अग्निपुराण – अध्याय 376
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ छिहत्तरवाँ अध्याय
समाधि
समाधिः

अग्निदेव कहते हैं — जो चैतन्यस्वरूप से युक्त और प्रशान्त समुद्र की भाँति स्थिर हो, जिसमें आत्मा के सिवा अन्य किसी वस्तु की प्रतीति न होती हो, उस ध्यान को ‘समाधि’ कहते हैं। जो ध्यान के समय अपने चित्त को ध्येय में लगाकर वायुहीन प्रदेश में जलती हुई अग्निशिखा की भाँति अविचल एवं स्थिरभाव से बैठा रहता है, वह योगी ‘समाधिस्थ’ कहा गया है। जो न सुनता है, न सूंघता है, न देखता है, न रसास्वादन करता है, न स्पर्श का अनुभव करता है, न मन में संकल्प उठने देता है, न अभिमान करता है और न बुद्धि से दूसरी किसी वस्तु को जानता ही है, केवल काष्ठ की भाँति अविचलभाव से ध्यान में स्थित रहता है, ऐसे ईश्वरचिन्तनपरायण पुरुष को ‘समाधिस्थ’ कहते हैं। जैसे वायुरहित स्थान में रखा हुआ दीपक कम्पित नहीं होता, यही उस समाधिस्थ योगी के लिये उपमा मानी गयी है। जो अपने आत्मस्वरूप श्रीविष्णु के ध्यान में संलग्न रहता है, उसके सामने अनेक दिव्य विघ्न उपस्थित होते हैं। वे सिद्धि की सूचना देने वाले हैं। साधक ऊपर से नीचे गिराया जाता है, उसके कान में पीड़ा होती है, अनेक प्रकार के धातुओं के दर्शन होते हैं तथा उसे अपने शरीर में बड़ी वेदना का अनुभव होता है। देवतालोग उस योगी के पास आकर उससे दिव्य भोग स्वीकार करने की प्रार्थना करते हैं, राजा पृथ्वी का राज्य देने की बात कहते और बड़े-बड़े धनाध्यक्ष धन का लोभ दिखाते हैं। वेद आदि सम्पूर्ण शास्त्र स्वयं ही (बिना पढ़े) उसकी बुद्धि में स्फुरित हो जाते हैं। उसके द्वारा मनोनुकूल छन्द और सुन्दर विषय से युक्त उत्तम काव्य की रचना होने लगती है। दिव्य रसायन, दिव्य ओषधियाँ तथा सम्पूर्ण शिल्प और कलाएँ उसे प्राप्त हो जाती हैं। इतना ही नहीं, देवेश्वरों की कन्याएँ और प्रतिभा आदि सद्‌गुण भी उसके पास बिना बुलाये जाते हैं; किंतु जो इन सबको तिनके के समान निस्सार मानकर त्याग देता है, उसी पर भगवान् विष्णु प्रसन्न होते हैं ॥ १-१० ॥’

