अग्निपुराण – अध्याय 381
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ इक्यासीवाँ अध्याय
गीता-सार
गीतासारः

अग्निदेव कहते हैं — अब मैं गीता का सार बतलाऊँगा, जो समस्त गीता का उत्तम-से-उत्तम अंश है। पूर्वकाल में भगवान् श्रीकृष्ण ने अर्जुन को उसका उपदेश दिया था। वह भोग तथा मोक्ष दोनों को देने वाला है ॥ १ ॥

श्रीभगवान् ने कहा — अर्जुन! जिसका प्राण चला गया है अथवा जिसका प्राण अभी नहीं गया है, ऐसे मरे हुए अथवा जीवित किसी भी देहधारी के लिये शोक करना उचित नहीं है; क्योंकि आत्मा अजन्मा, अजर, अमर तथा अभेद्य है, इसलिये शोक आदि को छोड़ देना चाहिये। विषयों का चिन्तन करने वाले पुरुष की उनमें आसक्ति हो जाती है; आसक्ति से काम, काम से क्रोध और क्रोध से अत्यन्त मोह (विवेक का अभाव) होता है। मोह से स्मरणशक्ति का ह्रास और उससे बुद्धि का नाश हो जाता है। बुद्धि के नाश से उसका सर्वनाश हो जाता है। सत्पुरुषों का सङ्ग करने से बुरे सङ्ग छूट जाते हैं- (आसक्तियाँ दूर हो जाती हैं)। फिर मनुष्य अन्य सब कामनाओं का त्याग करके केवल मोक्ष की कामना रखता है। कामनाओं के त्याग से मनुष्य की आत्मा अर्थात् अपने स्वरूप में स्थिति होती है, उस समय वह ‘स्थिरप्रज्ञ’ कहलाता है। सम्पूर्ण प्राणियों के लिये जो रात्रि है, अर्थात् समस्त जीव जिसकी ओर से बेखबर होकर सो रहे हैं, उस परमात्मा के स्वरूप में भगवत्प्रास संयमी (योगी) पुरुष जागता रहता है तथा जिस क्षणभङ्गुर सांसारिक सुख में सब भूत-प्राणी जागते हैं, अर्थात् जो विषय भोग उनके सामने दिन के समान प्रकट हैं, वह ज्ञानी मुनि के लिये रात्रि के ही समान है। ‘जो अपने-आपमें ही संतुष्ट है, उसके लिये कोई कर्तव्य शेष नहीं है। इस संसार में उस आत्माराम पुरुष को न तो कुछ करने से प्रयोजन है और न न करने से ही। महाबाहो। जो गुण-विभाग और कर्म-विभाग के तत्त्व को जानता है, वह यह समझकर कि सम्पूर्ण गुण गुणों में ही बरत रहे हैं, कहीं आसक्त नहीं होता। अर्जुन। तुम ज्ञानरूपी नौका का सहारा लेने से निश्चय ही सम्पूर्ण पापों को तर जाओगे। ज्ञानरूपी अग्नि सब कर्मों को जलाकर भस्म कर डालती है। जो सब कर्मों को परमात्मा में अर्पण करके आसक्ति छोड़कर कर्म करता है, वह पाप से लिप्त नहीं होता — ठीक उसी तरह जैसे कमल का पत्ता पानी से लिप्त नहीं होता। जिसका अन्तःकरण योगयुक्त है-परमानन्दमय परमात्मा में स्थित है तथा जो सर्वत्र समान दृष्टि रखने वाला है, वह योगी आत्मा को सम्पूर्ण भूतों में तथा सम्पूर्ण भूतों को आत्मा में देखता है। योगभ्रष्ट पुरुष शुद्ध आचार-विचार वाले श्रीमानों (धनवानों) के घर में जन्म लेता है। तात! कल्याणमय शुभ कर्मों का अनुष्ठान करने वाला पुरुष कभी दुर्गति को नहीं प्राप्त होता ॥ २-१११/२

