॥ त्रि-त्रिंशदक्षर त्र्यम्बक मन्त्र प्रयोगः ॥
शारदातिलक

मन्त्र:-

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगंधिं पुष्टिवर्धनम् ।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात् ॥”

ऋचा के पहले ॐ लगायें । आगे व पीछे दोनों ओर लगाने से ३४ अक्षर का मन्त्र हुआ ।

विनियोगः – ॐ अस्य त्र्यम्बक मन्त्रस्य वसिष्ठ ऋषिः, अनुष्टप् छन्दः त्र्यम्बकपार्वतीपतिर्देवता, त्र्यं बीजं, बं शक्तिः, कं कीलकं सर्वेष्ट सिद्ध्यर्थे जपे विनियोगः ।

ऋषिन्यासः – ॐ वसिष्ठर्षये नमः शिरसि । अनुष्टप् छंदसे नमः मुखे । त्र्यम्बकपार्वतीपतिर्देवतायै नमः हृदि । त्र्यं बीजाय नम: गुह्ये । बं शक्तये नमः पादयोः । कं कीलकाय नमः नाभौ । विनियोगाय नमः सर्वाङ्गे ।

अङ्गन्यास करन्यास षडङ्गन्यास
ॐ त्र्यंबकं अंगुष्ठाभ्यां नमः । हृदयाय नमः ।
यजामहे तर्जनीभ्यां नमः । शिरसे स्वाहा ।
सुगंधिं पुष्टिवर्धनं मध्यमाभ्यां नमः । शिखायै वषट् ।
उर्वारुकमिव बंधनान् अनामिकाभ्यां नमः । कवचाय हुँ ।
मृत्योर्मुक्षीय कनिष्ठिकाभ्यां नमः । नेत्रत्रयाय वौषट् ।
मामृतात् करतल करपृष्ठाभ्यां नमः । अस्त्राय फट् ।

॥ मन्त्रवर्णन्यासः ॥
ॐ त्र्यं नमः पूर्वमुखे । ॐ बं नमः पश्चिममुखे । ॐ कं नमः दक्षिणमुखे । ॐ यं नमः उत्तरमुखे । ॐ जां नमः उरसि । ॐ मं नमः कण्ठे । ॐ हे नमः मुखे । ॐ सुं नमः नाभौ । ॐ गं नमः हृदि । ॐ धिं नमः पृष्ठे । ॐ पुं नमः कुक्षौ । ॐ ष्टिं नमः लिङ्गे । ॐ वं नमः गुदे । ॐ र्धं नमः दक्षिणोरुमूले । ॐ नं नमः वामोरुमूले । ॐ नमः दक्षिणोरुमध्ये । ॐ र्वां नमः वामोरुमध्ये । ॐ रूं नमः दक्षिणजानुनि । ॐ कं नमः वामजानुनी । ॐ मिं नमः दक्षिणजानुवृत्ते । ॐ वं नमः वामजानुवृत्ते । ॐ बं नमः दक्षिणस्तने । ॐ धं नमः वामस्तने । ॐ नां नमः दक्षिणपार्श्वे । ॐ मृं नमः वामपार्श्वे । ॐ त्यों नमः दक्षिणपादे । ॐ मैं नमः वामपादे । ॐ क्षीं नमः दक्षिणकरे । ॐ यं नमः वामकरे । ॐ मां नमः दक्षनासायाम् । ॐ मुं नमः वामनासायम् । ॐ तां नमः मूर्ध्नि ।

पदन्यासः- ॐ त्र्यंबकं शिरसि । यजामहे भ्रुवोः । सुगंधिं नेत्रयोः । पुष्टिवर्धनं मुखे । उर्वारुकं गण्डयोः । इव हृदये । बंधनात् जठरे । मृत्योः लिङ्गे । मुक्षीय हृदये । मा जान्वोः । अमृतात् पादयोः । मूलमन्त्र से व्यापकन्यास करें ।