अणिमा आदि गुणमयी विभूतियों से युक्त योगी पुरुष को उचित है कि वह शिष्य को ज्ञान दे। इच्छानुसार भोगों का उपभोग करके लययोग की रीति से शरीर का परित्याग करे और विज्ञानानन्दमय ब्रह्म एवं ईश्वररूप अपने आत्मा में स्थित हो जाय। जैसे मलिन दर्पण शरीर का प्रतिबिम्ब ग्रहण करने में असमर्थ होने के कारण शरीर का ज्ञान कराने की क्षमता नहीं रखता, उसी प्रकार जिसका अन्तःकरण परिपक्व (वासनाशून्य) नहीं है, वह आत्मज्ञान प्राप्त करने में असमर्थ है। देह सब प्रकार के रोगों और दुःखों का आश्रय है; इसलिये देहाभिमानी जीव अपने शरीर में वेदना का अनुभव करता है। परंतु जो पुरुष योगयुक्त है, उसे योग के ही प्रभाव से किसी भी क्लेश का अनुभव नहीं होता। जैसे एक ही आकाश घट आदि भिन्न-भिन्न उपाधियों में पृथक् पृथक् सा प्रतीत होता है और एक ही सूर्य अनेक जलपात्रों में अनेक-सा जान पड़ता है, उसी प्रकार आत्मा एक होता हुआ भी अनेक शरीरों में स्थित होने के कारण अनेकवत् प्रतीत होता है। आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी — ये पाँचों भूत ब्रह्म के ही स्वरूप हैं। ये सम्पूर्ण लोक आत्मा ही है; आत्मा से ही चराचर जगत्‌ की अभिव्यक्ति होती है। जैसे कुम्हार मिट्टी, डंडा और चाक के संयोग से घड़ा बनाता है, अथवा जिस प्रकार घर बनाने वाला मनुष्य तृण, मिट्टी और काठ से घर तैयार करता है, उसी प्रकार जीवात्मा इन्द्रियों को साथ ले, कार्य करण-संघात को एकचित्त करके भिन्न-भिन्न योनियों में अपने को उत्पन्न करता है। कर्म से, दोष और मोह से तथा स्वेच्छा से ही जीव बन्धन में पड़ता है और ज्ञान से ही उसकी मुक्ति होती है। योगी पुरुष धर्मानुष्ठान करने से कभी रोग का भागी नहीं होता। जैसे बत्ती, तैलपात्र और तैल — इन तीनों के संयोग से ही दीपक की स्थिति है — इनमें से एक के अभाव में भी दीपक रह नहीं सकता, उसी प्रकार योग और धर्म के बिना विकार (रोग) की प्राप्ति देखी जाती है और इस प्रकार अकाल में ही प्राणों का क्षय हो जाता है ॥ ११-१९१/२

हमारे हृदय के भीतर जो दीपक की भाँति प्रकाशमान आत्मा है, उसकी अनन्त किरणें फैली हुई हैं, जो श्वेत, कृष्ण, पिङ्गल, नील, कपिल, पीत और रक्त वर्ण की हैं। उनमें से एक किरण ऐसी है, जो सूर्यमण्डल को भेदकर सीधे ऊपर को चली गयी है और ब्रह्मलोक को भी लाँघ गयी है; उसी के मार्ग से योगी पुरुष परमगति को प्राप्त होता है। उसके सिवा और भी सैकड़ों किरणें ऊपर की ओर स्थित हैं। उनके द्वारा मनुष्य भिन्न-भिन्न देवताओं के निवासभूत लोकों में जाता है। जो एक ही रंग की बहुत-सी किरणें नीचे की और स्थित हैं, उनकी कान्ति बड़ी कोमल है। उन्हीं के द्वारा जीव इस लोक में कर्मभोग के लिये आता है। समस्त ज्ञानेन्द्रियाँ, मन, कर्मेन्द्रियाँ, अहंकार, बुद्धि, पृथिवी आदि — पाँच भूत तथा अव्यक्त प्रकृति — ये ‘क्षेत्र’ कहलाते हैं और आत्मा ही इस क्षेत्र का ज्ञान रखने वाला ‘क्षेत्रज्ञ’ कहलाता है। वही सम्पूर्ण भूतों का ईश्वर है। सत्, असत् तथा सदसत् — सब उसी के स्वरूप हैं। व्यक्त प्रकृति से समष्टि बुद्धि (महत्तत्त्व) की उत्पत्ति होती है, उससे अहंकार उत्पन्न होता है, अहंकार से आकाश आदि पाँच भूत उत्पन्न होते हैं, जो उत्तरोत्तर एकाधिक गुणों वाले हैं। शब्द, स्पर्श, रूप, रस और गन्ध — ये क्रमशः उन पाँचों भूतों के गुण हैं। इनमें से जो भूत जिसके आश्रय में है, वह उसी में लीन होता है। सत्त्व, रज और तम — ये अव्यक्त प्रकृति के ही गुण हैं। जीव रजोगुण और तमोगुण से आविष्ट हो चक्र की भाँति घूमता रहता है।

