तरिगोंडा वेंगमाम्बा

भक्त जब कवि बनता है या कवि में जब भक्ति का उदय होता है, तब काव्य का सृजन ही नहीं होता, बल्कि काव्य के माध्यम से भक्ति का भी विकास होता है । भक्त-कवियों की कृतियाँ एवं उनके व्यक्तित्व ही इसके साक्ष्य हैं । आन्ध्र की मीरा समझी जाने वाली तरिगोंडा वेंगमाम्बा इसी कोटि की कवियित्री हैं । यह तो स्पष्ट है कि वेंगमाम्बा के आगमन के पहले ही वैष्णव भक्ति-दर्शन का तेलुगु में समृद्ध विकास हुआ था और वेंगमाम्बा के जीवन-व्यक्तित्व के परिचय से यह स्पष्ट भी होती है कि वेंगमाम्बा बचपन से ही इसी भक्ति-दर्शन में दीक्षित हुईं, परन्तु वेंगमाम्बा की पारिवारिक एवं सामाजिक परिस्थितियों ने न केवल उनके व्यक्तित्व को प्रभावित किया, बल्कि उनके भक्ति-दर्शन को भी प्रभावित किया ।
वेंगमाम्बा का जन्म एक उच्चवर्गीय ब्राह्मण परिवार में हुआ । गाँव में उनकी गौरवपूर्ण छवि थी, सामाजिक प्रतिष्ठा भी उन्हें प्राप्त थी । पारिवारिक परम्पराओं के अनुसार वेंगमाम्बा का विवाह अल्पायु में किया गया । विवाह तक औरे विवाह के बाद भी वेंगमाम्बा को किसी पारिवारिक एवं सामाजिक संघर्ष का सामना नहीं करना पड़ा, परन्तु शीघ्र ही उनके जीवन में बड़ा भारी परिवर्तन आया । वह परिवर्तन वेंगमाम्बा के पति के निधन होने से हुआ । तबसे उनके पारिवारिक एवं सामाजिक जीवन में परिवर्तन एवं संघर्ष शुरु हो गया । इन्हीं परिस्थितियों ने वेंगमाम्बा को विलक्षण व्यक्तित्व दिया ।
बचपन से ही वेंगमाम्बा सामान्य बालिका नहीं थीं । कहा जाता है कि माता-पिता ने श्रीवेंकटेश्वर से सन्तान की मनौती की । परिणामस्वरुप वेंगमाम्बा का जन्म हुआ । इसलिये श्रीवेंकटेश्वर के प्रति श्रद्धावश उसका नाम ‘वेंगमाम्बा’ रखा गया । बचपन से ही वेंगमाम्बा ईश्वरीय चिन्तन के प्रति श्रद्धा रखती थी । कई-कई घण्टे योग-साधना करती थीं । सांसारिक क्रिया-कलापों के प्रति रुचि बहुत कम रखती थीं । उनके इस स्वभाव के कारण ही उनके विवाह में बड़ी बाधा आयी । आखिर विवाह तो हुआ, लेकिन वैवाहिक बन्धनों में वे ज्यादा दिन तक रह नहीं सकीं । बेटी के मानसिक स्वभाव और उसकी प्रतिबद्धता को देखते हुए उनके पिता ने रुपावतारम् सुब्रह्मण्य शास्त्री के हाथों से उन्हें आध्यात्मिक दीक्षा दिलायी । तबसे वेंगमाम्बा पूरी तरह आध्यात्मिक एवं भक्ति दर्शन में डूब गयी । आगे फिर उन्हें उस दुनिया से कोई हटा नहीं सका ।
कम उम्र में वैधव्यता को प्राप्त होने पर भी वेंगमाम्बा को कोई दुःख नहीं हुआ, बल्कि उन्हें लगा कि उन्हें एक प्रकार से मुक्ति ही मिली । वे साक्षात् श्रीवेंकटश्वर को ही अपना पति समझती थीं । इसलिये पति के मरने के बाद भी सुहाग-द्रव्यों, फूल, कुंकुम आदि का त्याग उन्होंने नहीं किया । इस कारण से उन्हें सामाजिक प्रकोप का भाजन बनना पड़ा, फिर भी वेंगमाम्बा ने अपने विचार नहीं बदले । इसन्हीं संघर्षमय परिस्थितियों ने वेंगम्मा को वेंगमाम्बा बनाया यानि वे योग-तपस्विनी बन गयीं । तरिगोंडा छोड़कर वे तिरुमल पहाड़ पर आकर रहने लगी । तत्पश्चात् तिरुमल पहाड़ और तिरुमल पहाड़ के ‘तुम्बुर कोन’ वेंगमाम्बा की साधना के क्षेत्र रहे । आजीवन वहीं रहते हुए उन्होंने तपस्विनी एवं कवयित्री के