जय जगदम्बिके !

हो रही सुशोभित लिए खड्ग-गदा-चक्र-चाप,
परिधान शूल भुशुण्डि और शंख भी सुघोष हैं ।
नील घनश्याम रंग नेत्र हैं विशाल तीन,
अंग-अंग साज रहे छवि के सु-कोष हैं ।।

भक्त-जन ध्यावें जिनके कोमल चरण दस,
पावें सुत बित ज्ञान मोक्ष सौं सु-पोष हैं ।
ऐसी महा-काली गल मुण्ड-माल धारि,
करें रक्षा हमारी यही भक्त को सु-तोष हैं ।।

जोड़े खड़े हैं कर त्रि-देव भी समक्ष जिनके,
गा – गा विरद वेद पार नहीं पाते हैं ।
हो रहे नत चरणों में ऋषि – मुनि -सिद्ध,
यह गन्धर्व गान गा – गा रिझाते हैं ।।

बैठा बाम बबर सिंह मुँह को फुलाए हुए,
जिसकी चिंघार ही सों दैत्य भाग जाते हैं ।
विकट रव करते भैरव चलते सदा ही आगे,
उसी परा अम्बा को भक्त भी मनाते हैं ।।

महिषासुर मारिनी विदारिनी निशुम्भ शुम्भ,
चण्ड – मुण्ड – घातिनी बनी हो देवि चण्डिके !
रक्त-बीज का तो वीज नाश ही किया,
हुम मात्र से ही धूम्र-लोचन प्रान भञ्जिके ।।

काँपती जो थी दिशाएँ स्थिर हुई हों शान्त,
ऋषि मुनि देव गुण गान करें अम्बिके !
असामयिक अग्नि और उल्का-पात शान्त हुए,
भक्त हो प्रसन्न कहें जय जगदम्बिके ।।

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