स्थान हैं । अँगुलियों में साठ, एड़ियों में दो, गुल्फों में चार, अरत्नियों में चार और जंघों में भी चार ही हड्डियाँ हैं। घुटनों में दो, गालों में दो, ऊरुओं में दो तथा फलकों के मूलभाग में भी दो ही हड्डियाँ हैं । इन्द्रियों के स्थानों तथा श्रोणिफलक में भी इसी प्रकार दो-दो हड्डियाँ बतायी गयी हैं। भग में भी थोड़ी-सी हड्डियाँ हैं । पीठ में पैंतालीस और गले में भी पैंतालीस हैं। गले की हसली, ठोड़ी तथा उसकी जड़ में दो-दो अस्थियाँ हैं । ललाट, नेत्र, कपोल, नासिका, चरण, पसली, तालु तथा अर्बुद — इन सबमें सूक्ष्मरूप से बहत्तर हड्डियाँ हैं । मस्तक में दो शङ्ख और चार कपाल हैं तथा छाती में सत्रह हड्डियाँ हैं । संधियाँ दो सौ दस बतायी गयी हैं । इनमें से शाखाओं में अड़सठ तथा उनसठ हैं और अन्तरा में तिरासी संधियाँ बतायी गयी हैं । स्नायु की संख्या नौ सौ है, जिनमें से अन्तराधि में दो सौ तीस हैं, सत्तर ऊर्ध्वगामी हैं और शाखाओं में छः सौ स्नायु हैं। पेशियाँ पाँच सौ बतलायी गयी हैं । इनमें चालीस तो ऊर्ध्वगामिनी हैं, चार सौ शाखाओं में हैं और साठ अन्तराधि में हैं। स्त्रियों की मांसपेशियाँ पुरुषों की अपेक्षा सत्ताईस अधिक हैं । इनमें दस दोनों स्तनों में, तेरह योनि में तथा चार गर्भाशय में स्थित हैं। देहधारियों के शरीर में तीस हजार नौ तथा छप्पन हजार नाड़ियाँ हैं । जैसे छोटी-छोटी नालियाँ क्यारियों में पानी बहाकर ले जाती हैं, उसी प्रकार वे नाड़ियाँ सम्पूर्ण शरीर में रस को प्रवाहित करती हैं। क्लेद और लेप आदि उन्हीं के कार्य हैं। महामुने ! इस देह में बहत्तर करोड़ छिद्र या रोमकूप हैं तथा मज्जा, मेदा, वसा, मूत्र, पित्त, श्लेष्मा, मल, रक्त और रस — इनकी क्रमशः अञ्जलियाँ’ मानी गयी हैं। इनमें से पूर्व – पूर्व अञ्जली की अपेक्षा उत्तरोत्तर सभी अञ्जलियाँ मात्रा में डेढ़ गुनी अधिक हैं । एक अञ्जलि में आधी वीर्य की और आधी ओज की है । विद्वानों ने स्त्रियों के रज की चार अञ्जलियाँ बतायी हैं । यह शरीर मल और दोष आदि का पिण्ड है, ऐसा समझकर अपने अन्तःकरण में इसके प्रति होने वाली आसक्ति का त्याग करना चाहिये ॥ १-४३ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘शरीरावयव विभाग का वर्णन’ नामक तीन सौ सत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७० ॥

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