“मेरी यह त्रिगुणमयी माया अलौकिक है; इसका पार पाना बहुत कठिन है। जो केवल मेरी शरण लेते हैं, वे ही इस माया को लाँघ पाते हैं। भरतश्रेष्ठ ! आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी और ज्ञानी ये चार प्रकार के मनुष्य मेरा भजन करते हैं। इनमें से ज्ञानी तो मुझसे एकीभूत होकर स्थित रहता है। अविनाशी परम-तत्त्व (सच्चिदानन्दमय परमात्मा) ‘ब्रह्म’ है, स्वभाव अर्थात् जीवात्मा को ‘अध्यात्म’ कहते हैं, भूतों की उत्पत्ति और वृद्धि करने वाले विसर्ग का (यज्ञ-दान आदि के निमित्त किये जाने वाले द्रव्यादि के त्याग का) नाम ‘कर्म’ है, विनाशशील पदार्थ ‘अधिभूत’ है तथा पुरुष (हिरण्यगर्भ) ‘अधिदैवत’ है। देहधारियों में श्रेष्ठ अर्जुन! इस देह के भीतर मैं वासुदेव ही ‘अधियज्ञ’ हूँ। अन्तकाल में मेरा स्मरण करने वाला पुरुष मेरे स्वरूप को प्राप्त होता है, इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। मनुष्य अन्तकाल में जिस-जिस भाव का स्मरण करते हुए अपने देह का परित्याग करता है, उसी को वह प्राप्त होता है। मृत्यु के समय जो प्राणों को भौंहों के मध्य में स्थापित करके ‘ओम्’ — इस एकाक्षर ब्रह्म का उच्चारण करते हुए देहत्याग करता है, वह मुझ परमेश्वर को ही प्राप्त करता है। ब्रह्माजी से लेकर तुच्छ कीट तक जो कुछ दिखायी देता है, सब मेरी ही विभूतियाँ हैं। जितने भी श्रीसम्पन्न और शक्तिशाली प्राणी हैं, सब मेरे अंश हैं। ‘मैं अकेला ही सम्पूर्ण विश्व के रूप में स्थित हूँ’- ऐसा जानकर मनुष्य मुक्त हो जाता है” ॥ १२-१९ ॥

“यह शरीर ‘क्षेत्र’ है; जो इसे जानता है, उसको ‘क्षेत्रज्ञ’ कहा गया है। ‘क्षेत्र’ और ‘क्षेत्रज्ञ’ को जो यथार्थरूप से जानना है, वही मेरे मत में ‘ज्ञान’ है। पाँच महाभूत, अहंकार, बुद्धि, अव्यक्त (मूलप्रकृति), दस इन्द्रियाँ, एक मन, पाँच इन्द्रियों के विषय, इच्छा, द्वेष, सुख, दुःख, स्थूल शरीर, चेतना और धृति — यह विकारों सहित ‘क्षेत्र’ है, जिसे यहाँ संक्षेप से बतलाया गया है। अभिमानशून्यता, दम्भ का अभाव, अहिंसा, क्षमा, सरलता, गुरुसेवा, बाहर-भीतर की शुद्धि, अन्तःकरण की स्थिरता, मन, इन्द्रिय एवं शरीर का निग्रह, विषय-भोगों में आसक्ति का अभाव, अहंकार का न होना, जन्म, मृत्यु, जरा तथा रोग आदि में दुःखरूप दोष का बारंबार विचार करना, पुत्र, स्त्री और गृह आदि में आसक्ति और ममता का अभाव, प्रिय और अप्रिय की प्राप्ति में सदा ही समानचित्त रहना (हर्ष-शोक के वशीभूत न होना), मुझ परमेश्वर में अनन्य भाव से अविचल भक्ति का होना, पवित्र एवं एकान्त स्थान में रहने का स्वभाव, विषयी मनुष्यों के समुदाय में प्रेम का अभाव, अध्यात्म ज्ञान में स्थिति तथा तत्त्व-ज्ञानस्वरूप परमेश्वर का निरन्तर दर्शन — यह सब ‘ज्ञान’ कहा गया है और जो इसके विपरीत है, वह ‘अज्ञान’ है” ॥ २०-२७ ॥