॥ ध्यानम् ॥
हस्ताभ्यां कलशद्वयामृतरसैराप्लावयंतं शिरो
द्वाभ्यां तौ दधतं मृगाक्षवलये द्वाभ्यां वहंतं परम् ।
अङ्कन्यस्तकरद्वयामृतघटं कैलाशकांतं शिवं
स्वच्छांभोजगतं नवेन्दुमुकुटं देवं त्रिनेत्रं भजे ॥

॥ यन्त्रावरण पूजनम् ॥


लिङ्गतोभद्रमण्डल या सर्वतोभद्रमण्डल पर ‘मण्डूकादि परतत्वांत पीठ देवतायै नमः’ से पूजन कर शिव की नवपीठशक्तियों का पूजन करें ।

पूर्वादिक्रमेण – ॐ वामायै नमः । ॐ ज्येष्ठायै नमः । ॐ रोद्रे्यै नमः । ॐ काल्यै नमः । ॐ कलविकरण्यै नमः । ॐ बलविकरण्यै नमः । ॐ बलप्रमथिन्यै नमः । ॐ सर्वभूतदमन्यै नमः । मध्ये – ॐ मनोन्मन्यै नमः ।

स्वर्ण या ताम्र यंत्र का अग्न्युत्तारण करें, दुग्धजल धारा से शोधन का भद्रमण्डल पर – ॐ नमो भगवते सकलगुणात्मशक्तियुक्ताय अनंताय योगपीठात्मने नमः । इसके बाद प्रधानदेव का पूजन करें । पुष्पाञ्जलि प्रदान करते हुये विनम्रभाव से आज्ञा मांगें —
ॐ संविन्मयः परो देवः परामृतरसप्रियः ।
अनुज्ञां शिव मे देहि परिवारार्चनाय च ॥

यंत्र पूजा में प्रत्येक देवता की नामावलि में प्रथमा से सम्बोधन करते हुये ‘पादुकां पूजयामि तर्पयामि’ से पुष्पगंधार्चन व तर्पण करें ।

प्रथमावरणम् – (षट्कोणे) – अग्निकोणे ॐ त्र्यंबकं हृदयाय नमः । हृदये श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि । (नैऋत्ये) यजामहे शिरसे स्वाहा, शिर श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि । (वायवे) सुगंधि पुष्टिवर्धनं शिखायै वषट् । शिखा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि । (ईशाने) उर्वारुकमिव बंधनान् कवचाय हुं । कवच श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि । (देवाग्रे) मृत्योर्मुक्षीय नेत्रत्रयाय वौषट् । नेत्र श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि । (मध्ये) मामृतात् अस्त्राय फट् । अस्त्र श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि । पुष्पाञ्जलि देवें —
अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल ।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम् ॥

यह पढ़कर और पुष्पाञ्जलि देकर विशेषार्घ से जलविन्दु गिरा कर ‘पूजितास्तर्पिताः सन्तु’ यह कहे ।

द्वितीयावरणम् – (अष्टदले पूर्वादिक्रमेण) – ॐ अर्कमूर्तये नमः, अर्कमूर्ति श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि । (इसी तरह सभी जगह कहते हुये गंधार्चन तर्पण करें)। ॐ इन्द्रमूर्तये नमः । ॐ वसुधामूर्तये नमः । ॐ तोयमूर्तये नमः । ॐ वह्निमूर्तये नमः । ॐ वायुमूर्तये नमः । ॐ आकाश मूर्तये नमः । ॐ यजमान मूर्तये नमः ।
इससे अष्ट मूर्तियों की पूजा करके पुष्पाञ्जलि देवे —
अभिष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल ।
भक्त्या समर्पयेतुभ्यं द्वितीयावरणार्चनम् ॥

