देवी भ्रमर-वासिनी
(‘दुर्गा-सप्तशती’ के ग्यारहवें अध्याय में महा-माया ने अपने अवतारों की सूचना दी है, उनमें से “भ्रामरी-देवी” सर्व-शेष अवतार है । देवी का कहना है कि वे शेष-अवतार के रुप में षष्टि-तम महायुग में आविर्भूत होंगी । जिस समय अरुण नामक महाऽसुर तीनों लोकों का उत्पीड़न करेगा, उस समय वे जगज्जननी भ्रामरी-रुप से प्रकट होंगी । उनका शरीर असंख्य भ्रमरों से घिरा रहेगा और यही मूर्ति ‘अरुणासुर’ का वध करेगी, तब इनका नाम ‘भ्रामरी’ होगा । ये अतीव तेज-पुञ्ज-कलेवरा, दुर्निरीक्ष्य-देहा और विचित्र-कान्ति-मती हैं । इनका सर्वाङ्गह सुगन्धित अनुलेपन द्वारा विलेपित और विचित्र भूषणों द्वारा सुशोभित, हस्त-समूह नाना-जातीय भ्रमर-राजि से पूर्ण होगा । इनका दूसरा नाम “महा-मारी” है ।
कश्मीर के इतिहास ‘राज-तरंगिणी’ के रचयिता ‘कल्हण’ ने भ्रमर-वासिनी देवी के विषय में एक विचित्र कहानी का अवतरण ‘राज-तरंगिणी’ में दिया है । ऐतिहासिक-विदों ने एक ओर कल्हण-वर्णित इस अलौकिक कथानक को अविश्वास-पूर्ण कहा है, दूसरी ओर इस कथानक की कल्पना-शक्ति की प्रशंसा की है । आस्तिक समाज के लिए यह कथानक आज भी, पौराणिक कथानकों के समान पवित्र एवं विविध रहस्यों से पूर्ण है । आशा है ‘वैदिकजगत” के पाठक-बन्धु इसे ध्यान से पढ़ेंगे और इसके रहस्यों का मनन कर आनन्दित होंगे ।)
ईसा की तीसरी शताब्दी के प्रारम्भिक काल की बात है । काश्मीर का एक जुआरी, दूसरे धूर्त जुआरियों के द्वारा बुरी तरह प्रताड़ित और लूट लिया गया । बेचारे का सर्वस्व स्वाहा हो गया । इस अवस्था में जीवित रहना वृथा समझकर, वह ‘आत्म-हत्या’ करने को उद्यत हुआ, किन्तु आत्म-घात के पहले उसके मन में अचानक यह विचार उठा कि ‘यदि मरना ही है, तो क्यों न एक बार कुछ यत्न कर लिया जाए । सम्भव है भाग्य साथ दे जाए ! सुना है, विन्ध्याचल में देवी भ्रमर-वासिनी नियत अधिष्ठिता है । यदि उनका दर्शन मिले, तो अवश्य कुछ फल मिलेगा । इसलिए मेरे भाग्य में चाहे जो हो, अपने भरसक देवी के दर्शन के लिए अवश्य प्रयत्न करुँगा ।’
देवी भ्रमर-वासिनी तक पहुँचना मनुष्य के लिए दुःसाध्य था क्योंकि देवी-मन्दिर के आस-पास पाँच योजन तक का स्थान सर्वदा ही ऐसे भ्रमरों से पूर्ण रहता था, जो अनेक प्रकार के थे और जिनकी प्रकृति बड़ी भीषण थी । कुछ भौरों की पूँछ शंकु की तरह थी, जिनका नाम ‘शंकु-पुच्छ’ था और जो भ्रमर अपनी दुमों में वज्र की शक्ति धारण करते थे, वे ‘वज्र-पुच्छ’ नाम से प्रसिद्ध थे । इन सब भ्रमरों के काटने से देवी के दर्शनाभिलाषियों की देह क्षत-विक्षत हो जाती थी और यदि ये एक साथ मिलकर डँसते थे, तो प्राणों की रक्षा का कोई उपाय ही नहीं रहता था ।
वह जुआरी भी बहुत चतुर था और फिर देवी-दर्शनों के लिए, वह अपने जीवन की बाजी लगा चुका था । इसलिए ‘शंकु-पुच्छ’ और ‘वज्र-पुच्छ’ के दंशन निष्फल करने के लिए उसने पहले तो एक लोहे के वर्म (कवच) से अपने को सिर से पैर तक ढक लिया । फिर उसके ऊपर कई पर्त ‘भैंसे का चमड़ा’ लपेटा । उसके ऊपर कई पर्त ‘गोबर का लेप’ लगाया । इस प्रकार अपने को सुरक्षित करके वह चल पड़ा । दूर से देखने से ऐसा प्रतीत होता था, मनो ‘मिट्टी का एक खम्बा’ चला जा रहा है ।