“अब जो ‘ज्ञेय’ अर्थात् जानने के योग्य है, उसका वर्णन करूँगा, जिसको जानकर मनुष्य अमृत-स्वरूप परमात्मा को प्राप्त होता है। ‘ तत्त्व’ अनादि है और ‘परब्रह्म ‘के नाम से प्रसिद्ध है। उसे न ‘सत्’ कहा जा सकता है, न ‘असत्’ (वह इन दोनों से विलक्षण है।) उसके सब हाथ-पैर हैं, सब ओर नेत्र, सिर और मुख तथा सब ओर कान हैं। वह संसार में सबको व्याप्त करके स्थित है। सब इन्द्रियों से रहित होकर भी समस्त इन्द्रियों के विषयों को जानने वाला है। सबका धारण-पोषण करने वाला होकर आसक्तिरहित है तथा गुणों का भोक्ता होकर ‘निर्गुण’ है। वह परमेश्वर सम्पूर्ण प्राणियों के बाहर और भीतर विद्यमान है। ‘चर’ और ‘अचर’ सब उसी के स्वरूप हैं। सूक्ष्म होने के कारण वह ‘अविज्ञेय’ है। वही निकट है और वही दूर। यद्यपि वह विभागरहित है (आकाश की भाँति अखण्डरूप से सर्वत्र परिपूर्ण है), तथापि सम्पूर्ण भूतों में विभक्त पृथक् पृथक् स्थित हुआ सा प्रतीत होता है। उसे विष्णुरूप से सब प्राणियों का पोषक, रुद्ररूप से सबका संहारक और ब्रह्मा के रूप से सबको उत्पन्न करने वाला जानना चाहिये। वह सूर्य आदि ज्योतियों की भी ज्योति (प्रकाशक) है। उसकी स्थिति अज्ञानमय अन्धकार से परे बतलायी जाती है। वह परमात्मा ज्ञानस्वरूप, जानने के योग्य, तत्त्वज्ञान से प्राप्त होने वाला और सबके हृदय में स्थित है” ॥ २८-३३ ॥

“उस परमात्मा को कितने ही मनुष्य सूक्ष्मबुद्धि से ध्यान के द्वारा अपने अन्तःकरण में देखते हैं। दूसरे लोग सांख्ययोग के द्वारा तथा कुछ अन्य मनुष्य कर्मयोग के द्वारा देखते हैं। इनके अतिरिक्त जो मन्द बुद्धि वाले साधारण मनुष्य हैं, वे स्वयं इस प्रकार न जानते हुए भी दूसरे ज्ञानी पुरुषों से सुनकर ही उपासना करते हैं। वे सुनकर उपासना में लगने वाले पुरुष भी मृत्युरूप संसार सागर से निश्चय ही पार हो जाते हैं। सत्त्वगुण से ज्ञान, रजोगुण से लोभ तथा तमोगुण से प्रमाद, मोह और अज्ञान उत्पन्न होते हैं। गुण ही गुणों में बर्तते हैं — ऐसा समझकर जो स्थिर रहता है, अपनी स्थिति से विचलित नहीं होता, जो मान- अपमान में तथा मित्र और शत्रुपक्ष में भी समान भाव रखता है, जिसने कर्तुत्व के अभिमान को त्याग दिया है, वह ‘निर्गुण’ (गुणातीत) कहलाता है।

जिसकी जड़ ऊपर की ओर (अर्थात् परमात्मा है) और ‘शाखा’ नीचे की ओर (यानी ब्रह्माजी आदि) हैं, उस संसाररूपी अश्वत्थ वृक्ष को अनादि प्रवाहरूप से ‘अविनाशी’ कहते हैं। वेद उसके पत्ते हैं। जो उस वृक्ष को मूलसहित यथार्थरूप से जानता है, वही वेद के तात्पर्य को जानने वाला है। इस संसार में प्राणियों की सृष्टि दो प्रकार की है — एक ‘दैवी’ — देवताओं के से स्वभाववाली और दूसरी ‘आसुरी’ — असुरों के— से स्वभाववाली। अतः मनुष्यों के अहिंसा आदि सद्‌गुण और क्षमा ‘दैवी सम्पत्ति’ है। ‘आसुरी सम्पत्ति ‘से जिसकी उत्पत्ति हुई है, उसमें न शौच होता है, न सदाचार। क्रोध, लोभ और काम — ये नरक देने वाले हैं, अतः इन तीनों को त्याग देना चाहिये। सत्त्व आदि गुणों के भेद से यज्ञ, तप और दान — तीन प्रकार के माने गये हैं (सात्त्विक, राजस और तामस)। ‘सात्त्विक’ अन्न आयु, बुद्धि, बल, आरोग्य और सुख की वृद्धि करने वाला है। तीखा और रूखा अन्न ‘राजस’ है। वह दुःख, शोक और रोग उत्पन्न करने वाला है। अपवित्र, जूठा, दुर्गन्धयुक्त और नीरस आदि अन्न ‘तामस’ माना गया है। ‘यज्ञ करना कर्तव्य है’ —  यह समझकर निष्कामभाव से विधिपूर्वक किया जाने वाला यज्ञ ‘सात्विक’ है। फल की इच्छा से किया हुआ यज्ञ ‘राजस’ और दम्भ के लिये किया जाने वाला यज्ञ ‘तामस’ है। श्रद्धा और मन्त्र आदि से युक्त एवं विधि —प्रतिपादित जो देवता आदि की पूजा तथा अहिंसा आदि तप है, उन्हें ‘शारीरिक तप’ कहते हैं। अब वाणी से किये जाने वाले तप को बताया जाता है। जिससे किसी को उद्वेग न हो — ऐसा सत्य वचन, स्वाध्याय और जप-यह ‘वाङ्मय तप’ है। चित्तशुद्धि, मौन और मनोनिग्रह — ये ‘मानस तप’ हैं।

