पीताम्बरा पञ्चास्त्र मंत्राः
पीताम्बरा के पाँच विशेष उग्र मंत्र हैं, जो शत्रू समूह को नष्ट करने में समर्थ हैं । १॰ वडवामुखी, २॰ उल्कामुखी, ३॰ जातवेदमुखी, ४॰ ज्वालामुखी तथा ५॰ वृहद्भानुमुखी ।baglamukhi
|| वडवामुखी मंत्र ||
|| ॐ ह्लीं हूं ग्लौं बगलामुखि ह्लां ह्लीं ह्लूं सर्वदुष्टानां ह्लैं ह्लौं ह्लः वाचं मुखं स्तंभय ह्लः ह्लौं ह्लैं जिह्वां कीलय ह्लूं ह्लीं ह्लां बुद्धिं विनाशय ग्लौं हूं ह्लीं हुं फट् ||

विनियोगः- ॐ अस्य श्रीबगलामुखी-मन्त्रस्य वशिष्ठ ऋषिः, पंक्ति छन्दः, बगलामुखी देवता, ह्लीं बीजं, स्वाहा शक्तिः, सर्वशत्रु-क्षयार्थे जपे विनियोगः ।
ऋष्यादिन्यासः- नारद ऋषये नमः शिरसि । पंक्ति छन्दसे नमः मुखे । बगलामुखी देवतायै नमः हृदि । ह्लीं बीजाय नमः गुह्ये । स्वाहा शक्तये नमः पादयोः ।  सर्वशत्रु-क्षयार्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।

षडङ्ग-न्यास  कर-न्यास अंग-न्यास
ॐ ह्लीं हूं ग्लौं अंगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः
बगलामुखि तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा
ह्लां ह्लीं ह्लूं सर्वदुष्टानां मध्यमाभ्यां नमः शिखायै वषट्
ह्लैं ह्लौं ह्लः वाचं मुखं स्तंभय अनामिकाभ्यां नमः कवचाय हुं
ह्लः ह्लौं ह्लैं जिह्वां कीलय कनिष्ठिकाभ्यां नमः नेत्र-त्रयाय वौषट्
ह्लूं ह्लीं ह्लां बुद्धिं विनाशय ग्लौं हूं ह्लीं हुं फट् करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः अस्त्राय फट्

ध्यानः- हाथ में पीले फूल, पीले अक्षत और जल लेकर ‘ध्यान’ करे –

पीताम्बरधरां देवीं द्विसहस्रभुजान्विताम् ।
अर्द्ध जिह्वां गदां चार्द्धं धारयन्तीं शिवां भजे ।।

जपः- १२ लाख जप करें । हरताल की आहुति देवें ।

|| उल्कामुखी मंत्र ||

|| ॐ ह्लीं ग्लौं वगलामुखि ॐ ह्लीं ग्लौं सर्व-दुष्टानां ॐ ह्लीं ग्लौं वाचं मुखं पदं ॐ ह्लीं ग्लौं स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्लीं ग्लौं जिह्वां कीलय ॐ ह्लीं ग्लौं बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ ग्लौं ह्लीं ॐ स्वाहा ||

विनियोगः- ॐ अस्य श्रीबगलामुखी-मन्त्रस्य यज्ञवराह ऋषिः, अनुष्टुप् छन्दः, ह्लीं बीजं, स्वाहा शक्तिः, ॐ कीलकं सर्वशत्रु-क्षयार्थे जपे विनियोगः ।
ऋष्यादिन्यासः- यज्ञवराह ऋषये नमः शिरसि । अनुष्टुप् छन्दसे नमः मुखे । ह्लीं बीजाय नमः हृदि । स्वाहा शक्तये नमः गुह्ये । ॐ कीलकाय नमः पादयो । सर्वार्थ सिद्धयर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे ।

षडङ्ग-न्यास  कर-न्यास अंग-न्यास
ॐ ह्लीं ग्लौं अंगुष्ठाभ्यां नमः हृदयाय नमः
बगलामुखि तर्जनीभ्यां नमः शिरसे स्वाहा
ॐ ह्लीं ग्लौं सर्व-दुष्टानां मध्यमाभ्यां नमः शिखायै वषट्
ॐ ह्लीं ग्लौं वाचं मुखं पदं ॐ ह्लीं ग्लौं स्तम्भय स्तम्भय अनामिकाभ्यां नमः कवचाय हुं
ॐ ह्लीं ग्लौं जिह्वां कीलय कनिष्ठिकाभ्यां नमः नेत्र-त्रयाय वौषट्
ॐ ह्लीं ग्लौं बुद्धिं विनाशय ह्लीं ॐ ग्लौं ह्लीं ॐ स्वाहा करतल-कर-पृष्ठाभ्यां नमः अस्त्राय फट्

