॥ अमृतेश्वरी मन्त्र प्रयोगः ॥

पुरुष देवता के साथ उसकी शक्ति देवता का पूजन करने से पूर्णाङ्ग होता है । स्त्री देवता के साथ पुरुष देवता का पूजन-अर्चन भी आवश्यक है ।
यदि पुरुष देवता के एक लक्ष जप किये जाये तो उसके दशांश जप (दस हजार) उसकी स्त्री देवता के करने आवश्यक है । अतः मृत्युञ्जय प्रयोग के साथ अमृतेश्वरी देवी का पूजन अर्चन व जप किया जाय तभी पूर्णाङ्ग होगा । श्रीभुवनेश्वरी महास्तोत्र में श्रीपृथ्वीधराचार्य ने मन्त्रोद्धार इस प्रकार किया है ।


श्रीमृत्युञ्जयनामधेय भगवच्चैतन्य चन्द्रात्मिके
ह्रींङ्कारि प्रथमा तमांसि दलय त्वं हंससञ्जीविनि ।
जीवं प्राणविजृम्भमाण हृदयग्रंथिस्थितं मे कुरु
त्वां सेवे निजबोधलाभरभसा स्वाहा भजामीश्वरीम् ॥

मन्त्र –
ॐ श्रीं ह्रीं मृत्युञ्जये भगवति चैतन्य चन्द्रे हंससञ्जीवनी स्वाहा ।

ध्यानम् –
जाग्रद बोधसुधामयूखनिचयैराप्लाव्य सर्वादिशो,
यस्याः कापि कला कलङ्करहिता षटचक्रमाक्रामति ।
दैन्यध्वान्तविदारणैकचतुरा वाचं परां तन्वती,
या नित्या भुवनेश्वरी विहरतां हंसीव मन्मानसे ॥

यंत्ररचना – बिन्दु, षट्कोण, अष्टदलपद्म के बाद तीन रेखा वाला चार द्वार युक्त भूपूर बनाये । षष्टकोण में अग्निकोण, ईशान, नैऋत्य, वायव्य, सम्मुख एवं दिक्षु दिशाओं में क्रमशः अं आं, इं ईं, उं ऊं, एं ऐ, ओं औं, अं अः लिखे । अष्टदलों में क्रमशः कं खं गं घं ङं, चं छं जं झं जं, टं ठं डं ढं णं, तं थं दं धं नं, पं फं बं भं मं, यं रं लं वं , शं षं सं हं, लं क्षं लिखे । भूपुर के चारों कोणों में “वं लं” लिखे ।
यही पृथ्वीधराचार्य ने यन्त्रोद्धार दिया है –
व्योमेन्दो रसनार्णकर्णिकमचां द्वन्द्वै स्फुरत्केसरं,
पत्रान्तर्गत पञ्चवर्ग यशलार्णादि त्रिवर्ग क्रमात् ।
आशास्वस्त्रिषु लान्तलाङ्गलियुजा क्षोणीपुरेणावृतं,
वर्णाब्जं शिरसि स्थितं विषगद प्रध्वंसि मृत्युञ्जयेत् ॥

उपरोक्त यन्त्र में वर्णादि लिखकर पूजाकर धारण करने से शुभ रहे । तांत्रिक प्रयोगों की तरह मध्य बिन्दु में प्रधान देवता, षष्टकोण में हृदयादि न्यास शक्ति, अष्टदलों में ब्राह्मी आदि अष्टमातृका तथा भूपुर में इन्द्रादि दशदिक्पालों व उनके आयुधों का पूजन करना प्रशस्त होगा ।

॥ चित्रविद्या अमृतेश्वरी प्रयोगः ॥
मृत्युञ्जय प्रयोग के साथ इसका प्रयोग करने से प्रयोग सफल होकर लाभ मिलता है ।
विनियोगः– ॐ अस्य श्री चित्रविद्या अमृतेश्वरी मंत्रस्य संवर्तकऋषिः, शक्करी छन्दः, चित्रविद्या अमृतेश्वरी देवता, ठं बीजं, सूं शक्ति, इष्ट सिद्धयर्थे जपे विनियोगः । षडङ्गन्यासः – ठां, ठीं, ठूं, ठें, ठौं, ठः से क्रमशः न्यास करें ।
ध्यानम्
अमलकमलमध्ये चन्द्रपीठे निषण्णाम-
मृतकलश वीणा भिन्न मुद्राग्र हस्ताम् ।
प्रणतशिरसि पूरं संस्रवन्तीं सुधायाः
शरणमह्मुपैमि श्री शिवां चित्रविद्याम् ॥

