अग्निपुराण – अध्याय 383
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ नमो भगवते वासुदेवाय ॥
तीन सौ तिरासीवाँ अध्याय
अग्नि पुराण का माहात्म्य
अग्नि पुराण माहात्म्यः

अग्निदेव कहते हैं — ब्रह्मन् । ‘अग्निपुराण’ ब्रह्मस्वरूप है, मैंने तुमसे इसका वर्णन किया। इसमें कहीं संक्षेप से और कहीं विस्तार के साथ ‘परा’ और ‘अपरा’ —  इन दो विद्याओं का प्रतिपादन किया गया है। यह महापुराण है। ऋक्, यजुः, साम और अथर्व — नामक वेदविद्या, विष्णु-महिमा, संसार-सृष्टि, छन्द, शिक्षा, व्याकरण, निघण्टु (कोष), ज्यौतिष, निरुक्त, धर्मशास्त्र आदि, मीमांसा, विस्तृत न्यायशास्त्र, आयुर्वेद, पुराण विद्या, धनुर्वेद, गन्धर्ववेद, अर्थशास्त्र, वेदान्त और महान् (परमेश्वर) श्रीहरि यह सब ‘अपरा विद्या’ है तथा परम अक्षर तत्त्व ‘परा विद्या’ है। (इस पुराण में इन दोनों विद्याओं का विषय वर्णित है।) ‘यह सब कुछ विष्णु ही है’ — ऐसा जिसका भाव हो, उसे कलियुग बाधा नहीं पहुँचाता। बड़े-बड़े यज्ञों का अनुष्ठान और पितरों का श्राद्ध न करके भी यदि मनुष्य भक्तिपूर्वक श्रीकृष्ण का पूजन करे तो वह पाप का भागी नहीं होता।’

विष्णु सबके कारण हैं। उनका निरन्तर ध्यान करने वाला पुरुष कभी कष्ट में नहीं पड़ता। यदि परतन्त्रता आदि दोषों से प्रभावित होकर तथा विषयों के प्रति चित्त आकृष्ट हो जाने के कारण मनुष्य पाप कर्म कर बैठे तो भी गोविन्द का ध्यान करके वह सब पापों से मुक्त हो जाता है। दूसरी दूसरी बहुत-सी बातें बनाने से क्या लाभ ? ‘ध्यान’ वही है, जिसमें गोविन्द का चिन्तन होता हो, ‘कथा’ वही है, जिसमें केशव का कीर्तन हो रहा हो और ‘कर्म’ वही है, जो श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिये किया जाय। वसिष्ठजी! जिस परमोत्कृष्ट परमार्थतत्त्व का उपदेश न तो पिता पुत्र को और न गुरु शिष्य को कर सकता है, वही इस अग्निपुराण के रूप में मैंने आपके प्रति किया है। द्विजवर । संसार में भटकने वाले पुरुष को स्त्री, पुत्र और धन-वैभव मिल सकते हैं तथा अन्य अनेकों सुहृदों की भी प्राप्ति हो सकती है, परंतु ऐसा उपदेश नहीं मिल सकता। स्त्री, पुत्र, मित्र, खेती-बारी और बन्धु-बान्धवों से क्या लेना है? यह उपदेश ही सबसे बड़ा बन्धु है; क्यों कि यह संसार से मुक्ति दिलाने वाला है ॥ १-११ ॥