कामनारहित तप ‘सात्त्विक’ फल आदि के लिये किया जाने वाला तप ‘राजस’ तथा दूसरों को पीड़ा देने के लिये किया हुआ तप ‘तामस’ कहलाता है। उत्तम देश, काल और पात्र में दिया हुआ दान ‘सात्त्विक’ है, प्रत्युपकार के लिये दिया जाने वाला दान ‘राजस’ है तथा अयोग्य देश, काल आदि में अनादरपूर्वक दिया हुआ दान ‘तामस’ कहा गया है। ‘ॐ’, ‘तत्’, और ‘सत्’ — ये परब्रह्म परमात्मा के तीन प्रकार के नाम बताये गये हैं। यज्ञ-दान आदि कर्म मनुष्यों को भोग एवं मोक्ष प्रदान करने वाले हैं। जिन्होंने कामनाओं का त्याग नहीं किया है, उन सकामी पुरुषों के कर्म का बुरा, भला और मिला हुआ — तीन प्रकार का फल होता है। यह फल मृत्यु के पश्चात् प्राप्त होता है। संन्यासी (त्यागी पुरुषों) के कर्मों का कभी कोई फल नहीं होता। मोहवश जो कर्मों का त्याग किया जाता है, वह ‘तामस’ है, शरीर को कष्ट पहुँचने के भय से किया हुआ त्याग ‘राजस’ है तथा कामना के त्याग से सम्पन्न होने वाला त्याग ‘सात्त्विक’ कहलाता है। अधिष्ठान, कर्ता, भिन्न-भिन्न करण, नाना प्रकार की अलग-अलग चेष्टाएँ तथा दैव — ये पाँच ही कर्म के कारण हैं। सब भूतों में एक परमात्मा का ज्ञान ‘सात्त्विक’, भेदज्ञान ‘राजस’ और अतात्त्विक ज्ञान ‘तामस’ है। निष्काम भाव से किया हुआ कर्म ‘सात्विक’, कामना के लिये किया जाने वाला ‘राजस’ तथा मोहवश किया हुआ कर्म ‘तामस’ है।

कार्य की सिद्धि और असिद्धि में सम (निर्विकार) रहने वाला कर्ता ‘सात्त्विक’, हर्ष और शोक करने वाला ‘राजस’ तथा शठ और आलसी कर्ता ‘तामस’ कहलाता है। कार्य अकार्य के तत्त्व को समझने वाली बुद्धि ‘सात्त्विकी’, उसे ठीक-ठीक न जानने वाली बुद्धि ‘राजसी’ तथा विपरीत धारणा रखने वाली बुद्धि ‘तामसी’ मानी गयी है। मन को धारण करने वाली धृति ‘सात्त्विकी’, प्रीति की कामना वाली धृति ‘राजसी’ तथा शोक आदि को धारण करने वाली धृति ‘तामसी’ है। जिसका परिणाम सुखद हो, वह सत्त्व से उत्पन्न होने वाला ‘सात्त्विक सुख’ है। जो आरम्भ में सुखद प्रतीत होने पर भी परिणाम में दुःखद हो वह ‘राजस सुख’ है तथा जो आदि और अन्त में भी दुःख-ही-दुःख है, वह आपाततः प्रतीत होने वाला सुख ‘तामस’ कहा गया है। जिससे सब भूतों की उत्पत्ति हुई है और जिससे यह सम्पूर्ण जगत् व्याप्त है, उस विष्णु को अपने- अपने स्वाभाविक कर्म द्वारा पूजकर मनुष्य परम सिद्धि को प्राप्त कर लेता है। जो सब अवस्थाओं में और सर्वदा मन, वाणी एवं कर्म के द्वारा ब्रह्मा से लेकर तुच्छ कीटपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्‌ को भगवान् विष्णु का स्वरूप समझता है, वह भगवान् में भक्ति रखने वाला भागवत पुरुष सिद्धि को प्राप्त होता है” ॥ ३४-५८ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘गीता सार-निरूपण’ नामक तीन सौ इक्यासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८१ ॥

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