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॥ ब्रह्मणा कृतं श्रीराधास्तोत्रम् ॥

॥ ब्रह्मोवाच ॥

हे मातस्त्वत्पदाम्भोजं दृष्टं कृष्णप्रसादतः ॥ १ ॥

सुदुर्लभं च सर्वेषां भारते च विशेषतः ।
षष्टिवर्षसहस्राणि तपस्तप्तं पुरा मया ॥ २ ॥

भास्करे पुष्करे तिर्थे कृष्णस्य परमात्मनः ।
आजगाम वरं दातुं वरदाता हरिः स्वयम् ॥ ३ ॥

वरंवृणीष्वेत्युक्ते च स्वाभिष्टं च वृतं मुदा ।
राधिकाचरणाम्भोजं सर्वेषामपि दुर्लभम् ॥ ४ ॥

हे गुणातित मे शीघ्रमधुनैव प्रदर्शय ।
मयेत्युक्तो हरिरयमुवाच मां तपस्विनम् ॥ ५ ॥

दर्शयिष्यामि काले च वत्सेदानीं क्षमेति च ।
न हीश्वराज्ञा विफला तेन दृष्टं पदाम्बुजम् ॥ ६ ॥

सर्वेषां वाञ्छितं मातर्गोलोके भारतेऽधुना ।
सर्वा देव्यः प्रकृत्यंशा जन्याः प्राकृतिका ध्रुवम् ॥ ७ ॥

त्वं कृष्णाङ्गार्धसम्भूता तुल्या कृष्णेन सर्वतः ।
श्रीकृष्णस्त्वमयं राधा त्वं राधा वा हरीः स्वयम् ॥ ८ ॥

न हि वेदेषु मे दृष्ट इति केन निरूपितम् ।
ब्रह्माण्डाद् बहिरूर्ध्वं च गोलोकोऽस्ति यथाम्बिके ॥ ९ ॥

वैकुण्ठश्चाप्यजन्यश्च त्वमजन्या तथाम्बिके ।
यथा समस्तब्रह्माण्डे श्रीकृष्णांशांश जीविनः ॥ १० ॥

तथा शक्तिस्वरूपा त्वं तेषु सर्वेषु संस्थिता ।
पुरुषाश्च हरेरंशास्वदंशा निखिलाः स्त्रियः ॥ ११ ॥

आत्मनो देहरूपा त्वमस्याधारस्त्वमेव हि ।
अस्या नु प्राणैस्त्वं मातस्वत्प्राणैरयमीश्वरः ॥ १२ ॥

किमहो निर्मितः केन हेतुना शिल्पकारिणा ।
नित्योऽयं च यथा कृष्णस्त्वं च नित्या तथाम्बिके ॥ १३ ॥

अस्यांशा त्वं त्वदंशो वाप्ययं केन निरूपितः ।
अहं विधाता जगतां वेदानां जनकः स्वयम् ॥ १४ ॥

तं पठित्वा गुरुमुखाद् भवन्त्येव बुधा जनाः ।
गुणानां वा स्तवानां ते शतांशं वक्तुमक्षमः ॥ १५ ॥

वेदो वा पण्डितो वान्यः को वा त्वां स्तोतुमीश्वरः ।
स्तवानां जनकं ज्ञानं बुद्धिर्ज्ञानाम्बिका सदा ॥ १६ ॥

त्वं बुद्धेर्जननी मातः को वा त्वां स्तोतुमीश्वरः ।
यद्वस्तु दृष्टं सर्वेषां तद्विवक्तुं बुधः क्षमः ॥ १७ ॥

यददृष्टाश्रुतं वस्तु तन्निर्वक्तुं च कः क्षमः ।
अहं महेशोऽनन्तश्च स्तोतुं त्वां कोऽपि न क्षमः ॥ १८ ॥

सरस्वती च वेदाश्च क्षमः कः स्तोतुमीश्वरि ।
यथागमं यथोक्तं च न मां निन्दितुमर्हसि ॥ १९ ॥

ईश्चराणामीस्वरस्य योग्यायोग्ये समा कृपा ।
जनस्य प्रतिपाल्यस्य क्षणे दोषः क्षणे गुणः ॥ २० ॥

जननी जनको यो वा सर्वं क्षमति स्नेहतः ।
इत्युक्त्वा जगतां धाता तस्थौ च पुरतस्तयोः ॥ २१ ॥

प्रणम्य चरणाम्भोजं सर्वेषां वन्द्यमीप्सितम् ।
ब्रह्मणा च कृतं स्तोत्रं त्रिसंध्यं यः पठेन्नरः ।
राधामाधवयोः पादे भक्तिं दास्यं लभेद् ध्रुवम् ॥ २२ ॥

कर्मनिर्मूलनं कृत्वा मृत्युं जित्वा सुदुर्जयम् ।
विलङ्घ्य सर्वलोकांश्च याति गोलोकमुत्तमम् ॥ २३ ॥

॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्ते ब्रह्मणा कृतं श्रीराधास्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥
(श्रीकृष्णजन्मखण्ड १५ । ९४-११६)

