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गो-मय गणपति उपासना
‘गो-मय गणपति उपासना’– २१ दिनों की अति-प्रभावी उपासना है। यह उपासना किसी भी मास की शुक्ल चतुर्थी या शुभ दिन से प्रारम्भ की जा सकती है।
संकल्पः- ॐ तत्सत् अद्यैतस्य ब्रह्मणोऽह्यि द्वितीय-प्रहरार्द्धे श्वेत-वराह-कल्पे जम्बू-द्वीपे भरत-खण्डे आर्यावर्त्त-देशे अमुक पुण्य-क्षेत्रे कलि-युगे कलि-प्रथम-चरणे ‘अमुक’-नाम संवत्सरे भाद्रपद-मासे शुक्ल-पक्षे चतुर्थी-तिथौ अमुक-वासरे अमुक-गोत्रोत्पन्नो अमुक नाम-शर्मा-वर्मा-दास गणपति-देवता -प्रीति-पूर्वक त्वरित द्रव्य-प्राप्त्यर्थे अहं गो-मय गणपति-पूजनं करिष्यामि।
(उक्त संकल्प में ‘अमुक’- शब्द के स्थान पर सम्बन्धित नाम कहे।)
‘संकल्प’ करने के बाद ‘गो-मय-गणेश-मूर्ति’ को श्रद्धा-पूर्वक पूजा-स्थान में रखे और प्रार्थना करे-
‘प्रसन्न-वदनं ध्यायेत्, सर्व-विघ्नोपशान्तये। अभीप्सितार्थ-सिद्धयर्थं, पूजितोऽयं सुरासुरैः।।’
न्यासः- ॐ नमो वक्र-तुण्डाय’– मन्त्र से ‘षडंग-न्यास’ करे।
पूजनः- न्यास करने के बाद ‘ॐ नमो वक्र-तुण्डाय– मन्त्र से पूजन करे। यथा-
१॰ ॐ नमो वक्र-तुण्डाय पादयोः पाद्यं समर्पयामि। २॰ ॐ नमो वक्र-तुण्डाय शिरसि अर्घ्यं समर्पयामि। ३॰ ॐ नमो वक्र-तुण्डाय गन्धाक्षतं समर्पयामि। ४॰ ॐ नमो वक्र-तुण्डाय पुष्पं समर्पयामि। ५॰ ॐ नमो वक्र-तुण्डाय धूपं घ्रापयामि। ६॰ ॐ नमो वक्र-तुण्डाय दीपं दर्शयामि। ७॰ ॐ नमो वक्र-तुण्डाय नैवेद्यं समर्पयामि। ८॰ ॐ नमो वक्र-तुण्डाय आचमनीयं समर्पयामि। ९॰ ॐ नमो वक्र-तुण्डाय ताम्बूलं समर्पयामि। १०॰ ॐ नमो वक्र-तुण्डाय दक्षिणां समर्पयामि।
मन्त्र-जपः- “ॐ नमो वक्र-तुण्डाय” मन्त्र का १००८ बार जप करे। मन्त्र-जप के बाद एक बार पुनः “ॐ नमो वक्र-तुण्डाय”– मन्त्र से षडंग-न्यास करे। इस प्रकार २१ दिन पूजन जप करे।
विसर्जनः- २१ दिन पूजन जप करने के बाद २२ वें दिन ‘अनेन जपाख्येन कर्मणा भगवान् गो-मय गणपतिः वक्र-तुण्डाय प्रियंताम्।’ कहते हुए गो-मय मूर्ति पर उदक छोडे। फिर ‘ नमो वक्र-तुण्डाय विसर्जयामि’ कहकर मूर्ति भूमि पर रखे। बाद में किसी जलाशय में इसे विसर्जित करे।

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