मंत्र –
“वं सं ज्झ्रूं ज्झ्रूं जूँ ठं हृीं श्रीं श्री भगवति चित्रविद्ये महामाये अमृतेश्वरि एहयेहि वरे वरदे प्रसन्न वदने अमृतं स्रावय स्रावय अनलं शीतल कुरु कुरु सर्वविष- नाशय नाशय सर्वताप ज्वरं हन हन सर्वपैत्योन्मादं मोचय मोचय आज्योस्ष्ठ शमय शमय सर्वजनं मोहय मोहय मां पालय पालय श्रीं हीं ठं जूं ज्झूं ज्झूं सं वं स्वाहा ।”

हीं श्रीं का मन में स्मरण कर साध्य का ध्यान करें एवं अमृतकलश से सिञ्चित होने का ध्यान करें ।
किसी के पैत्योन्माद होवे तो साध्यनाम की जगह यंत्र में उसका नाम लिखे । मूल मंत्र के दस हजार जप करें । यंत्र को गुड़ की गुटिका बनाकर खिला देवे । प्रधान देव की पूजा में रखें अमृतकलश से साध्य का सिंचन करे लाभ होता है । जब कामना हेतु प्रयोग नहीं करना हो तो साध्य नाम बिना लिखे यंत्र का पूजन जप करें ।

॥ रोगनाशक अमृतेश्वरी मंत्र ॥
मंत्र –

ॐ ऐं प्लू हौं जूं सः अमृते अमृतोद्भवे अमृतेश्वरि अमृतवर्षिणि अमृतं स्रावय स्रावय स्वाहा ।
इस मंत्र के ५ लाख जप अमृत का ध्यान कर रोगी को पिलाये । उक्त जल से रोगी स्नान करे तो भी आरोग्य लाभ होवे ।

॥ रोगनाशक दीपनी मंत्र ॥
असाध्य रोग के कारण कमजोरी व्याप्त हो गई हो रोगी का आत्मबल गिर गया हो तो दस हजार मंत्र जप कर दशांश होम करे पश्चात् १०८ बार मंत्र से जल को अभिमंत्रित कर रोगी के मार्जन कर अभिषिंचन करे तो रोग दूर होता है ।
मंत्र –
ऐं वदवद वाग्वादिनि ऐं क्लीं क्लिन्ने क्लेदिनि क्लेदय क्लेदय महाक्षोभं कुरु कुरु क्लीं सौः मोक्षं कुरु कुरु सौः ह्सौः ।
त्रिपुरसुन्दरी की साधना पूजा इस मंत्र के साथ करे ।

॥ सर्वशक्तिमय मृतसञ्जीवनी विद्या ॥
मृतसंजीवनी विद्या का यह मंत्र अन्य मंत्रों से भिन्न व विलक्षण शक्ति वाला है ।
मंत्र –
“ॐ ऐं श्रीं ह्रीं सौः सर्वतत्त्व व्यापिनी जीव जीव प्राणप्राणेऽमृताऽमृते कएईल ह्रीं हसकहल ह्रीं हुं हुं मृत विद्रावणे प्राणतत्त्वाति तत्त्वे सर्वेश्वरि वेदगुह्ये हसकहल गर्भे सावित्रि ऐं वाचंभरि कालि क्लीं जीवय जीवय स्वाहा ॥”

