गायत्री मन्त्र द्वारा प्राण-वायु का संचार

जिस प्रकार नाग के मस्तिष्क में मणि स्थित रहती है, उसी प्रकार मानव-मस्तिष्क के ललाट में भी विभूतियों से ओत-प्रोत मणि स्थित है । यह मणि प्राण-वायु के विशेष सञ्चार के प्रभाव से समस्त विभूतियों की किरणों से जगमगा उठती है ।
गायत्री मन्त्र के साथ उसके प्रत्येक अक्षर के आधार पर निर्धारित देवियों के नामों का पाठ करने से सम्बन्धित नाड़ियों में प्राण-शक्ति का स्पन्दन प्रारम्भ हो जाता है, जिससे शरीरस्थ समस्त चक्रों की पँखुड़ियाँ प्रस्फुटित होती है । इसके साथ ही शरीर में प्राण-वायु का विशेष सञ्चार होने लगता है ।

प्रातः-काल, ठीक सूर्योदय के समय गायत्री-मन्त्र का जप करें । साथ ही चालीस नाड़ियों के नामों का पाठ करें । श्रद्धा और विश्वास के साथ ऐसा करने से कुछ ही दिनों में आप स्वयं अनुभव करेंगे कि आपके ललाट के भीतर स्थित मणि जगमगा उठी हैं । इससे आपके जीवन में नई स्फूर्ति और नई आशाओं का सञ्चार होगा । तब राजसी और तामसिक वृत्तियाँ शान्त होंगी ।

गायत्री मन्त्र का तीन बार उच्चारण करें –
“ॐ भूर्भुवः स्वः तत्-सवितुर्वरेण्यं भर्गो देवस्य धीमहि धियो यो नः प्रचोदयात् ।।”

– त्रिशक्त्यात्मक पर-ब्रह्म एवं परा-प्रकृति, भूः – पृथ्वी-लोक, भुवः – अन्तरिक्ष-लोक, स्वः – स्वर्ग-लोक, तत् – उस, सवितुः – सूर्य का, वरेण्यम् – श्रेष्ठ, भर्गः – तेज, देवस्य – देव का, धीमहि – हम ध्यान करते हैं, धियः – बुद्धियों (मन, बुद्धि, चित्त, अहंकार) को, यः – जो, नः – हमारी, प्रचोदयात् – प्रेरित करे (कल्याण के मार्ग पर) ।

उक्त गायत्री मन्त्र के ४० अक्षर और उनसे उद्भूत गायत्री-परक नाड़ियों के नामों के पाठ के लिए निम्न स्तोत्र का पाठ करें –

1 तत्त्वज्ञा ज्ञान-दात्री च, 2 तत्त्व-ज्ञान-प्रबोधिनी
शास्त्रे ख्याता सदा वन्द्या, 3 सर्व-शास्त्रार्थ-वादिनी ।।
विबुधेषे च विज्ञेया, 4 विबुधार्थ-स्वरुपिणी
सर्वज्ञा सर्वदा देवी 5 तुर्या-मार्ग-प्रदर्शिनी ।।
सनातना 6 रमा दिव्या, 7 वयोवस्था-विवर्जिता
रेवायाः रम्य-तीर्थे च, 8 रेवा-तीर-निवासिनी ।।
आगमैक-सदा रुपा, 9 निखिलागम-वेदिनी
10 यमुना 11 मोक्षदा रम्या, 12 भक्ताभीष्ट-प्रदायिनी ।।
भक्ताभीष्ट-प्रदा 13 रम्या, 14 गोवर्धन-विवर्धिनी
शान्ति-प्रिया च विघ्नेशी, 15 देशोपद्रव-नाशिनी ।।
वर-दात्री सर्वदा सा, 16 वक्र-तुण्ड-वर-प्रदा
17 स्यन्द-रुपा 18 योग-गम्या, ज्ञान-विज्ञान-सौख्यदा ।।
19 धीर-वन्द्या वन्दिता च, 20 महा-वैरि-विनाशिनी
समग्रेषु च कार्येषु 21 हित-कर्म-फल-प्रदा ।।
22 धिषणा 23 योधिनी सान्या, 24 योग-क्षेम-विहारिणी
25 नव-सिद्धि-समाराध्या, 26 प्रभवा 27 रोग-शमनी ।।
28 चोरघ्नी चोर-हन्त्री च, 29 दक्षिणामूर्ति-रुपिणी
वन्द्या च वेद-माता सा, 30 यात्रा-पाप-विवर्जिता ।।
स्तोतव्या छन्दसां माता, 31 तुरीय-पथ-गामिनी
32 पर-ब्रह्मात्मिका ब्राह्मी 33 रागेशी, 34 रमणी-प्रिया ।।
35 जगत्-प्रिया, 36 सेव्यमाना परमा 37 सागराम्बरा
38 वेदाक्षर-परीतांगी, 39 दोहिनी 40 माधवी तथा ।।

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