यह पढ़कर और पुष्पाञ्जलि देकर विशेषार्घ से जलविन्दु गिरा कर ‘पूजितास्तर्पिताः सन्तु’ यह कहे ।

तृतीयावरणम् – (तद्वाहेऽष्टदले प्राचीक्रमेण) – ॐ रमायै नमः, रमा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि । (इसी तरह सभी जगह कहते हुये गंधार्चन तर्पण करें)। ॐ राकायै नमः, राका श्री पादुका॰ । ॐ प्रभायै नमः, प्रभा श्री पादु॰ । ॐ ज्योत्स्नायै नमः, ज्योत्स्ना श्री पादु॰ । ॐ पूर्णायै नमः, पूर्णा श्री पादु॰.। ॐ उषायै नमः, उषा श्री पादु॰ । ॐ पूरण्यै नमः, पूरणी श्री पादु॰ । ॐ सुधायै नमः, सुधा श्री पादु॰ ।
इससे अष्ट शक्तियों की पूजा करके पुष्पाञ्जलि देवे —
अभिष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल ।
भक्त्या समर्पयेतुभ्यं तृतीयावरणार्चनम् ॥

यह पढ़कर और पुष्पाञ्जलि देकर विशेषार्घ से जलविन्दु गिरा कर ‘पूजितास्तर्पिताः सन्तु’ यह कहे ।

चतुर्थावरणम् – (तद्वाहेऽष्टदले प्राचीक्रमेण) – ॐ विश्वायै नमः, विश्वा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि । (इसी तरह सभी जगह कहते हुये गंधार्चन तर्पण करें)। ॐ विद्यायै नमः, विद्या श्री पादु॰.। ॐ सितायै नमः, सिता श्री पादु॰ । ॐ प्रह्वायै नमः, प्रह्वा श्री पादु॰ । ॐ सारायै (रारायै) नमः, सारा श्री पादु॰ । ॐ संध्यायै नमः, संध्या श्री पादु॰ । ॐ शिवायै नम, शिवा श्री पादु॰ । ॐ निशायै नमः, निशा श्री पादु॰ ।
इससे अष्ट शक्तियों की पूजा करके पुष्पाञ्जलि देवे —
अभिष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल ।
भक्त्या समर्पयेतुभ्यं चतुर्थावरणार्चनम् ॥

यह पढ़कर और पुष्पाञ्जलि देकर विशेषार्घ से जलविन्दु गिरा कर ‘पूजितास्तर्पिताः सन्तु’ यह कहे ।

पञ्चमावरणम् – (तद्वाहेऽष्टदले प्राचीक्रमेण) – ॐ आर्यायै नमः, आर्या श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि । (इसी तरह सभी जगह कहते हुये गंधार्चन तर्पण करें)। ॐ प्रज्ञायै नमः, प्रज्ञा श्री पादु॰ । ॐ प्रभायै नमः, प्रभा श्री पादु॰ । ॐ मेधायै नमः, मेधा श्री पादु॰ । ॐ शान्त्यै नमः, शान्ति श्री पादु॰ । ॐ कान्त्यै नमः, कान्ति श्री पादु॰ । ॐ धृत्यै नमः, धृति श्री पादु॰ । ॐ मृत्यै नमः, (अन्यत्र ॐ सत्यै नमः भी है) मृति श्री पादु॰ ।
इससे अष्ट शक्तियों की पूजा करके पुष्पाञ्जलि देवे —
अभिष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल ।
भक्त्या समर्पयेतुभ्यं पञ्चमावरणार्चनम् ॥

यह पढ़कर और पुष्पाञ्जलि देकर विशेषार्घ से जलविन्दु गिरा कर ‘पूजितास्तर्पिताः सन्तु’ यह कहे ।

