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॥ पाण्डवकृत कात्यायनी स्तुति ॥
शत्रुओं पर विजय प्राप्त करने के लिये नित्य पाठ करें –

ततो धर्मसुतो राजा गुरून्युद्धे व्यवस्थितान् ।
भीष्मद्रोणमुखान्सर्वान्प्रणिपत्य पृथक् पृथक् ।
युद्धाय तैरनुज्ञात स्वरथ पुनरागमत् ॥ १ ॥

ततस्ते पाण्डवा सर्वे अवप्लुत्य रथोत्तमात् ।
संग्रामे जयलाभाय तुष्टुवुर्जगदम्विकाम् ॥ २ ॥
dugra
॥ पाण्डवा ऊचु ॥

कात्यायनि त्रिदशवन्दितपादपद्ये
विश्वोद्भवस्थितिलयैकनिदानरूपे ।
देवि प्रचण्डदलिनि त्रिपुरारिपत्नि
दुर्गे प्रसीद जगतां परमार्तिहन्त्रि ॥ ३ ॥

त्व दुष्टदैत्यविनिपातकरी सदैव
दुष्टप्रमोहनकरी किल दुःखहन्त्री ।
त्वा यो भजेदिह जगन्मयि तं कदापि
नो बाधते भवसु दुःखमचिन्त्यरूपे ॥ ४ ॥

त्वामेव विश्वजननीं प्रणिपत्य विश्वं
ब्रह्मा सृजत्यवति विष्णुरहोत्ति शम्भुः ।
काले च तान्सृजसि पासि विहंसि
मातस्वल्लीलयैव नहि तेऽस्ति जनैर्विनाशः ॥ ५ ॥

त्वं यैः स्मृता समरमूर्धनि दुःखहन्त्रि
तेषां तनुन्नहि विश्वन्ति विपक्षबाणाः ।
तेषां शरास्तु परगात्रनिमग्नपुङ्खाः
प्राणान्ग्रसन्ति दनुजेन्द्रनिपातकर्त्रि ॥ ४ ॥

यस्त्वन्मनुं जपति घोररणे सुदुर्गे
पश्यन्ति कालसदृशं किल तं विपक्षाः ।
त्वं यस्य वै जयकरी खलु तस्य वाक्त्राद्
ब्रह्माक्षरात्मकमनुस्तव निःसरेच्च ॥ ५ ॥

त्वामाश्रयन्ति परमेश्वरि ये भयेषु
तेषां भयं नहि भेदिह वा परत्र ।
तेभ्यो भयादिह सुदूरत एव दुष्टास्त्रस्ताः
पलायनपराश्च दिशो द्रवन्ति ॥ ६ ॥

पूर्वे सुरासुररणे सुरनायकस्त्वां
सम्प्रार्थयन्नसुरवृन्दमुपाजघान ।
रामोऽपि राक्षसकुलं निजघान
तद्त्वत्सेवनादृत इहास्ति जयो न चैव ॥ ७ ॥

तत्त्वां भजामि जयदां जगदेकवन्द्यां
विश्वाश्रयां हरिविरञ्चिसुसेव्यपादाम् ।
त्वं नो विधेहि विजयं त्वदनुग्रहेण
शत्रून्निपात्य समरे विजयं लभामः ॥ ८ ॥

( महाभागवत महापुराणे(देवी पुराण) अ॰ ५७ । १३-२० )

तब धर्मपुत्र राजा युधिष्ठिर युद्धमें मोर्चा बाँधकर डटे हुए भीष्म, द्रोण आदि प्रमुख गुरुजनों को पृथक्-पृथक् प्रणाम कर और उनसे युद्ध के लिये आज्ञा लेकर पुनः अपने रथ पर आ गये । उसके बाद उन सभी पाण्डवों ने उत्तम रथो से नीचे कूदकर युद्ध मे विजयप्राप्ति के लिये भगवती जगदम्बिका की स्तुति की ॥

पाण्डव बोले — देवताओं के द्वारा पूजित चरण-कमलों वाली तथा जगत् के उद्भव-पालन-संहार की कारणस्वरूपिणी कात्यायनी ! भीषण दुष्टों का नाश करनेवाली देवी त्रिपुरारिपत्नी ! संसार के महान कष्टों को दूर करनेवाली दुर्गा ! हम पर प्रसन्न होइये ॥ आप सर्वदा दुष्ट दैत्यों का संहार करती हैं, दुष्टों को विमोहित करती हैं । और भक्तों के दुःख का हरण करती हैं । जगद्व्यापिनी ! अचिन्त्यरूपा ! जो प्राणी त्रिलोकी मे आपकी आराधना करता है उसे कोई कष्ट कभी भी पीडित नहीं करता ॥ जगज्जननी आप भगवती को प्रणाम करके ही ब्रह्मा जगत् का सृजन करते हैं, विष्णु पालन करते हैं और शम्भु संहार करते हैं । माता ! आप समय-समय पर अपनी लीला से उनका (त्रिदेवों का) भी सृजन, पालन तथा विनाश करती हैं, किंतु आपका नाश किसी से कभी नहीं होता ॥ दुःखों का हरण करनेवाली भगवती ! जो लोग युद्धक्षेत्र मे आपका स्मरण करते हैं, उनके शरीर मे शत्रुओं के वाण प्रवेश नहीं कर पाते । अपितु श्रेष्ठ राक्षसों का सहार करनेवाली देवि ! शत्रुओं के शरीर मे पूँछ तक प्रविष्ट होनेवाले उनके बाण उन शत्रुओं के प्राण हर लेते हैं । जो मनुष्य अत्यन्त दुर्गम तथा भीषण संग्राम मे आपके मन्त्र को जप करता है, शत्रुगणों को वह साक्षात् काल के समान दिखायी देता है । जिसके मुख से आपका ब्रह्माक्षरस्वरुप मन्त्र उच्चरित होता है, आप निश्चितरूप से उसे विजय प्रदान करती हैं ॥ परमेश्वरी ! जो लोग भय की स्थितियों में आपका आश्रय ग्रहण करते हैं, उन्हें इस लोक में तथा परलोक में कहीं भी भय नहीं होता और दूर से ही उनसे भयभीत होकर दुष्टजन त्रस्त होते हुए सभी दिशाओं में भाग खड़े होते हैं ॥ पूर्वकाल में देवासुर-संग्राम में, देवराज़ इंन्द्र ने आपकी आराधना करके ही राक्षस समुदाय का संहार किया था और उसी तरह श्रीरामचन्द्र ने भी आपकी उपासना करके राक्षसकुल का वध किया था । देवी ! आपकी आराधना के बिना यहाँ विजय सम्भव नहीं है ॥ अतः हम विजय प्रदान करनेवाली, जगत् के प्राणियों द्वारा एकमात्र वन्दनीया, विश्व की आश्रयस्वरूपिणी तथा ब्रह्मा, विष्णु के द्वारा भली-भाँति पूजित चरणों वाली आप भगवती की आराधना करते हैं । आप हम लोगों को विजय प्रदान करे, आपकी कृपा से ही हमलोग संग्राम में शत्रुओं का सहार करके विजय प्राप्त करे ॥

 

 

 

 

 

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