त्रिविध फल-दायक शाबर मन्त्र
मन्त्रः-
१॰ “या भुज ते महिषासुर मारि, औ शुम्भ-निशुम्भ दोऊ दल थम्बा । आरत हेतु पुकारत हौं, जाइ कहाँ बैठी जगदम्बा ?।। खड्ग टूटो कि खप्पर फूटो कि सिंह थको, तुमरो जगदम्बा ! आज तोहे माता भक्त शपथ, बिनु शान्ति दिए जनि सोवहु अम्बा ! ।।”

२॰ “जे भुज ते महिषासुर मारो, शुम्भ-निशुम्भ हत्यो बल-थम्बा । सेवक को प्रण राख ले मात ! भई पर-मन्त्र तुही अवलम्बा ।। आरत होय पुकारत हौं, कर ते तरवार गहो जगदम्बा ! आनि तुम्हें शिव-विष्णु की, जनि शत्रु बधे बिन सोवहु अम्बा !।।
बाँधों, बाँधों अम्मरताई । जहाँ तहाँ जाई । जेहि बाँधि मँगावों, तेहिं का बाँधि लाओ । वाचा चूके, उमा सूखै । श्री बावन वीर ले जाय, सात समुन्दर तीर । त्रिवाच फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।
ॐ आं ह्रीं । पश्चिम दिशा में सोने का मठ, सोने का किवार, सोने का ताला, सोने की कुञ्जी, सोने का घण्टा, सोने की सांकुली । पहिली साँकुली अठारह कुल नाग बाँधों, दूसरी साँकुली अठारह कुल-जाति को बाँधूँ, तीसरी साँकुली बैरी-दुश्मन को बाँधों, चौथी साँकुली डाकिनी-शाकिनी को बाँधों, पाँचवीं साँकुली भूत-प्रेत को बाँधों । जलत अगिन बाँधों, जलत मसान बाँधों, जल बाँधों, थल बाँधों, बाँधों अम्मरताई । जहाँ भेजूँ, तहाँ जाई । जेहि बाँधि मँगावों, तेहिं का बाँधि लाओ । वाचा चूकै, उमा सूखै । श्रीबावन वीर ले जाय, समुन्दर तीर । त्रिवाचा फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।

ॐ आं ह्रीं । उत्तर दिशा में रुपे का मठ, रुपे का किवार, रुपे का ताला, रुपे की कुञ्जी, रुपे का घण्टा, रुपे की सांकुली । पहिली साँकुली अठारह कुल नाग बाँधों, दूसरी साँकुली अठारह कुल-जाति को बाँधूँ, तीसरी साँकुली बैरी-दुश्मन को बाँधों, चौथी साँकुली डाकिनी-शाकिनी को बाँधों, पाँचवीं साँकुली भूत-प्रेत को बाँधों । जलत अगिन बाँधों, जलत मसान बाँधों, जल बाँधों, थल बाँधों, बाँधों अम्मरताई । जहाँ भेजूँ, तहाँ जाई । जेहि बाँधि मँगावों, तेहिं का बाँधि लाओ । वाचा चूकै, उमा सूखै । श्रीबावन वीर ले जाय, समुन्दर तीर । त्रिवाचा फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।
ॐ आं ह्रीं । पूरब दिशा में तामे का मठ, तामे का किवार, तामे का ताला, तामे की कुञ्जी, तामे का घण्टा, तामे की साँकुली । पहिली साँकुली अठारह कुल नाग बाँधों, दूसरी साँकुली अठारह कुल-जाति को बाँधूँ, तीसरी साँकुली बैरी-दुश्मन को बाँधों, चौथी साँकुली डाकिनी-शाकिनी को बाँधों, पाँचवीं साँकुली भूत-प्रेत को बाँधों । जलत अगिन बाँधों, जलत मसान बाँधों, जल बाँधों, थल बाँधों, बाँधों अम्मरताई । जहाँ भेजूँ, तहाँ जाई । जेहि बाँधि मँगावों, तेहिं का बाँधि लाओ । वाचा चूकै, उमा सूखै । श्रीबावन वीर ले जाय, समुन्दर तीर । त्रिवाचा फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।
ॐ आं ह्रीं । दक्षिण दिशा में अस्थि का मठ, अस्थि का किवार, अस्थि का ताला, अस्थि की कुञ्जी, अस्थि का घण्टा, अस्थि की साँकुली । पहिली साँकुली अठारह कुल नाग बाँधों, दूसरी साँकुली अठारह कुल-जाति को बाँधूँ, तीसरी साँकुली बैरी-दुश्मन को बाँधों, चौथी साँकुली डाकिनी-शाकिनी को बाँधों, पाँचवीं साँकुली भूत-प्रेत को बाँधों । जलत अगिन बाँधों, जलत मसान बाँधों, जल बाँधों, थल बाँधों, बाँधों अम्मरताई । जहाँ भेजूँ, तहाँ जाई । जेहि बाँधि मँगावों, तेहिं का बाँधि लाओ । वाचा चूकै, उमा सूखै । श्रीबावन वीर ले जाय, समुन्दर तीर । त्रिवाचा फुरो मन्त्र, ईश्वरी वाचा । ॐ काल-भैरौ, वटुक-भैरौ, भूत-भैरौ ! महा-भैरव, महा-भय-विनाशनं देवता । सर्व-सिद्धिर्भवेत् ।

विधिः-
उक्त दोनों मन्त्रों की विधि एक ही है । नवरात्र में नित्य भगवती का पूजन कर एक हजार जप करें । फिर प्रयोग करें । यथा –
१॰ सायं-काल दक्षिणाभिमुख होकर पीपल (अश्वत्थ) की डाल हाथ में लेकर, हाथ ऊँचा उठाकर, नित्य 21 बार पढ़ने से शत्रु परास्त होंगे ।
२॰ रात्रि में पश्चिमाभिमुख होकर उक्त क्रिया-सहित 21 बार पाठ करने से पुष्टि-कर्म की सिद्धि होगी ।
३॰ ब्राह्म-मुहूर्त में पूर्वाभिमुख होकर हाथ में कुश लेकर उक्त क्रिया-पूर्वक 7 बार पाठ करने से शान्ति-कर्म की सिद्धि होगी ।
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विधिः- सरसों के तेल का दीपक जला कर सामने रखे और घी की आहुति देते हुए १०८ बार जप करके गजावे । प्रयोग करते समय ‘काँस’ का धनुष और ‘बाँस’ का तीर बनाकर पूजा करे । जौ (यव) को घृत-सिक्त कर शत्रु के नाम से हवन करे, तो कुछ दिनों में शत्रु नहीं रहेगा ।
विशेष चेतावनीः- यह प्रयोग अत्यन्त उग्र है । विशेष परिस्थिति में ही प्रयोग करें । आत्म-रक्षा का विशेष प्रबन्ध रखे । शाबर-मन्त्रों के प्रयोग उग्र होते हुए भी सरलता से वापस लौटाए जा सकते हैं । विपरीत चालन की स्थिति में ये अत्यधिक मारक होकर साधक को ही संकट में डाल देते हैं । अतः विशेष सावधानी रखे ।

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