ध्यानः- हाथ में पीले फूल, पीले अक्षत और जल लेकर ‘ध्यान’ करे –

विलयानलसंकाशं वीरावेशन संस्थिता ।
वीराट्टहास महादेवी स्तम्भनास्त्रं भजाम्यहम् ।।

१४ लाख जप । हरताल की १ लाख आहुतियाँ देवे । सांख्यायन तंत्र में वीरावेशन संभृताम् । वीराश्रयां महादेवी स्तंभनार्थं भजाम्यहम् ।। लिखा है ।

|| जातवेदमुखी मंत्र ||

|| ॐ ह्लीं ह्सौं ह्लीं ॐ वगलामुखि सर्व-दुष्टानां ॐ ह्लीं ह्सौं ह्लीं ॐ वाचं मुखं स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्लीं ह्सौं ह्लीं ॐ जिह्वां कीलय ॐ ह्लीं ह्सौं ह्लीं ॐ बुद्धिं नाशय नाशय ॐ ह्लीं ह्सौं ह्लीं ॐ स्वाहा ||

पाठान्तर भेद में कहीं “पदं” नहीं है तथा विनाशय के स्थान पर नाशय है ।

विनियोगः- ॐ अस्य श्रीबगलामुखी-मन्त्रस्य, कालाग्निरुद्र ऋषिः, पंक्ति छन्दः, ॐ बीजं, ह्रीं शक्तिः, हूं कीलकं ममाभीष्ट सिद्धये जपे विनियोगः । (सांख्या॰ तंत्र में ह्लीं शक्ति, ह्रौं कीलक कहा है)

ध्यानम् – जातवेदमुखीं देवीं देवतां प्राणरुपिणीं ।
भजेऽहं स्तंभनार्थं च चिन्मयी विश्वरुपिणीम् ।।

पुरश्चरणः- ३० लाख जप ।

|| ज्वालामुखी मंत्र ||

|| ॐ ह्लीं रां रीं रुं रैं रौं प्रस्फुर प्रस्फुर ज्वाला-मुखि ॐ ह्लीं रां रीं रुं रैं रौं प्रस्फुर प्रस्फुर सर्व-दुष्टानां ॐ ह्लीं रां रीं रुं रैं रौं प्रस्फुर प्रस्फुर वाचं मुखं पदं स्तम्भय स्तम्भय ॐ ह्लीं रां रीं रुं रैं रौं प्रस्फुर प्रस्फुर जिह्वां कीलय कीलय ॐ ह्लीं रां रीं रुं रैं रौं प्रस्फुर प्रस्फुर बुद्धिं विनाशय विनाशय ॐ ह्लीं रां रीं रुं रैं रौं प्रस्फुर प्रस्फुर स्वाहा ||

पाठान्तर भेद में विनाशय के स्थान पर नाशय हैं तथा कईं आचार्यों का मत है कि ज्वालामुखि के स्थान पर बगलामुखि होना चाहिए ।

विनियोगः- ॐ अस्य श्रीबगलामुखी-मन्त्रस्य, अत्रि ऋषिः, गायत्री छन्दः, ह्लीं बीजं, स्वाहा शक्तिः, ॐ कीलकं सर्वशत्रु स्तंभनार्थे, क्षयार्थे जपे विनियोगः ।

ध्यानः- ज्वलत्पुञ्ज समायुक्तां कालानल समप्रभाम् ।
चिन्मयीं स्तंभनाद्देवीं भजेऽहं विधिपूर्वकम् ।।
१२ लाख जप, हरताल से २ लाख आहुति, गोदुग्ध से तर्पण ४ लाख, ब्राह्मण-भोजन दो हजार करे ।

|| वृहद्भानुमुखी मंत्र ||
|| ॐ ह्ल्रां ह्ल्रीं ह्ल्रूं ह्ल्रैं ह्ल्रौं ह्ल्रः ह्ल्रां ह्ल्रीं ह्ल्रूं ह्ल्रैं ह्ल्रौं ह्ल्रः ॐ वगलामुखि १४ सर्व-दुष्टानां वाचं मुखं पदं स्तम्भय स्तम्भय १४ जिह्वां कीलय १४ बुद्धिं नाशय १४ ॐ स्वाहा ||
पाठान्तर भेद “ह्ल्रां ह्ल्रीं” के स्थान पर “ह्लां ह्लीं” तथा विनाशय के स्थान पर नाशय है । यह विद्या शत्रु का तेजहरण तथा स्तंभन करती है । परविद्या स्तंभन कर स्वविद्या प्रकाशित करती है ।
विनियोगः- ॐ अस्य श्रीबगलामुखी-मन्त्रस्य, अत्रि ऋषिः, गायत्री छन्दः, ह्लीं बीजं, ह्रीं शक्तिः, ॐ कीलकं परसैन्य परविद्या स्तंभनार्थे स्वविद्या प्रकाशनार्थे जपे विनियोगः ।
ध्यानः-
कालानलनिभां देवीं ज्वलत्पुञ्ज शिरोरुहां ।
कोटिबाहु समायुक्तां वैरिजिह्वां समन्वितान् ।।
स्तंभनास्त्रमयीं देवीं दृढपीनपयोधराम् ।
मदिरामोद संयुक्तां वृहद्भानुमुखीं भजे ।।
१२ लाख जप, दशांश तालक हवन, गुडोदक तर्पण दशांश ब्राह्मण भोजन ।

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