कालभैरव ( कालभैरवाष्टमी )
।। ॐ हं षं नं गं कं सं खं महाकाल भैरवाय नम:।।
भगवान शंकर के अवतारों में भैरव का अपना एक विशिष्ट महत्व है। तांत्रिक पद्धति में भैरव शब्द की निरूक्ति उनका विराट रूप प्रतिबिम्बित करती हैं। वामकेश्वर तंत्र की योगिनी-हदय-दीपिका टीका में अमृतानंद नाथ कहते हैं- ‘विश्वस्य भरणाद् रमणाद् वमनात्‌ सृष्टि-स्थिति-संहार-कारी पर-शिवो भैरवः।’
तंत्राचार्यों का मानना है कि वेदों में जिस परम पुरुष का चित्रण रुद्र में हुआ, वह तंत्र शास्त्र के ग्रंथों में उस स्वरूप का वर्णन ‘भैरव’ के नाम से किया गया, जिसके भय से सूर्य एवं अग्नि तपते हैं। इंद्र-वायु और मृत्यु देवता अपने-अपने कार्यों में तत्पर हैं, वे परम शक्तिमान् ‘भैरव’ ही हैं।
श्री तत्वनिधि नाम तंत्र-मंत्र में भैरव शब्द के तीन अक्षरों के ध्यान के उनके त्रिगुणात्मक स्वरूप का परिचय मिलता है, क्योंकि ये तीनों शक्तियां उनके समाविष्ट हैं-
मार्गशीर्ष कृष्ण पक्ष की अष्टमी के दिन मध्याह्न-काल में भगवान् काल-भैरव का अवतरण हुआ था । अतः इस दिन भैरव-जयंती ( कालभैरवाष्टमी )मनाई जाती है।
पुराणों में उल्लेख है कि शिव के रूधिर से भैरव की उत्पत्ति हुई। बाद में उक्त रूधिर के दो भाग हो गए- पहला बटुक भैरव और दूसरा काल भैरव। भगवान भैरव को असितांग, रुद्र, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण और संहार नाम से भी जाना जाता है। भगवान शिव के पांचवें अवतार भैरव को भैरवनाथ भी कहा जाता है। नाथ सम्प्रदाय में इनकी पूजा का विशेष महत्व है।
स्कंदपुराण के काशी- खंड के 31वें अध्याय में उनके प्राकट्य की कथा है। गर्व से उन्मत ब्रह्माजी के पांचवें मस्तक को अपने बाएं हाथ के नखाग्र से काट देने पर जब भैरव ब्रह्म हत्या के भागी हो गए, तबसे भगवान शिव की प्रिय पुरी ‘काशी’ में आकर दोष मुक्त हुए।
ब्रह्मवैवर्त्त पुराण के प्रकृत्ति खंडान्तर्गत दुर्गोपाख्यान में आठ पूज्य निर्दिष्ट हैं- महाभैरव, संहार भैरव, असितांग भैरव, रूरू भैरव, काल भैरव, क्रोध भैरव, ताम्रचूड भैरव, चंद्रचूड भैरव। लेकिन इसी पुराण के गणपति- खंड के 41वें अध्याय में अष्टभैरव के नामों में सात और आठ क्रमांक पर क्रमशः कपालभैरव तथा रूद्र भैरव का नामोल्लेख मिलता है। तंत्रसार में वर्णित आठ भैरव असितांग, रूरू, चंड, क्रोध, उन्मत्त, कपाली, भीषण संहार नाम वाले हैं।
भैरव पूजा में दिनों के अनुसार ‘दैनिक नैवेद्य’
रविवार को चावल-दूध की खीर। सोमवार को मोतीचूर के लड्डू। मंगलवार को घी-गुड़ अथवा गुड़ से बनी लापसी या लड्डू। बुधवार को दही-बूरा। गुरुवार को बेसन के लड्डू। शुक्रवार को भुने हुए चने। शनिवार को तले हुए पापड़, उड़द के पकौड़े या जलेबी का भोग लगाया जाता है।
भैरव भगवान् को प्रसन्न करने के कुछ उपाय –Content is available only for registered users. Please login or register

॥ कालभैरवाष्टकम् ॥
देवराजसेव्यमानपावनांघ्रिपङ्कजं व्यालयज्ञसूत्रमिन्दुशेखरं कृपाकरम् ।
नारदादियोगिवृन्दवन्दितं दिगंबरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ १॥
भानुकोटिभास्वरं भवाब्धितारकं परं नीलकण्ठमीप्सितार्थदायकं त्रिलोचनम् ।
कालकालमंबुजाक्षमक्षशूलमक्षरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ २॥
शूलटंकपाशदण्डपाणिमादिकारणं श्यामकायमादिदेवमक्षरं निरामयम् ।
भीमविक्रमं प्रभुं विचित्रताण्डवप्रियं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ३॥
भुक्तिमुक्तिदायकं प्रशस्तचारुविग्रहं भक्तवत्सलं स्थितं समस्तलोकविग्रहम् ।
विनिक्वणन्मनोज्ञहेमकिङ्किणीलसत्कटिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे॥ ४॥
धर्मसेतुपालकं त्वधर्ममार्गनाशनं कर्मपाशमोचकं सुशर्मधायकं विभुम् ।
स्वर्णवर्णशेषपाशशोभितांगमण्डलं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ५॥
रत्नपादुकाप्रभाभिरामपादयुग्मकं नित्यमद्वितीयमिष्टदैवतं निरंजनम् ।
मृत्युदर्पनाशनं करालदंष्ट्रमोक्षणं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ६॥
अट्टहासभिन्नपद्मजाण्डकोशसंततिं दृष्टिपात्तनष्टपापजालमुग्रशासनम् ।
अष्टसिद्धिदायकं कपालमालिकाधरं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ७॥
भूतसंघनायकं विशालकीर्तिदायकं काशिवासलोकपुण्यपापशोधकं विभुम् ।
नीतिमार्गकोविदं पुरातनं जगत्पतिं काशिकापुराधिनाथकालभैरवं भजे ॥ ८॥
॥ फल श्रुति॥
कालभैरवाष्टकं पठंति ये मनोहरं ज्ञानमुक्तिसाधनं विचित्रपुण्यवर्धनम् ।
शोकमोहदैन्यलोभकोपतापनाशनं प्रयान्ति कालभैरवांघ्रिसन्निधिं नरा ध्रुवम् ॥
॥ ॐ तत्सत् श्रीमत्परमहंसपरिव्राजकाचर्यस्य श्रीगोविन्दभगवत्पूज्यपादशिष्यस्य श्रीमच्छङ्करभगवतः कृतौ श्री कालभैरवाष्टकं ॥