इस प्रकार के भारी बोझ से लदे हुए चलना कितना क्लेश-दायक था ! जुआरी दो-चार कदम चलने के बाद ही थक जाता था और पसीने से लस्त हो जाता था । फिर भी वह चलता ही गया और अन्त में विन्ध्य-पर्वत की गुहा में प्रविष्ट हुआ । उसका घुसना था कि चारों तरफ से भौंरों ने उसे घेर लिया और गुँजने लगे । उनका गुञ्जन-शब्द इतना तीव्र था कि ‘वर्म’ के अन्दर होने पर भी वह वधिर हो रहा था, किन्तु उस चलते हुए वर्मावृत जुआरी का भ्रमर-गण कुछ नहीं कर पाए क्योंकि भौंरे जैसे ही मिट्टी और गोबर को डंश मारते थे, उसमें से धूल निकल कर भौंरों जी आँखों में भर जाती थी और वे लौट जाते थे ।
इस प्रकार जुआरी आगे बढ़ता गया और भौंरे भी करोड़ों की संख्या में उसके पीछे लगे रहे । भौंरों के एक गिरोह के धूल से अन्धे होकर लौटते-न-लौटते, दूसरा झुण्ड उस पर आक्रमण कर देता था । इस प्रकार तीन योजन रास्ता समाप्त होने तक, भौंरों ने ‘गोबर के लेप’ को साफ कर दिया । इसके बाद चटाचट की आवाज जुआरी को सुनाई पड़ी, जिससे उसे मालूम हो गया कि भौंरों ने मिट्टी साफ कर दी है अब चमड़े को डँस रहे हैं । चौथे योजन की दूरी पर ‘महिष-चर्म’ का आवरण भी कट गया । अब भौंरे लौह को काटने लगे, जिससे टनाटन की आवाज होने लगी ।
जुआरी समझ गया कि लोहा कटते ही भ्रमर उसको खा जाएँगे, परन्तु वह विचलित नहीं हुआ और अपने भरसक तेजी से भागने लगा । परिश्रम, भय और गुफा के अन्दर स्वच्छ वायु के अभाव से, उसका सारा शरीर पसीने से लस्त हो गया, प्यास से ‘प्राण-वायु’ छूटनी ही चाहती थी, फिर भी वहदौड़ रहा था । देवी के मन्दिर का मार्ग आधा योजन मात्र रह गया था कि ‘वज्र-पुच्छ’ भ्रमरों ने उस ‘लौह-वर्म’ को भी बिल्कुल काट डाला । तब वह दोनों हाथों से भ्रमरों को हटाते हुए भागने लगा, परन्तु धीरे-धीरे वे उसका सब माँस खा गए । केवल स्नायु, शिरा और अस्थि रह गया । समस्त अंग रुधिरा-लुप्त था । ऐसी अवस्था में केवल आँखों को हाथों से बचाकर, देवी के सामने वह उपस्थित हुआ । उस समय सब भौंरे भाग गए ।
प्रकाश का अनुभव करके जुआरी ने आँखें खोलते ही सामने मन्दिर में एक ‘भीषणाकृति देवी-मूर्ति’ देखी, परन्तु भौंरों के काटने का कष्ट इतना असहनीय था कि उसी समय वह मूर्छित होकर ‘देवी के चरणों’ पर गिर पड़ा । जुआरी का शरीर यद्यपि भौंरों के दंशन से क्षत-विक्षत हो गया था, तथापि उसके शरीर में ‘प्राण-वायु’ अवशिष्ट थी, देवी ने कृपा-पूर्वक अपने अमृत-निस्पन्दी हाथों के स्पर्श-मात्र से उसे ‘दिव्य-देह’ प्रदान की ।
कुछ समय के अनन्तर वह जुआरी कुछ सचेत हुआ और चारों तरफ देखने लगा । ‘मन्दिर’-प्रवेश के समय जब वह रुधिराक्त था और जिस भयंकर देवी-मूर्ति के सामने मूर्छित होकर गिर पड़ा था, उस मूर्ति को उसने वहाँ नहीं पाया । वह उठकर इधर-उधर घूमने लगा । घूमते-घूमते उसने देखा कि निकट ही उपवन में, एक तालाब के किनारे, लता-गृह में, एक सर्व-सुलक्षणा श्यामा, नलिन-नयना, वर-वर्णिनी एक मूर्ति उपविष्टा है । वह अपूर्व मूर्ति, उसे कोई विन्ध्य-वासिनी अप्सरा प्रतीत हुई ।
उस लोक-ललाम-भूता दिव्य-ललना ने उससे कहा – हे सौम्य ! तुमको मार्ग में बहुत कष्ट मिला है । अतः कुछ समय विश्राम करो । इसके बाद अभीष्ट वर की प्रार्थना करना ।
उस जुआरी ने पहले ही से उनको कोई अप्सरा समझ रखा था । वह बोला – हे भद्रे ! आपके दर्शन से ही मेरा कष्ट दूर हो गया है ! किन्तु मैं आपसे पूछता हूँ कि आप तो देवी नहीं है, वर-प्रदान करने की शक्ति आप में कहाँ से आई ?