रुप में अपने को तथा अपने जीवन को श्रीवेंकटेश्वर को ही समर्पित कर दिया । अपनी महिमा से उन्होंने कई बार तिरुमल के भक्तों को भक्ति का मार्ग दिखाया और अपनी अनुपम कृतियों से श्रीवेंकटेश्वरतत्त्व को भावी भक्तों को प्रदान किया । तिरुमल पहाड़ पर ही अपना स्थान बनाकर अपने वृन्दावन में विकसित पुष्पों एवं तुलसी-मालाओं से श्रीवेंकटेश्वर को सजाना और दिनभर मन्दिर में रहकर उनका कीर्तन गाना और एकान्त-सेवा के समय कर्पूर-आरती उतारकर घर लौटना उनकी दिनचर्या बन गयी थी । घर लौटने के बाद सत्संगति एवं काव्य-लेखन-पाठन करना उनको अत्यन्त पसन्द था । उनकी लेखनी से निकली विवध कृतियों से उनके भक्ति-दर्शन को समझा जा सकता है ।
वेंगमाम्बा के कृतित्व के तीन सोपान देखे जा सकते हैं । तिरुमल पहाड़ के दर्शन के पहले वेंगमाम्बा के इष्ट-आराध्य तरिगोंडा के नृसिंह हैं । तिरुमल पहाड़ पर आने के बाद उन्होंने कृष्ण और वेंकटेश्वर को आराध्य बनाकर रचनाएँ लिखीं । फिर भी अपनी कृतियों में तरिगोंडा नृसिंह का भी उन्होंने उल्लेख किया है । उनके भक्ति-दर्शन का यह वैशिष्ट्य है कि उन्होंने तरिगोंडा नृसिंह, तिरुमल के वेंकटेश्वर और गोकुल के श्रीकृष्ण में अभेद माना है । नृसिंह, वेंकटेश्वर, श्रीकृष्ण, चेंचीता आदि सरल तथा सहज पात्रों की योजना से वेंगमाम्बा ने अपने गम्भीर भक्ति-दर्शन को जनसुलभ बनाया है । कहा जाता है कि वेंगमाम्बा ने लगभग अठारह कृतियाँ लिखी हैं । वेंगमाम्बा ने अपनी कृतियों के माध्यम से वेदान्त एवं वैष्णव भक्ति का प्रबोधन किया है । वेंगमाम्बा के भक्ति-दर्शन में भक्ति और ज्ञान का सहज संगम है । वेंगमाम्बा ने यह कहा है कि कर्तृत्व उनका अपना नहीं है, बल्कि तरिगोंडाधीश का है । उनकी कृपा से ही कृतित्त्व सम्भव हो पाया है । उनबके आदेश पर ही यह हुआ है, इसलिये इसमें उनका कोई श्रेय नहीं है । यह बात उन्होंने कई सन्दर्भों में कही है । ‘वेंकटाचल-माहात्म्य’ की निम्न पंक्तियाँ इसका प्रमाण हैं –
चेरि तरिगोंडापुर नारसिंहदेवु डानतिच्चिन रीतिग नेनिमित्त ।
मात्रमै पल्कुदुन स्वमामर्थमिप्पु डरसि चूचिनगानि ना यंदु लेदु ।।
अर्थात् तरिगोंडाधीश के आदेश के अनुसार ही मैं सिर्फ निमित्त बनकर बोलरही हूँ, अपना सामर्थ्य कुछ भी नहीं है । कईं सन्दर्भों में वेंगमाम्बा ने कहा कि ईश्वर ही एक कुशल गायक या वीणा बजाने वाले की तरह मुझसे इस रुप में बुलवा रहा है । यह विनय के कारण बतायी गयी बात नहीं, बल्कि गम्भीर अनुभूति के माध्यम से कही गयी बात है ।
वेंगमाम्बा ने प्राणियों को जरायुज, अण्डज, स्वेदज और उद्भिज नामक चार वर्गों में बाँटा है । इनमें मनुष्य का सम्बन्ध जरायुजवर्ग से है । वह श्रेष्ठ भी है; क्योंकि वेदान्तज्ञान का बोध सिर्फ मनुष्य ही कर सकता है । वेंगमाम्बा के अनुसार –
ई चतुर्विध भूतमुलंदु बडु-हेच्चु मानवजन्ममु ।
नीचमनि चूडरादु तद्यमी-निर्णयमु नारायणा ।।
चतुर्विध भूतों में भी मनुष्य ही श्रेष्ठ है । ऐसा श्रेष्ठ जन्म तभी सार्थक होता है, जब मनुष्य भक्तिमार्ग को अपनाता है । वेंगमाम्बा का ‘नारायणशतक’ काव्य मनुष्य को भक्तिमार्ग पर ले जाने वाल महान् काव्य है ।

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