॥ महाकाल भैरव स्तोत्रम् ॥
“ॐ महाकाल भैरवाय नम:”
जलद् पटल-नीलं दीप्यमानोग्रकेशं, त्रिशिख डमरू-हस्तं चन्द्रलेखा-वतंसं!
विमल वृष निरुढं चित्रशार्दूळ-वास:, विजयमनिशमीडे विक्रमोद्दण्ड-चण्डम्!!
सबल बल विघातं क्षेपाळैक पालम्, बिकट कटि कराळं ह्यट्टहासं विशाळम्!
करगत-करबाळं नाग-यज्ञोपवीतं, भज जन शिव-रूपं भैरवं भूत-नाथम्!!
॥ भैरव स्तोत्र ॥
यं यं यं यक्ष रूपं दश-दिशि-वदनं भूमि-कम्पायमानं।
सं सं सं संहार-मूर्ती शुभ मुकुट जटा-शेखरम् चन्द्र-बिम्बम्।।
दं दं दं दीर्घ-कायं विकृत-नख मुखं चौर्ध्वरोयं करालं।
पं पं पं पाप-नाशं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्।।1।।

रं रं रं रक्तवर्ण कटक कटितनुं तीक्ष्ण-दंष्ट्रा-विशालम्।
घं घं घं घोर घोष घ घ घ घ घर्घरा घोर नादम्।।
कं कं कं काल रूपं घग-घग घगितं ज्वालितं कामदेहं।
दं दं दं दिव्य-देहं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्।।2।।

लं लं लं लम्ब-दन्तं ल ल ल ल लुलितं दीर्घ जिह्व-करालं।
धूं धूं धूं धूम्र वर्ण स्फुट विकृत मुखं मासुरं भीम-रूपम्।।
रूं रूं रूं रुण्ड-मालं रूधिर-मय मुखं ताम्र-नेत्रं विशालम्।
नं नं नं नग्न-रूपं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्।।3।।

वं वं वं वायु-वेगम प्रलय परिमितं ब्रह्म-रूपं स्वरूपम्।
खं खं खं खड्ग-हस्तं त्रिभुवन-निलयं भास्करम् भीम-रूपम्।।
चं चं चं चालयन्तं चल-चल चलितं चालितं भूत चक्रम्।
मं मं मं माया-कायं प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्।।4।।

खं खं खं खड्ग-भेदं विषमऽमृतमयं काल कालान्धकारम्।
क्षि क्षि क्षि क्षिप्र-वेगं दह-दह दहन नेत्र संदिप्यमानम्।।
हूं हूं हूं हूंकार शब्दं प्रकटित गहन-गर्जित भूमिकम्पं।
बं बं बं बाल-लील प्रणमत सततं भैरवं क्षेत्रपालम्।।5।।

ॐ तीक्ष्ण-दंष्ट्र महाकाय कल्पांत दहन प्रभो! भैरवाय नमस्तुभ्यं अनुज्ञां दातु महर्षि!!

॥ श्रीकालभैरव पञ्च-रत्न स्तुतिः ॥
खङ्गं कपालं डमरुं त्रिशूलं हस्ताम्बुजे सन्दधतं त्रिणेत्रम् ।
दिगम्बरं भस्मविभूषिताङ्गं नमाम्यहं भैरवमिन्दुचूडम् ॥ १॥
कवित्वदं सत्वरमेव मोदान्नतालये शम्भुमनोऽभिरामम् ।
नमामि यानीकृतसारमेयं भवाब्धिपारं गमयन्तमाशु ॥ २॥
जरादिदुःखौघविभेददक्षं विरागिसंसेव्यपदारविन्दम् ।
नराधिपत्वप्रदमाशु नन्त्रे सुराधिपं भैरवमानतोऽस्मि ॥ ३॥
शमादिसम्पत्प्रदमानतेभ्यो रमाधवाद्यर्चितपादपद्मम् ।
समाधिनिष्ठैस्तरसाधिगम्यं नमाम्यहं भैरवमादिनाथम् ॥ ४॥
गिरामगम्यं मनसोऽपि दूरं चराचरस्य प्रभवादिहेतुम् ।
कराक्षिपच्छून्यमथापि रम्यं परावरं भैरवमानतोऽस्मि ॥ ५॥
॥ ॐ तत्सत् श्रृङ्गेरि श्रीजगद्गुरु श्रीसच्चिदानन्दशिवाभिनवनृसिंहभारतीस्वामिभिः विरचिता श्रीकालभैरवपञ्चरत्नस्तुतिः ॥

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