षष्ठमावरणम् – (तद्वाहेऽष्टदले प्राचीक्रमेण) – ॐ धरायै नमः, धरा श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि । (इसी तरह सभी जगह कहते हुये गंधार्चन तर्पण करें)। ॐ मायायै नमः (पाठान्तर उमायै नमः) माया श्री पादु॰ । ॐ अवन्यै नमः, (पाठान्तर पावन्यै) अवनि श्री पादु॰ । ॐ पद्मायै नमः पद्मा श्री पादु॰ । ॐ शान्तायै नमः, शांता श्री पादु॰ । ॐ मोघायै नमः (पाठान्तर मोघायै नमः) मोघा श्री पादु॰ । ॐ जयायै नमः, जया श्री पादु॰ । ॐ अमला नमः, अमलायै श्री पादु॰ ।
इससे अष्ट शक्तियों की पूजा करके पुष्पाञ्जलि देवे —
अभिष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल ।
भक्त्या समर्पयेतुभ्यं षष्ठावरणार्चनम् ॥

यह पढ़कर और पुष्पाञ्जलि देकर विशेषार्घ से जलविन्दु गिरा कर ‘पूजितास्तर्पिताः सन्तु’ यह कहे ।

सप्तमावरणम् – भूपूर में इन्द्रादि दिक्पालों की पूजा करें । ॐ इन्द्राय नमः, इन्द्र श्री पादुकां पूजयामि तर्पयामि । (इसी तरह सभी जगह कहते हुये गंधार्चन तर्पण करें)। ॐ अग्नये नमः, अग्नि श्री पादु॰ । ॐ यमाय नमः, यम श्री पादु॰ । ॐ निर्ऋतये नमः, निरुत श्री पादु॰ । ॐ वरुणाय नमः, वरुण श्री पादु॰ । ॐ वायवे नमः, वायु श्री पादु॰ । ॐ कुबेराय नमः, कुबेर श्री पादु॰ । ॐ ईशानाय नमः, ईशान श्री पादु॰ । ॐ ब्रह्मणे नमः ब्रह्मा श्री पादु॰ । ॐ अनन्ताय नमः, अनन्त श्री पादु॰ ।
इससे अष्ट शक्तियों की पूजा करके पुष्पाञ्जलि देवे —
अभिष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल ।
भक्त्या समर्पयेतुभ्यं सप्तमावरणार्चनम् ॥

यह पढ़कर और पुष्पाञ्जलि देकर विशेषार्घ से जलविन्दु गिरा कर ‘पूजितास्तर्पिताः सन्तु’ यह कहे ।

अष्टमावरणम् – इन्द्रादि के समीप भूपूर में उनके आयुधों की पूजा करें । ॐ वज्राय नमः । ॐ शक्तयै नमः । ॐ दण्डाय नमः । ॐ खगाय नमः । ॐ पाशाय नमः । ॐ अङ्कुशाय नमः । ॐ गदायै नमः । ॐ त्रिशूलाय नमः । ॐ पद्माय नमः । ॐ चक्राय नमः ।
सभी का गंधाक्षत मिश्रित पुष्पों या पत्तियों से पूजन एवं तर्पण कर पुष्पञ्जलि देवें ।
अभिष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सल ।
भक्त्या समर्पयेतुभ्यं अष्टमावरणार्चनम् ॥

यह पढ़कर और पुष्पाञ्जलि देकर विशेषार्घ से जलविन्दु गिरा कर ‘पूजितास्तर्पिताः सन्तु’ यह कहे ।

इस प्रकार आवरण पूजा करके जप करें ।

इसका पुरश्चरण एक लाख जप है । दश द्रव्यों से दशांश होम और तत्तद्दशांश तर्पण, मार्जन तथा ब्राह्मण भोजन करना चाहिये । ऐसा करने से मन्त्र सिद्ध हो जाता है । सिद्ध मन्त्र से साधक प्रयोगों को सिद्ध करे । कहा भी गया है कि ‘जितेन्द्रिय साधक ध्यान करता हुआ इस मन्त्र का एक लाख जप करे । घी से सिक्त दश द्रव्यों से दश हजार आहुतियाँ दे ( बेल फल, तिल, खीर, घी, दूध, दही, दूर्वा, वट की समिधा, पलाश की समिधा एवं खैर की समिधा इन्हें दश द्रव्य कहा गया है । बेल, पलाश, खैर, तिल, सरसों, दूध, दही तथा दूब इन सब को होम के लिये कहा गया है । ऐसा करने पर यह महामन्त्र प्रयोग के योग्य हो जाता है ।