प्राणियों की सृष्टि दो प्रकार की है— ‘दैवी’ और ‘आसुरी’। जो भगवान् विष्णु की भक्ति में लगा हुआ है, वह ‘दैवी सृष्टि के अन्तर्गत है तथा जो भगवान् से विमुख है, वह ‘आसुरी सृष्टि का मनुष्य है — असुर है। यह अग्निपुराण, जिसका मैंने तुम्हें उपदेश किया है, परम पवित्र, आरोग्य एवं धन का साधक, दुःस्वप्नका नाश करने वाला, मनुष्योंको सुख और आनन्द देने वाला तथा भव बन्धन से मोक्ष दिलाने वाला है। जिनके घरों में हस्तलिखित अग्निपुराण की पोथी मौजूद होगी, वहाँ उपद्रवों का जोर नहीं चल सकता। जो मनुष्य प्रतिदिन अग्निपुराण — श्रवण करते हैं, उन्हें तीर्थ-सेवन, गोदान, यज्ञ तथा उपवास आदि की क्या आवश्यकता है? जो प्रतिदिन एक प्रस्थ तिल और एक माशा सुवर्ण दान करता है तथा जो अग्निपुराण का एक ही श्लोक सुनता है, उन दोनों का फल समान है। श्लोक सुनाने वाला पुरुष तिल और सुवर्ण-दान का फल पा जाता है। इसके एक अध्याय का पाठ गोदान से बढ़कर है। इस पुराण को सुनने की इच्छामात्र करने से दिन- रात का किया हुआ पाप नष्ट हो जाता है। वृद्धपुष्कर-तीर्थ में सौ कपिला गौओं का दान करने से जो फल मिलता है, वही अग्निपुराण का पाठ करने से मिल जाता है। ‘प्रवृत्ति’ और ‘निवृत्ति’ रूप धर्म तथा ‘परा’ और ‘अपरा’ नाम वाली दोनों विद्याएँ इस ‘अग्निपुराण’ नामक शास्त्र को समानता नहीं कर सकतीं। वसिष्ठजी ! प्रतिदिन अग्निपुराण का पाठ अथवा श्रवण करने वाला भक्त — मनुष्य सब पापों से छुटकारा पा जाता है। जिस घर में अग्निपुराण की पुस्तक रहेगी, वहाँ विघ्न-बाधाओं, अनर्थों तथा चोरों आदि का भय नहीं होगा। जहाँ अग्निपुराण रहेगा, उस घर में गर्भपात का भय न होगा, बालकों को ग्रह नहीं सतायेंगे तथा पिशाच आदि का भय भी निवृत्त हो जायगा। इस पुराण का श्रवण करने वाला ब्राह्मण वेदवेत्ता होता है, क्षत्रिय पृथ्वी का राजा होता है, वैश्य धन पाता है, शूद्र नीरोग रहता है। जो भगवान् विष्णु में मन लगाकर सर्वत्र समानदृष्टि रखते हुए ब्रह्मस्वरूप अग्निपुराण का प्रतिदिन पाठ या श्रवण करता है, उसके दिव्य, आन्तरिक्ष और भौम आदि सारे उपद्रव नष्ट हो जाते हैं। इस पुस्तक के पढ़ने-सुनने और पूजन करने वाले पुरुष के और भी जो कुछ पाप होते हैं, उन सबको भगवान् केशव नष्ट कर देते हैं। जो मनुष्य हेमन्त ऋतु में गन्ध और पुष्प आदि से पूजा करके श्रीअग्निपुराण का श्रवण करता है, उसे अग्निष्टोम यज्ञ का फल मिलता है। शिशिर ऋतु में इसके श्रवण से पुण्डरीक का तथा वसन्त ऋऋतु में अश्वमेध यज्ञ का फल प्राप्त होता है। गर्मी में वाजपेय का, वर्षां में राजसूय का तथा शरद् ऋतु में इस पुराण का पाठ और श्रवण करने से एक हजार गोदान करने का फल प्राप्त होता है। वसिष्ठजी ! जो भगवान् विष्णु के सम्मुख बैठकर भक्तिपूर्वक अग्निपुराण का पाठ करता है, वह मानो ज्ञानयज्ञ के द्वारा श्रीकेशव का पूजन करता है। जिसके घर में हस्तलिखित अग्निपुराण की पुस्तक पूजित होती है, उसे सदा ही विजय प्राप्त होती है तथा भोग और मोक्ष दोनों ही उसके हाथ में रहते हैं — यह बात पूर्वकाल में कालाग्निस्वरूप श्रीहरि ने स्वयं ही मुझसे बतायी थी। आग्नेय पुराण ब्रह्मविद्या एवं अद्वैतज्ञान रूप है ॥ १२-३१ ॥

वसिष्ठजी कहते हैं — व्यास ! यह अग्निपुराण ‘परा—अपरा’— दोनों विद्याओं का स्वरूप है। इसे विष्णु ने ब्रह्मा से तथा अग्निदेव ने समस्त देवताओं और मुनियों के साथ बैठे हुए मुझसे जिस रूप में सुनाया, उसी रूप में मैंने तुम्हारे सामने इसका वर्णन किया है। अग्निदेव के द्वारा वर्णित यह ‘आग्नेय पुराण’ वेद के तुल्य माननीय है तथा यह सभी विषयों का ज्ञान कराने वाला है। व्यास! जो इसका पाठ या श्रवण करेगा, जो इसे स्वयं लिखेगा या दूसरों से लिखायेगा, शिष्यों को पढ़ायेगा या सुनायेगा अथवा इस पुस्तक का पूजन या धारण करेगा, वह सब पापों से मुक्त एवं पूर्णमनोरथ होकर स्वर्गलोक में जायगा। जो इस उत्तम पुराण को लिखाकर ब्राह्मणों को दान देता है, वह ब्रह्मलोक में जाता है तथा अपने कुल की सौ पीढ़ियों का उद्धार कर देता है। जो एक श्लोक का भी पाठ करता है, उसका पाप-पङ्क से छुटकारा हो जाता है। इसलिये व्यास! इस सर्वदर्शनसंग्रहरूप पुराण को तुम्हें श्रवण की इच्छा रखने वाले शुकादि मुनियों के साथ अपने शिष्यों को सदा सुनाते रहना चाहिये। अग्निपुराण का पठन और चिन्तन अत्यन्त शुभ तथा भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला है। जिन्होंने इस पुराण का गान किया है, उन अग्निदेव को नमस्कार है ॥ ३२-३८ ॥

