July 25, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 373 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ तिहत्तरवाँ अध्याय आसन, प्राणायाम और प्रत्याहार का वर्णन आसनप्राणायामप्रत्याहाराः अग्निदेव कहते हैं — मुने। पद्मासन आदि नाना प्रकार के ‘आसन’ बताये गये हैं। उनमें से कोई भी आसन बाँधकर परमात्मा का चिन्तन करना चाहिये। पहले किसी पवित्र स्थान में अपने बैठने के लिये स्थिर आसन बिछावे, जो न अधिक ऊँचा हो और न अधिक नीचा। सबसे नीचे कुश का आसन हो, उसके ऊपर मृगचर्म और मृगचर्म के ऊपर वस्त्र बिछाया गया हो। उस आसन पर बैठकर मन और इन्द्रियों की चेष्टाओं को रोकते हुए चित्त को एकाग्र करे तथा अन्तःकरण की शुद्धि के लिये योगाभ्यास में संलग्न हो जाय। उस समय शरीर, मस्तक और गले को अविचलभाव से एक सीध में रखते हुए स्थिर बैठे। केवल अपनी नासिका के अग्रभाग को देखे; अन्य दिशाओं की ओर दृष्टिपात न करे। दोनों पैरों की एड़ियों से अण्डकोष और लिङ्ग की रक्षा करते हुए दोनों ऊरुओं (जाँघों) के ऊपर भुजाओं को यत्नपूर्वक तिरछी करके रखे तथा बायें हाथ की हथेली पर दाहिने हाथ के पृष्ठभाग को स्थापित करे और मुँह को कुछ ऊँचा करके सामने की ओर स्थिर रखे। इस प्रकार बैठकर प्राणायाम करना चाहिये ॥ १-५१/२ ॥’ अपने शरीर के भीतर रहने वाली वायु को ‘प्राण’ कहते हैं। उसे रोकने का नाम है — ‘आयाम’। अतः ‘प्राणायाम’ का अर्थ हुआ — ‘प्राणवायु को रोकना’। उसकी विधि इस प्रकार है— अपनी अंगुली से नासिका के एक छिद्र को दबाकर दूसरे छिद्र से उदरस्थित वायु को बाहर निकाले। ‘रेचन’ अर्थात् बाहर निकालने के कारण इस क्रिया को ‘रेचक’ कहते हैं। तत्पश्चात् चमड़े की धौंकनी के समान शरीर को बाहरी वायु से भरे। भर जाने पर कुछ काल तक स्थिरभाव से बैठा रहे। बाहर से वायु की पूर्ति करने के कारण इस क्रिया का नाम ‘पूरक’ है। वायु भर जाने के पश्चात् जब साधक न तो भीतरी वायु को छोड़ता है और न बाहरी वायु को ग्रहण ही करता है, अपितु भरे हुए घड़े की भाँति अविचल भाव से स्थिर रहता है, उस समय कुम्भवत् स्थिर होने के कारण उसकी वह चेष्टा ‘कुम्भक’ कहलाती है। बारह मात्रा (पल) का एक ‘उद्धात’ होता है। इतनी देर तक वायु को रोकना कनिष्ठ श्रेणी का प्राणायाम है। दो उद्धात अर्थात् चौबीस मात्रा तक किया जाने वाला कुम्भक मध्यम श्रेणी का माना गया है तथा तीन उद्धात यानी छत्तीस मात्रा तक का कुम्भक उत्तम श्रेणी का प्राणायाम है। जिससे शरीर से पसीने निकलने लगें, कँपकँपी छा जाय तथा अभिघात लगने लगे, वह प्राणायाम अत्यन्त उत्तम है। प्राणायाम की भूमिकाओं में से जिस पर भलीभाँति अधिकार न हो जाय, उनपर सहसा आरोहण न करे, अर्थात् क्रमशः अभ्यास बढ़ाते हुए उत्तरोत्तर भूमिकाओं में आरूढ़ होने का यत्न करे। प्राण को जीत लेने पर हिचकी और साँस आदि के रोग दूर हो जाते हैं तथा मल-मूत्रादि के दोष भी धीरे धीरे कम हो जाते हैं। नीरोग होना, तेज चलना, मन में उत्साह होना, स्वर में माधुर्य आना, बल बढ़ना, शरीरवर्ण में स्वच्छता का आना तथा सब प्रकार के दोषों का नाश हो जाना — ये प्राणायाम से होने वाले लाभ हैं। प्राणायाम दो तरह के होते हैं — ‘ अगर्भ’ और ‘सगर्भ’। जप और ध्यान के बिना जो प्राणायाम किया जाता है, उसका नाम ‘अगर्भ’ है तथा जप और ध्यान के साथ किये जाने वाले प्राणायाम को ‘सगर्भ’ कहते हैं। इन्द्रियों पर विजय पाने के लिये सगर्भ प्राणायाम ही उत्तम होता है; उसीका अभ्यास करना चाहिये। ज्ञान और वैराग्य से युक्त होकर प्राणायाम के अभ्यास से इन्द्रियों को जीत लेने पर सब पर विजय प्राप्त हो जाती है। जिसे ‘स्वर्ग’ और ‘नरक’ कहते हैं, वह सब इन्द्रियाँ ही हैं। वे ही वश में होने पर स्वर्ग में पहुँचाती हैं और स्वतन्त्र छोड़ देने पर नरक में ले जाती हैं। शरीर को ‘रथ’ कहते हैं, इन्द्रियाँ ही उसके ‘घोड़े’ हैं, मन को ‘सारथि’ कहा गया है और प्राणायाम को ‘चाबुक’ माना गया है। ज्ञान और वैराग्य की बागडोर में बँधे हुए मनरूपी घोड़े को प्राणायाम से आबद्ध करके जब अच्छी तरह काबू में कर लिया जाता है तो वह धीरे-धीरे स्थिर हो जाता है। जो मनुष्य सौ वर्षों से कुछ अधिक काल तक प्रतिमास कुश के अग्रभाग से जल की एक बूँद लेकर उसे पीकर रह जाता है, उसकी वह तपस्या और प्राणायाम दोनों बराबर हैं। विषयों के समुद्र में प्रवेश करके वहाँ फैंसी हुई इन्द्रियों को जो आहूत करके, अर्थात् लौटाकर अपने अधीन करता है, उसके इस प्रयत्न को ‘प्रत्याहार’ कहते हैं। जैसे जल में डूबा हुआ मनुष्य उससे निकलने का प्रयत्न करता है, उसी प्रकार संसार-समुद्र में डूबे हुए अपने-आपको स्वयं ही निकालने का प्रयत्न करे। भोगरूपी नदी का वेग अत्यन्त बढ़ जाने पर उससे बचने के लिये अत्यन्त सुदृढ़ ज्ञानरूपी वृक्ष का आश्रय लेना चाहिये ॥ ६-२१ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘आसन, प्राणायाम तथा प्रत्याहार का वर्णन’ नामक तौन सी तिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७३ ॥ Content is available only for registered users. Please login or register Please follow and like us: Related Discover more from Vadicjagat Subscribe to get the latest posts sent to your email. Type your email… Subscribe