सुधी साधक सम्पत्ति के लिये बेल की समिधा से दश हजार आहुतियाँ देवे । ब्रह्मतेज के लिये पलाश की समिधाओं से होभ करे । खैर की समिधाओं से होम करने पर कान्ति तथा पुष्टि प्राप्त होती है। वटवक्ष की समिधाओं से दश हजार आहुतियाँ देने पर साधक शीघ्र ही धन धान्य से समृद्ध हो जाता है। तिल की दश हजार आहुतियाँ देने से साधक सभी पापों से छूट जाता है। पीली सरसों से दश हजार होम करने से राजा शत्रु पर विजय प्राप्त कर लेता है। इसी विधान से साधक अकालमृत्यु पर भी विजय प्राप्त कर लेता है । खीर से किया गया होम रक्षा, श्री, कीति तथा कान्ति देनेवाला होता है। गाय के दूध से शुद्ध अन्न का होम करके साधक कृत्या का नाश कर देता है। यही होम शान्ति, श्री तथा सम्पत्ति का देनेवाला भी माना गया है । दही का होम करने से दो द्वेषियों के बीच बातचीत करा सकता है । यदि साधक प्रतिदिन १०८ दूबों का होम करे तो वह समस्त बीमारियों को जीतकर दीर्घायु प्राप्त करता है। यदि घी मिश्रित अन्न का दूध के साथ जामुन की समिधा से प्रदीप्त अग्नि में होम करता है तो उसे अनिन्दित लक्ष्मी, आरोग्य और विपुल यश प्राप्त होता है । यदि साधक जितेन्द्रिय होकर अपने जन्म दिन में गाय के घी तथा दूध से सिक्त दूब के द्वारा दो हजार हवन करता है तो वह समस्त रोगों से मुक्त होकर सौ वर्ष तक जीवित रहता है । गम्भारी की तीन समिधाओं, दूध और अन्न से पृथक्-पृथक् तीन सौ आहुतियां देकर अन्त में ब्राह्मणों को मधुर भोजन कराया जाय और आदरपूर्वक गुरु को धन-धान्य से प्रसन्न किया जाय तो साधक नैरोग्य प्राप्त करके लक्ष्मी के साथ दीर्घायु प्राप्त करता है। घी और दूध के साथ अन्न से पर्व पर होम करने से ६ मास में साधक राजलक्ष्मी को प्राप्त करता है, इसमें कोई संशय नहीं है ।
लाजैर्विशुद्धैजुहुयात्कन्या सैषा वराप्तये ।
क्षीरद्रुमसमिद्धोमाद्ब्राह्मणा दीन् वशं नयेत् ।
स्नात्वा सहस्रं प्रजपेदादित्याभिमुखो मनुम् ।
आधिव्याधि विनिर्मुक्तो दीर्घमायुरवाप्नुयात् ।

जो कन्या वर प्राप्ति के लिये विशुद्ध लावा से तथा क्षीरी वृक्षों की समिधाओं से हवन करती है वह ब्राह्मणों आदि को वश में कर लेती है। जो स्नान करके सूर्याभिमुख होकर एक हजार मन्त्र का जप करता है वह शारीरिक तथा मानसिक रोगों से विमुक्त होकर दीर्घायु प्राप्त कर लेता है । इस मन्त्र से अपनी सभी इष्ट कामनाओं की सिद्धि करनी चाहिये ।

 

 

 

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