जो सबका ‘आदि’ होता हुआ स्वयं ‘अनादि’ है, वही परमपुरुष परमात्मा है। मन और इन्द्रियों से जिसका ग्रहण होता है, वह ‘विकार’ (विकृत होने वाला प्राकृत तत्त्व कहलाता है। जिससे वेद, पुराण, विद्या, उपनिषद्, श्लोक, सूत्र, भाष्य तथा अन्य वाङ्मय की अभिव्यक्ति हुई है, वही ‘परमात्मा’ है। पितृयानमार्ग की उपवीथी से लेकर अगस्त्य तारा के बीच का जो मार्ग है, उससे संतान की कामना वाले अग्निहोत्री लोग स्वर्ग में जाते हैं। जो भलीभाँति दान में तत्पर तथा आठ गुणों से युक्त होते हैं, वे भी उसी भाँति यात्रा करते हैं। अठासी हजार गृहस्थ मुनि हैं, जो सब धर्मों के प्रवर्तक हैं; वे ही पुनरावृत्ति के बीज (कारण) माने गये हैं। वे सप्तर्षियों तथा नागवीधी के बीच के मार्ग से देवलोक में गये हैं। उतने ही (अर्थात् अठासी हजार) मुनि और भी हैं, जो सब प्रकार के आरामों से रहित हैं। वे तपस्या, ब्रह्मचर्य, आसक्ति, त्याग तथा मेधाशक्ति के प्रभाव से कल्पपर्यन्त भिन्न-भिन्न दिव्यलोकों में निवास करते हैं ॥ २०-३५ ॥

वेदों का निरन्तर स्वाध्याय, निष्काम यज्ञ, ब्रह्मचर्य, तप, इन्द्रिय-संयम, श्रद्धा, उपवास तथा सत्य-भाषण — ये आत्मज्ञान के हेतु हैं। समस्त द्विजातियों को उचित है कि वे सत्त्वगुण का आश्रय लेकर आत्मतत्त्व का श्रवण, मनन, निदिध्यासन एवं साक्षात्कार करें। जो इसे इस प्रकार जानते हैं, जो वानप्रस्थ आश्रम का आश्रय ले चुके हैं और परम श्रद्धा से युक्त हो सत्य की उपासना करते हैं, वे क्रमशः अग्नि, दिन, शुक्लपक्ष, उत्तरायण, देवलोक, सूर्यमण्डल तथा विद्युत्‌ के अभिमानी देवताओं के लोकों में जाते हैं। तदनन्तर मानस पुरुष वहाँ आकर उन्हें साथ ले जा, ब्रह्रालोक का निवासी बना देता है; उनकी इस लोक में पुनरावृत्ति नहीं होती। जो लोग यज्ञ, तप और दान से स्वर्गलोक पर अधिकार प्राप्त करते हैं, वे क्रमशः धूम, रात्रि, कृष्णपक्ष, दक्षिणायन, पितृलोक तथा चन्द्रमा के अभिमानी देवताओं के लोकों में जाते हैं और फिर आकाश, वायु एवं जल के मार्ग से होते हुए इस पृथ्वी पर लौट आते हैं। इस प्रकार वे इस लोक में जन्म लेते और मृत्यु के बाद पुनः उसी मार्ग से यात्रा करते हैं। जो जीवात्मा के इन दोनों मार्गों को नहीं जानता, वह साँप, पतंग अथवा कीड़ा- मकोड़ा होता है। हृदयाकाश में दीपक की भाँति प्रकाशमान ब्रह्म का ध्यान करने से जीव अमृतस्वरूप हो जाता है। जो न्याय से धन का उपार्जन करने वाला, तत्त्वज्ञान में स्थित, अतिथि-प्रेमी, श्राद्धकर्ता तथा सत्यवादी है, वह गृहस्थ भी मुक्त हो जाता है ॥ ३६-४४ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘समाधिनिरूपण’ नामक तीन सौ छिहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३७६ ॥

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