ब्रह्माजी बोले — हे माता ! भगवान् श्रीकृष्ण की कृपा से मुझे तुम्हारे चरणकमलों के दर्शन का सौभाग्य प्राप्त हुआ है । ये चरण सर्वत्र और विशेषतः भारतवर्ष में सभी के लिये परम दुर्लभ हैं । मैंने पूर्वकाल में पुष्कर-तीर्थ में सूर्य के प्रकाश में बैठकर परमात्मा श्रीकृष्ण की प्रसन्नता के लिये साठ हजार वर्षों तक तपस्या की । तब वरदाता श्रीहरि मुझे वर देने के लिये स्वयं पधारे । उनके ‘वर माँगो’ ऐसा कहने पर मैंने प्रसन्नतापूर्वक अभीष्ट वर माँगते हुए कहा — ‘हे गुणातीत परमेश्वर ! जो सबके लिये परम दुर्लभ है । उन राधिका के चरण-कमल का मुझे इसी समय शीघ्र दर्शन कराइये ।’ मेरी यह बात सुनकर ये श्रीहरि मुझ तपस्वी से बोले — ‘वत्स ! इस समय क्षमा करो । उपयुक्त समय आने पर मैं तुम्हें श्रीराधा के चरणारविन्दों के दर्शन कराऊँगा ।’

ईश्वर की आज्ञा निष्फल नहीं होती; इसीलिये मुझे तुम्हारे चरणकमलों के दर्शन प्राप्त हुए हैं । माता ! तुम्हारे ये चरण गोलोक में तथा इस समय भारत में भी सबकी मनोवाञ्छा के विषय है । सब देवियाँ प्रकृति की अंशभूता है; अतः वे निश्चय ही जन्य और प्राकृतिक हैं । तुम श्रीकृष्ण के आधे अङ्ग से प्रकट हुई हो; अतः सभी दृष्टियों से श्रीकृष्ण के समान हो । तुम स्वयं श्रीकृष्ण हो और ये श्रीकृष्ण राधा हैं, अथवा तुम राधा हो और ये स्वयं श्रीकृष्ण हैं । इस बात का किसी ने निरूपण किया हो, ऐसा मैंने वेदों में नहीं देखा है ।

अम्बिके ! जैसे गोलोक ब्रह्माण्ड से बाहर और ऊपर है, उसी तरह वैकुण्ठ भी है । माँ ! जैसे वैकुण्ठ और गोलोक अजन्य हैं; उसी प्रकार तुम भी अजन्या हो । जैसे समस्त ब्रह्माण्ड में सभी जीवधारी श्रीकृष्ण के ही अंशांश हैं । उसी प्रकार उन सबमें तुम्हीं शक्तिरूपिणी होकर विराजमान हो । समस्त पुरुष श्रीकृष्ण के अंश हैं और सारी स्त्रियाँ तुम्हारी अंशभूता हैं । परमात्मा श्रीकृष्ण की तुम देहरूपा हो; अतः तुम्हीं इनकी आधारभूता हो । माँ ! इनके प्राणों से तुम प्राणवती हो और तुम्हारे प्राणों से ये परमेश्वर श्रीहरि प्राणवान् हैं । अहो ! क्या किसी शिल्पी ने किसी हेतु से इनका निर्माण किया है ? कदापि नहीं । अम्बिके ! ये श्रीकृष्ण नित्य है । और तुम भी नित्या हो । तुम इनकी अंशस्वरूपा हो या ये ही तुम्हारे अंश हैं । इसका निरूपण किसने किया है ? मैं जगत्स्रष्टा ब्रह्मा स्वयं वेदों का प्राकट्य करनेवाला हूँ । उस वेद को गुरु के मुख से पढ़कर लोग विद्वान् हो जाते हैं । परंतु वेद अथवा पण्डित तुम्हारे गुणों या स्तोत्र का शतांश भी वर्णन करने में असमर्थ हैं । फिर दूसरा कौन तुम्हारी स्तुति कर सकता है ? स्तोत्र का जनक है ज्ञान और सदा ज्ञान की जननी है बुद्धि । माँ राधे ! उस बुद्धि की भी जननी तुम हो । फिर कौन तुम्हारी स्तुति करने में समर्थ होगा ? जिस वस्तु का सबको प्रत्यक्ष दर्शन हुआ है; उसका वर्णन करने में तो कोई भी विद्वान् समर्थ हो सकता है । परंतु जो वस्तु कभी देखने और सुनने में भी नहीं आयी, उसका निर्वचन ( निरूपण ) कौन कर सकता है ? मैं, महेश्वर और अनन्त कोई भी तुम्हारी स्तुति करने की क्षमता नहीं रखते । सरस्वती और वेद भी अपने को असमर्थ पाते हैं । परमेश्वरि ! फिर कौन तुम्हारी स्तुति कर सकता है ?

मैंने आगमों का अनुसरण करके तुम्हारे विषय में जैसा कुछ कहा है, उसके लिये तुम मेरी निन्दा न करना । जो ईश्वरों के भी ईश्वर परमात्मा हैं, उनकी योग्य और अयोग्य पर भी समान कृपा होती है । जो पालन के योग्य संतान है, उसका क्षण-क्षण में गुण-दोष प्रकट होता रहता है; परंतु माता और पिता उसके सारे दोषों को स्नेहपूर्वक क्षमा करते हैं ।

यों कहकर जगत्स्रष्टा ब्रह्मा उन दोनों के सर्ववन्द्य एवं सर्ववाञ्छित चरणकमलों को प्रणाम करके उनके सामने खड़े हो गये । जो मनुष्य ब्रह्मा जी के द्वारा किये गये इस स्तोत्र का तीनों संध्या के समय पाठ करता है, वह निश्चय ही राधा-माधव के चरण की भक्ति एवं दास्य प्राप्त कर लेता है । अपने कर्मों का मूलोच्छेद करके सुदुर्जय मृत्यु को भी जीतकर समस्त लोकों को लाँघता हुआ वह उत्तम गोलोकधाम में चला जाता है ।

 

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