July 26, 2025 | aspundir | Leave a comment अग्निपुराण – अध्याय 382 ॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥ ॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥ तीन सौ बयासीवाँ अध्याय यमगीता यमगीताः अग्निदेव कहते हैं — ब्रह्मन् । अब मैं ‘यमगीता’ का वर्णन करूँगा, जो यमराज के द्वारा नचिकेता के प्रति कही गयी थी। यह पढ़ने और सुनने वालों को भोग प्रदान करती है तथा मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले सत्पुरुषों को मोक्ष देने वाली है ॥ १ ॥ यमराज ने कहा — अहो। कितने आश्वर्य की बात है कि मनुष्य अत्यन्त मोह के कारण स्वयं अस्थिरचित्त होकर आसन, शय्या, वाहन, परिधान (पहनने के वस्त्र आदि) तथा गृह आदि भोगों को सुस्थिर मानकर प्राप्त करना चाहता है। कपिलजी ने कहा है — ‘ भोगों में आसक्ति का अभाव तथा सदा ही आत्मतत्त्व का चिन्तन यह मनुष्यों के परमकल्याण का उपाय है।’ ‘सर्वत्र समतापूर्ण दृष्टि तथा ममता और आसक्तिका न होना यह मनुष्यों के परमकल्याण का साधन है’ — यह आचार्य पञ्चशिख का उद्गार है। गर्भ से लेकर जन्म और बाल्य आदि वय तथा अवस्थाओं के स्वरूप को ठीक—ठीक समझना ही मनुष्यों के परमकल्याण का हेतु है’ — यह गङ्गा—विष्णु का गान है। ‘ आध्यात्मिक, आधिदैविक और आधिभौतिक दुःख आदि अन्त वाले हैं, अर्थात् ये उत्पन्न और नष्ट होते रहते हैं, अतः इन्हें क्षणिक समझकर धैर्यपूर्वक सहन करना चाहिये, विचलित नहीं होना चाहिये — इस प्रकार उन दुःखों का प्रतिकार ही मनुष्यों के लिये परमकल्याणका साधन है’ — यह महाराज जनक का मत है। ‘‘जीवात्मा और परमात्मा वस्तुतः अभिन्न (एक) हैं; इनमें जो भेद की प्रतीति होती है, उसका निवारण करना ही परमकल्याण का हेतु है’ — यह ब्रह्माजी का सिद्धान्त है। जैगीषव्य का कहना है कि — ‘ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद में प्रतिपादित जो कर्म हैं, उन्हें कर्तव्य समझकर अनासक्तभाव से करना श्रेय का साधन है। ‘सब प्रकार की विधित्सा (कर्मारम्भ की आकाङ्क्षा) का परित्याग आत्मा के सुख का साधन है; यही मनुष्यों के लिये परम श्रेय है’ — यह देवल का मत बताया गया है। ‘कामनाओं के त्याग से विज्ञान, सुख, ब्रह्म एवं परमपद की प्राप्ति होती है। कामना रखने वालों को ज्ञान नहीं होता’ — यह सनकादिकों का सिद्धान्त है ॥ २-१० ॥ “दूसरे लोग कहते हैं कि प्रवृत्ति और निवृत्ति—दोनों प्रकार के कर्म करने चाहिये। परंतु वास्तव में नैष्कर्म्य ही ब्रह्म है; वही भगवान् विष्णु का स्वरूप है — यही श्रेय का भी श्रेय है। जिस पुरुष को ज्ञान की प्राप्ति हो जाती है, वह संतों में श्रेष्ठ है; वह अविनाशी परब्रह्म विष्णु से कभी भेद को नहीं प्राप्त होता। ज्ञान, विज्ञान, आस्तिकता, सौभाग्य तथा उत्तम रूप तपस्या से उपलब्ध होते हैं। इतना ही नहीं, मनुष्य अपने मन से जो—जो वस्तु पाना चाहता है, वह सब तपस्या से प्राप्त हो जाती है। विष्णु के समान कोई ध्येय नहीं है, निराहार रहने से बढ़कर कोई तपस्या नहीं है, आरोग्य के समान कोई बहुमूल्य वस्तु नहीं है और गङ्गाजी के तुल्य दूसरी कोई नदी नहीं है। जगद्गुरु भगवान् विष्णु को छोड़कर दूसरा कोई बान्धव नहीं है । ‘नीचे ऊपर, आगे देह, इन्द्रिय, मन तथा मुख—सबमें और सर्वत्र भगवान् श्रीहरि विराजमान हैं।’ इस प्रकार भगवान् का चिन्तन करते हुए जो प्राणों का परित्याग करता है, वह साक्षात् श्रीहरि के स्वरूप में मिल जाता है। वह जो सर्वत्र व्यापक ब्रह्म है, जिससे सबकी उत्पत्ति हुई है, जो सर्वस्वरूप है तथा यह सब कुछ जिसका संस्थान (आकार—विशेष) है, जो इन्द्रियों से ग्राह्य नहीं है, जिसका किसी नाम आदि के द्वारा निर्देश नहीं किया जा सकता, जो सुप्रतिष्ठित एवं सबसे परे है, उस परापर ब्रह्म के रूप में साक्षात् भगवान् विष्णु ही सबके हृदय में विराजमान हैं। वे यज्ञ के स्वामी तथा यज्ञस्वरूप हैं; उन्हें कोई तो परब्रह्मरूप से प्राप्त करना चाहते हैं, कोई विष्णुरूप से, कोई शिवरूप से, कोई ब्रह्मा और ईश्वररूप से, कोई इन्द्रादि नामों से तथा कोई सूर्य, चन्द्रमा और कालरूप से उन्हें पाना चाहते हैं। ब्रह्मा से लेकर कोट तक सारे जगत् को विष्णु का ही स्वरूप कहते हैं। वे भगवान् विष्णु परब्रह्म परमात्मा हैं, जिनके पास पहुँच जाने पर (जिन्हें जान लेने या पा लेने पर) फिर वहाँ से इस संसार में नहीं लौटना पड़ता। सुवर्ण—दान आदि बड़े—बड़े दान तथा पुण्य—तीर्थों में स्नान करने से, ध्यान लगाने से, व्रत करने से, पूजा से और धर्म की बातें सुनने (एवं उनका पालन करने) से उनकी प्राप्ति होती है” ॥ ११-२०१/२ ॥ “आत्मा को ‘रथी’ समझो और शरीर को ‘रथ’। बुद्धि को ‘सारथि’ जानो और मन को ‘लगाम’। विवेकी पुरुष इन्द्रियों को ‘घोड़े’ कहते हैं और विषयों को उनके ‘मार्ग’ तथा शरीर, इन्द्रिय और मनसहित आत्मा को ‘भोक्ता’ कहते हैं। जो बुद्धिरूप सारथि अविवेकी होता है, जो अपने मनरूपी लगाम को कसकर नहीं रखता, वह उत्तम पद को (परमात्मा को) नहीं प्राप्त होता; संसाररूपी गर्त में गिरता है। परंतु जो विवेकी होता है और मन को काबू में रखता है, वह उस परमपद को प्राप्त होता है, जिससे वह फिर जन्म नहीं लेता। जो मनुष्य विवेकयुक्त बुद्धिरूप सारथि से सम्पन्न और मनरूपी लगाम को काबू में रखने वाला होता है. वही संसाररूपी मार्ग को पार करता है, जहाँ विष्णु का परमपद है। इन्द्रियों की अपेक्षा उनके विषय पर हैं, विषयों से परे मन है, मन से परे बुद्धि है, बुद्धि से परे महान् आत्मा (महत्तत्त्व) है, महत्तत्त्व से परे अव्यक्त (मूलप्रकृति) है और अव्यक्त से परे पुरुष (परमात्मा) है। पुरुष से परे कुछ भी नहीं है, वही सीमा है, वही परमगति है। सम्पूर्ण भूतों में छिपा हुआ यह आत्मा प्रकाश में नहीं आता। सूक्ष्मदर्शी पुरुष अपनी तीव्र एवं सूक्ष्म बुद्धि से ही उसे देख पाते हैं। विद्वान् पुरुष वाणी को मन में और मन को विज्ञानमयी बुद्धि में लीन करे। इसी प्रकार बुद्धि को महत्तत्त्वमें और महत्तत्त्व को शान्त आत्मा में लीन करे ॥ २१-२९१/२ ॥ “यम—नियमादि साधनों से ब्रह्म और आत्मा की एकता को जानकर मनुष्य सत्स्वरूप ब्रह्म ही हो जाता है। अहिंसा, सत्य, अस्तेय (चोरी का अभाव), ब्रह्मचर्य और अपरिग्रह (संग्रह न करना) — ये पाँच ‘यम’ कहलाते हैं। ‘नियम’ भी पाँच ही हैं — शौच (बाहर भीतर की पवित्रता), संतोष, उत्तम तप, स्वाध्याय और ईश्वरपूजा। ‘आसन’ बैठने की प्रक्रिया का नाम है; उसके ‘पद्मासन’ आदि कई भेद हैं। प्राणवायु को जीतना ‘प्राणायाम’ है। इन्द्रियों का निग्रह ‘प्रत्याहार’ कहलाता है। ब्रह्मन् ! एक शुभ विषय में जो चित्त को स्थिरतापूर्वक स्थापित करना होता है, उसे बुद्धिमान् पुरुष ‘धारणा’ कहते हैं। एक ही विषय में बारंबार धारणा करने का नाम ‘ध्यान’ है। ‘मैं ब्रह्म हूँ’ — इस प्रकार के अनुभव में स्थिति होने को ‘समाधि’ कहते हैं। जैसे घड़ा फूट जाने पर घटाकाश महाकाश से अभिन्न (एक) हो जाता है, उसी प्रकार मुक्त जीव ब्रह्म के साथ एकीभाव को प्राप्त होता है वह सत्स्वरूप ब्रह्म ही हो जाता है। ज्ञान से ही जीव अपने को ब्रह्म मानता है, अन्यथा नहीं। अज्ञान और उसके कार्यों से मुक्त होने पर जीव अजर—अमर हो जाता है” ॥ ३०-३६ ॥ अग्निदेव कहते हैं — वसिष्ठ। यह मैंने ‘यमगीता बतलायी है। इसे पढ़ने वालों को यह भोग और मोक्ष प्रदान करती है। वेदान्त के अनुसार सर्वत्र ब्रह्मबुद्धि का होना ‘आत्यन्तिक लय’ कहलाता है ॥ ३७ ॥ ॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘यमगीता का कथन’ नामक तीन सौ बयासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८२ ॥ Content is available only for registered users. 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