देवी ने हँसकर उत्तर दिया – मैं देवी हूँ या नहीं, इससे तुम्हे क्या मतलब ? तुमको तो वर चाहिए न ?
इस पर जुआरी ने चालाकी से देवी से वचन लिया कि उसका काम्य, देवी, के ‘वर-प्रदान’ से सिद्ध हो । देवी ने भी, उसके क्लेश से दया-वश हो, उसे वचन दे दिया ।
तब द्युतकर ने कहा – हे भद्रे ! आप मुझे पत्नी-भाव से भजन करिए ।
ऐसी बात सुनकर देवी स्तम्भित हुईं और बोली – तात ! यह कैसी अयोग्य प्रार्थना है ! मैं स्वयं विष्णु-शक्ति भ्रमर-वासिनी दुर्गा हूँ । इस असम्भव वर को छोड़कर कोई दूसरा वर माँगो ।
उनको देवी भ्रमर-वासिनी जानकर भी उसने अपनी माँग नहीं बदली और कहा – देवि ! आप भवानी ही हो अथवा मानवी, मेरी कोई दूसरी प्रार्थना नहीं । अवश्य आप क्रोधित होकर, इसी क्षण मेरा वध कर सकती हैं, परन्तु उससे मुझे कोई भय नहीं । यदि आप मुझे ईप्सित वरदान न करें, तो आप स्वयं ही सत्य-भंग के पाप से लिप्त होंगी ।
देवी को पश्चाताप हुआ । ‘अ-पात्र’ में दया दिखलाने से ऐसा ही होता है । अन्त में उन्होंने कहा – जा, दूसरे जन्म में तेरा अभीष्ट सिद्ध होगा ।’ यह कहकर अन्तर्निहत हुईं ।
द्युतकर अगले जन्म के लिए साधारण मृत्यु तक ठहर नहीं सका । ‘प्रयाग’ में आकर ‘अक्षय-वट-वृक्ष’ की शाखा से ‘संगम’ में कूदकर प्राणों का त्याग किया । दूसरे जन्म में उसी जुआरी ने काश्मीर के राज-वंश में रणादित्य तुञ्जीन के रुप में जन्म ग्रहण किया । उसके मस्तक पर एक अपूर्व ‘शंख-चिह्न’ था ।
उसी समय चोल देश का राजा रतिसेन भी समुद्र की पूजा करने गया था, जहाँ तरंगों के बीच उसे एक परम रुपवती कन्या मिल गई थी । उसका नाम रणारम्भा रखा गया था । शैशव ही से उस लड़की के मुख से ‘दिव्य-वाणी’ मिकलती थी । इससे रतिसेन को मालूम हो गया था कि उसकी उत्पत्ति किसी देवी के अंश से हुई है । इसी कारण विवाह-योग्या होने पर भी, उन्होंने उसके लिए वर नहीं ढूँढ़ा । बहुत से राजा-महाराजाओं ने उससे विवाह करने के लिए दूत भेजा, परन्तु रतिसेन ने सभी को अस्वीकार कर दिया । रणादित्य के मन्त्री ने भी अपने प्रभु के लिए कन्या को माँगा और रतिसेन प्रत्याख्यान करने ही वाले थे कि रणारम्भा ने बताया कि रणादित्य ही उसका निश्चित भर्त्ता है ।
यथा-समय रणादित्य के साथ रणारम्भा का विवाह हो गया । वह रणारम्भा ही देवी भ्रमर-वासिनी की मानवी मूर्ति थी । रणादित्य की पत्नी होते हुए भी, उसने इस प्रकार की माया फैलाई कि रणादित्य कभी भी उसे स्पर्श नहीं कर पाया । प्रत्येक रात्रि को वह ‘दैवी’-माया से अपने अनुरुप एक रमणी-मूर्ति बनाकर पति के पास भेजती थी और स्वयं ‘भ्रामरी’-रुप धारण कर विन्ध्याचल चली जाती थी । प्रातः-काल जब वक लौटती, तब वह नारी-मूर्ति अन्तर्धान हो जाती ।