त्रिपुर सुंदरी मंत्र से भिन्नपाद यह मंत्र अमृतवर्षा कारक है इस मंत्र को भार्गव ऋषि शुक्राचार्य ने “कच’ को दिया था और जिसके प्रभाव से मृतप्राणी भी जीवित हो जाता है । मंत्र जागृति हेतु प्रतिदिन एक एक वर्ण की १ लाख जप संख्या कही है ।
विनियोग – ॐ अस्य श्रीमृतसंजीवनी विद्या मंत्रस्य भृगुः ऋषिः, विराट् छन्दः, चिदानन्दलहरी देवता । ह्रीं सर्वव्यापिनी प्राणेश्वरी बीजं । क्लीं कीलकम्, हसकल ह्रीं शक्तिः मृतसंजीवने विनियोग ।
मंत्र के अनुसार अमृतेश्वरि के ध्यान के साथ सविता एवं त्रिपुरसुंदरी का ध्यान भी करे ।

॥ अमृतवर्षिणी त्रिपुरा विद्या ॥
मंत्र –

(१) ॐ क्लीं अमृतवर्षिणि त्रिपुरे स्वाहा ।
(२) ॐ क्लीं अमृतवर्षिणि ऐ त्रिपुरे सौः स्वाहा ।
त्रिपुर सुन्दरी की पूजा कर उपरोक्त मंत्र का जप करे ।

॥ अकालमृत्युहारी विद्या ॥
स्वर मातृका पुटित अमृतेश्वरि का यह मंत्र असाध्य रोग को दूर करने व कालकूट विष निवारण में समर्थ है ।
मंत्र –
ॐ यं अं आं इं ईं उं ऊं ऋं ॠं लृ ॡं एं ऐं ओं औं अं अः अमृतम्भरि स्वाहा ।

३१००० जप करने से मंत्र सिद्ध हो जाता है । कुशा को घुमाते हुये जल को अभिमंत्रित कर रोगी पर छिड़के व जल रोगी को पिलाये तो असाध्य रोग दूर होवे ।

॥ अमृतार्णव वासिनी तुरीया विद्या ॥
मंत्र –
“ॐ ऐं ह्रीं ह्सौं त्रिपुरे अमृतार्णववासिनि शिवे शिवानन्यरूपिण्यै ते नमः ।
इस मंत्र में त्रिपुरसुन्दरी व शिव की एकरूपता का बोधक है । इससे साधक को भुक्ति एवं मुक्ति दोनों फल प्राप्त होते हैं । साधक सुखी एवं संपन्न रहता है ।

॥ मृत्युहारिणी मंत्राः ॥
(१) ॐ ह्रीं श्रीं जूं फ्रां फ्रीं फ्रूं फ्रें हौं स्हौः सौः स्हजहलक्षम्लवनऊं तत्त्वमसि स्हजहलक्षम्लवनऊं सौः स्हौः हौं फ्रें फ्रूं फ्रीं फ्रां जूं श्रीं ह्रीं ॐ ।
(२) चतुर्क्षर – ॐ ह्रीं श्रीं जूं । (महाकाल संहि.)
॥ ध्यानम् ॥
हिमानीकूटसदृशीमीश्वरी देहरोचिषा ।
उत्तानकुणपाकार कालमृत्यूपरि स्थिताम् ॥ १ ॥
चतुर्वेदाकार योगपट्ट जानुद्वयङ्किताम् ।
सितसूक्षाम्बरंधरां स्मेरानन समोरुहाम् ॥ २ ॥
ज्ञानरश्मिच्छटाटोप विद्योति तनुमण्डलाम् ।
प्रोढाङ्गनारूपधरा मुत्तुङ्गस्तन मण्डलाम् ॥ ३ ॥
विभूषितां यावदेकयोषिदूषणसञ्चयैः ।
विद्याभिरष्टादशभिर्निबद्धञ्जलिभिः सदा ॥ ४ ॥
सेव्यमानां चतुर्दिक्षु हसन्तीं तां निरीक्ष्य च ।
चतुर्भुजां सुधाकुम्भपुस्तके वामहस्तयोः ॥ ५ ॥
दक्षयोरक्षमालां च मुद्रां व्याख्यानाशालिनीम्
दधतीं सर्वदा ध्योद् देवीं तां मृत्युहारिणीम् ॥ ६ ॥

विशेष प्राण संकट व महारोग में मृत्युञ्जय मंत्र के साथ इस देवी का प्रयोग अवश्य करे ।

 

 

 

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