॥ अथ चौरगणपति मंत्र प्रयोगः ॥

‘भूत शुद्धि’ के बाद “चौरमन्त्रन्यास” करना चाहिए, क्योंकि ‘वर्णविलास तन्त्र’ में कहा है कि —

चौरमन्त्रं महामन्त्रं, पञ्चाशत्गणतोषणं ।
चौरमन्त्रं विना भद्रे ! शान्तिस्वस्त्ययनं कुतः ॥

चौर गणपति की साधना करने वाला स्वयं के जपफल की तो रक्षा करता ही है दूसरों की सिद्धि को भी हरण कर सकता है । ‘वर्णविलासतन्त्र’ में ही यह बताया गया है कि ‘चौरमन्त्र’ का न्यास किए बिना किसी भी ‘देवकार्य’ को नहीं करना चाहिए । यथा —

॥ श्रीगणेश उवाच ॥
अधुनाऽहं प्रवक्ष्यामि, चौरमन्त्रमतः शृणु ।
चौरमन्त्रपरिज्ञानं, विना हि ब्राह्मणीश्वरि ! ॥
पुराणं प्रपठेद् यस्तु, स एव मूर्तिमान् कलिः ।
परजन्मनि पापिष्ठः, स भवेचौरकुक्कुरः ॥
शिवपूजा, विष्णुपूजा, शक्तिपूजा तथैव च ।
सर्वपूजासु यत् तेजो, हरते गणपः स्वयम् ॥
पञ्चाशद्गणदेवानं, ज्योतिषिं मुनिपुङ्गवाः ।
प्रतिद्वारपथे दत्वा, प्रतिपद्येषु जृम्भते ॥
हरन्ति जपतेजा, प्रतिपद्येषु संस्थिताः ।
जपपूजासु यत्तेजस्तत्र चौरा गणाधिपः ॥
तस्माच्चौरप्रबोधार्थं चौरमन्त्रं जपेद् दश ।
ततस्तु पूजयेद् धीमान्, यस्य या इष्टदेवताः ॥

अर्थात् ‘चौरमन्त्र’ का जप’ न करने से सभी प्रकार की शिवपूजा, विष्णुपूजा, शक्तिपूजा पाठ व्यर्थ हो जाते हैं । कार्य के प्रारम्भ में ही ‘चौरमन्त्र’ द्वारा शरीर के समस्त छिद्रों को द्वार के समान बन्द कर लेना चाहिए, जिससे ५० देवता ‘जप’ के फल को नष्ट न कर सकें । शरीर के छिद्रद्वार तथा द्वारों में ‘चौरमन्त्र’ का जप’ “गणेशविमर्षिणी तन्त्र” के अनुसार निम्न प्रकार है —

कर्णद्वयं तथा चक्षुर्द्वयं नासा मुखं ततः ।
नाभिस्थाने लिङ्गमूले, गुह्यस्थाने तथैव च ॥
मनोद्वारं भुवोर्मध्ये, दशैकं द्वारमीरितम् ।
प्रतिद्वारे न्यसेन्मन्त्रं, चौराख्यं ब्राह्मणीश्वरि ! ॥
अंकुशं प्रथमं वीजं, हृदये दशधा जपेत् ।
प्रजपान्ते ततो मातः, कवाटं निक्षिपेत् ततः ॥
ह्रीं ह्रीं वीजद्वयमिति, विन्यसेन्नयनद्वये ।
कर्णयोश्च तथा ह्रीं ह्रीं हुं हुं नासाद्वये तथा ॥
मुखे स्त्रीं द्विविधं वीजं, नाभौ क्लीं सुभगेश्वरि !
ह्सौः वीजं लिङ्गमूले, गुह्ये ब्लूं परिकीर्तितं ॥
हुंकारं च भ्रूवोर्मध्ये, मनस्थाने तथैव च ।
एतदेकादशद्वारे, चौरमन्त्राणि विन्यसेत् ॥
दशधा चौरमन्त्रं च, एकधा वापि वीजकं ।
अनेनैव जपेनापि, प्रतिद्वारे कवाटकं ॥

अर्थात् शरीर के दस द्वारों में ‘चौरमन्त्र’ का जप’ इस प्रकार से करना चाहिए —
शरीर के स्थान — बीजमन्त्र   — जपसंख्या
हृदय                — क्रों       — १० बार
दोनों नेत्र     — ह्रीं ह्रीं १० बार — २० बार
दोनों कान   — ह्रीं ह्रीं १० बार — २० बार
दोनों नाक   — हुं हुं १० बार   — २० बार
मुख            — स्त्रीं स्त्रीं      — १० बार
नाभि     — क्लीं         — १० बार
लिङ्गमूल    — ह्सौः        — १० बार
गुह्य             — ब्लूं         — १० बार
भ्रूमध्य        — हुं          — १० बार
मनस्थले  — हुं           — १० बार
शिर           — ह्रीं स्त्रीं क्लीं   — १० बार

 

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