कुछ समय बीतने पर राजा रणादित्य ने ‘शिव-प्रतिष्ठा’ का उद्योग किया । राज्य में उत्सव इत्यादि होने लगे, परन्तु प्रतिष्ठा के पूर्व-दिन, जब शिल्पी प्रतिष्ठा-योग्य दो शिव-लिंग बनाकर लाया, उस समय सभा-स्थित एक दैवज्ञ ने कहा – “महाराज, ये दोनों लिंग प्रतिष्ठा-योग्य नहीं हैं । इनके भीतर खोखला है और उसमें कई मेंढक हैं ।”
परीक्षा में यह बात सच पाई गई । उस समय दूसरी मूर्ति बनाने के लिए समय नहीं था । राजा को बहुत शोक हुआ कि अब मेरा व्रत भंग हो रहा है । तब महारानी ने राजा को आशा दिलाते हुए कहा – “महाराज ! आप शोक न करिए, कल प्रातः-काल प्रतिष्ठा योग्य मूर्ति मैं मँगवा दूँगी ।”
साथ ही उन्होंने एक बहुत पुरानी कहानी बताई कि हिमाचल-कन्या पार्वती के विवाह-समय ब्रह्मा ने पौरोहित्य किया था । ब्रह्मा ने जब अपनी नित्य अर्चनीय विष्णु-मूर्ति को पूजन के लिए निकाला तो महा-देव ने कहा – ” हे पितामह, शिव-पूजा न करके केवल विष्णु की पूजा असिद्ध है, क्योंकि हरि और हर परस्पर युग्म देवता हैं । विष्णु-प्रतिमा शक्ति-रुपा और शिव-प्रतिमा चैतन्य-स्वरुपा है । जैसे शिव और शक्ति के सम्मिलित न होने से पूर्ण पूजा का फल लाभ नहीं होता, उसी प्रकार हरि और हर को मिलित पूजा से रहित समस्त अर्चना निष्फल है ।”
तब उस विवाह में देवासुर-प्रदत्त रत्नोपहार से एक विश्व-विख्यात शिव-लिंग का निर्माण हुआ । कुछ दिन बाद उस विष्णु-मूर्ति के साथ उस शिव-लिंग को राजा रावण लंका ले गया । रावण वध के उपरान्त, वानरो ने कौतूहल-वश उन दोनों मूर्तियों को कुछ समय तक इधर-उधर किया तथा बाद में उन युग्म-मूर्तियों को उत्तर-मानस-हृद में फेंक दिया ।
रानी ने आश्वासन दिलाते हुए कहा कि उस युग्म-मूर्ति को, उन्होंने शिल्पियों की सहायता से निकलवाया है । प्रतिष्ठा के दिन, पूर्वाह्न में ही राज-प्रासाद में मूर्ति पहुँच जाएगी । रानी के कहने पर राजा को विश्वास हुआ ।
गम्भीर रात्रि में देवी ने गगन-पथचारी सिद्ध-गणों को मूर्ति लाने के लिए आज्ञा दी और उन्होंने मानस-सरोवर से उक्त हरि-हर मूर्तियाँ लाकर प्रासाद में रख दी । दूसरे दिन सवेरे राज-महल में, पारिजातादि दिव्य-पुष्प-शोभित अपूर्व हर-हरि-प्रतिमाओं को देखकर सभी विस्मित हुए और रानी रम्भा का ‘स्तुति’-गान करने लगे ।
राज्य में ‘ब्रह्मा’- नाम का एक सिद्ध, ‘देवी’-दर्शन की लालसा से, प्रच्छन्न-रुप से रानी का जल लाने का भार ग्रहण किए हुए था । रानी को यह बात मालूम थी । इस कारण उन्होंने प्रतिष्ठा-कार्य में उसी को प्रधान पुरोहित रुप से वरण किया । ‘ब्रह्मा’ को भी मालूम हो गया कि देवी से उसका स्वरुप छिपा नहीं है और सानन्द देवी की आज्ञा से आकाश-पथ पर जाकर, वहाँ से उतर कर ‘देव-मन्दिर’ के निकट आया । उसे आकाश से उतरते देख, जन-मण्डली विस्मय-विमुग्ध हुई ।
