प्रार्थना- तेरी पोर पै परयो रहूँ

मेरी चित्त-वृत्ति निज चर्नन में राखो नित,
दीजिए सु-भक्ति पाप-कर्म तैं डरयो रहूँ ।
होय कैं कृपाल मोह-जाल तैं निबेरो देवि !
पाय कैं विवेक-ज्ञान ध्यान से भरयो रहूँ ।।
क्रोध-लोभ-मच्छर के अच्छर समेट डारो,
जगत् जञ्जाल इन्द्र-जाल तें टरयो रहूँ ।
टेरत हूँ बार-बार फेरो जिन द्वार-द्वार,
ये ही उपचार तेरी पोर पै परयो रहूँ ।।
– मातृ-भक्त मुंशी माधवराम

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