व्यासजी कहते हैं — सूत! पूर्वकाल में वसिष्ठजी के मुख से सुना हुआ यह अग्निपुराण मैंने तुम्हें सुनाया है। ‘परा’ और ‘अपरा’ विद्या इसका स्वरूप है। यह परम पद प्रदान करने वाला है। आग्नेय पुराण परम दुर्लभ है, भाग्यवान् पुरुषों को ही यह प्राप्त होता है। ‘ब्रह्म’ या ‘वेद स्वरूप’ इस अग्निपुराण का चिन्तन करने वाले पुरुष श्रीहरि को प्राप्त होते हैं। इसके चिन्तन से विद्यार्थियों को विद्या और राज्य की इच्छा रखने वालों को राज्य की प्राप्ति होती है। जिन्हें पुत्र नहीं है, उन्हें पुत्र मिलता है तथा जो लोग निराश्रय हैं, उन्हें आश्रय प्राप्त होता है। सौभाग्य चाहने वाले सौभाग्य को तथा मोक्ष की अभिलाषा रखने वाले मनुष्य मोक्ष को पाते हैं। इसे लिखने और लिखाने वाले लोग पापरहित होकर लक्ष्मी को प्राप्त होते हैं। सूत! तुम शुक और पैल आदि के साथ अग्निपुराण का चिन्तन करो, इससे तुम्हें भोग और मोक्ष दोनों की  प्राप्ति होगी इसमें तनिक भी संदेह नहीं है। तुम भी अपने शिष्यों और भक्तों को यह पुराण सुनाओ ॥ ३९-४४ ॥

सूतजी कहते हैं — शौनक आदि मुनिवरो ! मैंने श्रीव्यासजी की कृपा से श्रद्धापूर्वक अग्निपुराण का श्रवण किया है। यह अग्निपुराण ब्रह्मस्वरूप है। आप सब लोग श्रद्धायुक्त होकर इस नैमिषारण्य में भगवान् श्रीहरि का यजन करते हुए निवास करते है, अतः (आपको सर्वोत्तम अधिकारी समझकर) मैंने आपसे इस पुराण का वर्णन किया है। ‘अग्निदेव’ इस पुराण के वक्ता हैं, अतएव यह ‘आग्नेय पुराण’ कहलाता है। इसे वेदों के तुल्य माना गया है। यह ‘ब्रह्म’ और ‘विद्या’ दोनों से युक्त है। भोग और मोक्ष प्रदान करने वाला श्रेष्ठ साधन है। इससे बढ़कर सर्वोत्तम सार, इससे उत्तम सुहृद्, इससे श्रेष्ठ ग्रन्थ तथा इससे उत्कृष्ट कोई गति नहीं है। इस पुराण से बढ़कर शास्त्र नहीं है, इससे उत्तम श्रुति नहीं है, इससे श्रेष्ठ ज्ञान नहीं है तथा इससे उत्कृष्ट कोई स्मृति नहीं है। इससे श्रेष्ठ आगम, इससे श्रेष्ठ विद्या, इससे श्रेष्ठ सिद्धान्त और इससे श्रेष्ठ मङ्गल नहीं है। इससे बढ़‌कर वेदान्त भी नहीं है। यह पुराण सर्वोत्कृष्ट है। इस पृथ्वी पर अग्निपुराण से बढ़कर श्रेष्ठ और दुर्लभ वस्तु कोई नहीं है ॥ ४५-५१ ॥