राजा रणादित्य परम शैव थे । अतएव जैसे ही उन्होंने पहले ‘शिव-प्रतिष्ठा’ का उद्योग किया, वैसे ही रानी रणारम्भा के प्रभाव से पीठ को विदीर्ण कर विष्णु-मूर्ति स्वयं ही पीठोपरि आविर्भूत हुई । रानी ने कहा – ‘महाराज, विष्णु ही शक्ति स्वरुप है – उन्हीं की प्रतिष्ठा प्रथम कर्तव्य है । शिव-प्रतिष्ठा पीछे करिएगा ।’ अनन्तर बड़ी धूम-धाम से वहाँ रण-स्वामी विष्णु और रणेश्वर महा-देव की प्रतिष्ठा सु-सम्पन्न हुई ।
देवी की कृपा से राजा को तीन सौ वर्ष की आयु और ‘हाटकेश्वर मन्त्र’ की सिद्धि प्राप्त हुई थी । इसी के फल-स्वरुप इष्टिक-पथ और नन्द-शिला स्थानों में, साधना करके महाराजा रणादित्य पाताल के अधिपति हुए थे । चन्द्रभागा नदी के जल-मध्य में, नमुचि-दानव निर्मित पाताल-प्रवेश-विवर-द्वार से वे पाताल गए थे । वह द्वार २१ दिन तक खुला था । उस द्वारा से केवल राजा ही नहीं, उनके प्रजा-वर्ग ने भी पाताल में जाकर नाना प्रकार के अलौकिक आनन्दों का लाभ किया था, ऐसी प्रसिद्धि है । नरपति के प्रजा-पुञ्ज सहित पाताल-प्रवेश के बाद, विष्णु-शक्ति-स्वरुपा भ्रमर-वासिनी की अवतार-भूता महिषी रणारम्भा श्वेत-द्वीप को चली गई ।

श्रीदुर्गा-सप्तशती- एकादश अध्याय
यदारुणाख्यस्त्रैलोक्ये महाबाधां करिष्यति ।। ५२।।
तदाऽहं भ्रामरं रूपं कृत्वासङ्खयेयषट्पदम् ।
त्रैलोक्यस्य हितार्थाय वधिष्यामि महासुरम् ।। ५३।।
भ्रामरीति च मां लोकास्तदा स्तोष्यन्ति सर्वतः ।
अर्थात् जब अरुण नामक दैत्य तीनों लोकों में भारी उपद्रव मचायेगा, तब मैं तीनों लोकों का हित करने के लिए छः पैरों वाले असंख्य भ्रमरों का रुप धारण करके उस महादैत्य का वध करुँगी । उस समय सब लोग ‘भ्रामरी’ के नाम से चारों ओर मेरी स्तुति करेंगे ।

श्रीदुर्गा-सप्तशती – मूर्ति-रहस्य
तेजोमण्डलुदुर्धर्षा भ्रामरी चित्रकान्तिभृत् । चित्रानुलेपना देवी चित्राभरण भूषिता ॥20॥
चित्रभ्रमरपाणिः सा महामारीति गीयते । इत्येता मूर्तयो देव्या याः ख्याता वसुधाऽधिप ॥21॥
अर्थात् भ्रामरी देवी की कान्ति विचित्र (अनेक रंग की) है। वे अपने तेजोमण्डल के कारण दुर्धर्ष दिखायी देती हैं । उनका अङ्गराग भी अनेक रंग का है तथा वे चित्र-विचित्र आभूषणों से विभूषित हैं ॥20॥ चित्रभ्रमरपाणि और महामारी आदि नामों से उनकी महिमा का गान किया जाता है । राजन्! इस प्रकार जगन्माता चण्डिका देवी की ये मूर्तियाँ बतलायी गयी हैं ॥21॥

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