इस अग्निपुराण में सब विद्याओं का प्रदर्शन (परिचय) कराया गया है। भगवान् के मत्स्य आदि सम्पूर्ण अवतार, गीता और रामायणका भी इसमें वर्णन है। ‘हरिवंश’ और ‘महाभारत ‘का भी परिचय है। नौ प्रकार की सृष्टि का भी दिग्दर्शन कराया गया है। वैष्णव-आगम का भी गान किया गया है। देवताओं की स्थापना के साथ ही दीक्षा तथा पूजा का भी उल्लेख हुआ है। पवित्रारोहण आदि की विधि, प्रतिमा के लक्षण आदि तथा मन्दिर के लक्षण आदि का वर्णन है। साथ ही भोग और मोक्ष देने वाले मन्त्रों का भी उल्लेख है। शैव आगम और उसके प्रयोजन, शाक्त-आगम, सूर्यसम्बन्धी आगम, मण्डल, वास्तु और भाँति-भाँति के मन्त्रों का वर्णन है। प्रतिसर्ग का भी परिचय कराया गया है। ब्रह्माण्ड मण्डल तथा भुवनकोष का भी वर्णन है। द्वीप, वर्ष आदि और नदियों का भी उल्लेख है। गङ्गा तथा प्रयाग आदि तीर्थों की महिमा का वर्णन किया गया है। ज्योतिश्चक्र (नक्षत्र—मण्डल), ज्यौतिष आदि विद्या तथा युद्धजयार्णव का भी निरूपण है। मन्वन्तर आदि का वर्णन तथा वर्ण और आश्रम आदि के धर्मो का प्रतिपादन किया गया है। साथ ही अशौच, द्रव्यशुद्धि तथा प्रायश्चित्त का भी ज्ञान कराया गया है। राजधर्म, दानधर्म, भाँति-भाँति के व्रत, व्यवहार, शान्ति तथा ऋग्वेद आदि के विधान का भी वर्णन है। सूर्यवंश, सोमवंश, धनुर्वेद, वैद्यक, गान्धर्व वेद, अर्थशास्त्र, मीमांसा, न्यायविस्तार, पुराण-संख्या, पुराण-माहात्म्य, छन्द, व्याकरण, अलंकार, निघण्टु, शिक्षा और कल्प आदि का भी इसमें निरूपण किया गया है ॥ ५२-६१ ॥

नैमित्तिक, प्राकृतिक और आत्यन्तिक लय का वर्णन है। वेदान्त, ब्रह्मज्ञान और अष्टाङ्गयोग का निरूपण है। स्तोत्र, पुराण-महिमा और अष्टादश विद्याओं का प्रतिपादन है। ऋग्वेद आदि अपरा विद्या, परा विद्या तथा परम अक्षरतत्त्व का भी निरूपण है। इतना ही नहीं, इसमें ब्रहा के सप्रपञ्च (सविशेष) और निष्प्रपञ्च (निर्विशेष) रूप का वर्णन किया गया है। यह पुराण पंद्रह हजार श्लोकों का है। देवलोक में इसका विस्तार एक अरब श्लोकों में है। देवता सदा इस पुराण का पाठ करते हैं। सम्पूर्ण लोकों का हित करने के लिये अग्निदेव ने इसका संक्षेप से वर्णन किया है। शौनकादि मुनियो ! आप इस सम्पूर्ण पुराण को ब्रह्ममय ही समझें। जो इसे सुनता या सुनाता, पढ़ता या पढ़ाता, लिखता या लिखवाता तथा इसका पूजन और कीर्तन करता है, वह परम शुद्ध हो सम्पूर्ण मनोरथों को प्राप्त करके कुलसहित स्वर्ग को जाता है ॥ ६२-६६१/२

राजा को चाहिये कि संयमशील होकर पुराण के वक्ता का पूजन करे। गौ, भूमि तथा सुवर्ण आदि का दान दे, वस्त्र और आभूषण आदि से तृप्त करते हुए वक्ता का पूजन करके मनुष्य पुराण-श्रवण का पूरा-पूरा फल पाता है। पुराण- श्रवण के पश्चात् निश्चय हो ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये। जो इस पुस्तक के लिये शरयन्त्र (पेटी), सूत, पत्र (पन्ने), काठ की पट्टी, उसे बाँधने की रस्सी तथा वेष्टन-वस्त्र आदि दान करता है, वह स्वर्गलोक को जाता है। जो अग्निपुराण की पुस्तक का दान करता है, वह ब्रह्मलोक में जाता है। जिसके घर में यह पुस्तक रहती है. उसके यहाँ उत्पात का भय नहीं रहता। वह भोग और मोक्ष को प्राप्त होता है। मुनियो! आपलोग इस अग्निपुराण को ईश्वररूप मानकर सदा इसका स्मरण रखें ॥ ६७-७११/२

व्यासजी कहते हैं — तत्पश्चात् सूतजी मुनियों से पूजित हो वहाँ से चले गये और शौनक आदि महात्मा भगवान् श्रीहरि को प्राप्त हुए ॥ ७२ ॥

॥ इस प्रकार आदि आग्नेय महापुराण में ‘अग्निपुराण में वर्णित संक्षिप्त विषय तथा इस पुराण के माहात्म्य का वर्णन’ नामक तीन सौ तिरासीवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥ ३८३ ॥

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