ब्रह्मवैवर्तपुराण – प्रकृतिखण्ड – अध्याय 54
॥ ॐ श्रीगणेशाय नमः ॥
॥ ॐ श्रीराधाकृष्णाभ्यां नमः ॥
चौवनवाँ अध्याय
गोलोक एवं श्रीकृष्ण की उत्कृष्टता, कालमान एवं विभिन्न प्रलयों का निरूपण, चौदह मनुओं का परिचय, ब्रह्मा से लेकर प्रकृति तक के श्रीकृष्ण में लय होने का वर्णन, शिव का मृत्युञ्जयत्व, मूलप्रकृति से महाविष्णु का प्रादुर्भाव, सुयज्ञ को विप्रचरणोदक का महत्त्व तथा राधा का मन्त्र बताकर सुतपा का जाना, पुष्कर में राजा की दुष्कर तपस्या तथा राधामन्त्र के जप से सुयज्ञ का श्रीराधा की कृपा से गोलोक में जाना और श्रीकृष्ण का दर्शन एवं कृपाप्रसाद प्राप्त करना

राजा ने पूछा — मुनीश्वर! सभी काल से भयभीत रहते हैं तो उनका आधार कहाँ है ? काल की माया कितनी है ? क्षुद्र विराट् की आयु कितने काल की है ? ब्रह्मा, प्रकृति, मनु, इन्द्र, चन्द्रमा, सूर्य तथा अन्य प्राकृत जनों की परमायु क्या है ? वेदवेत्ताओं में श्रेष्ठ महर्षे! उनकी वेदोक्त आयु का भली-भाँति विचार करके मेरे समक्ष वर्णन कीजिये । महाभाग ! समस्त विश्वों के ऊर्ध्वभाग में कौन-सा लोक है ? यह बताइये और मेरे संदेह का निवारण कीजिये ।

मुनि बोले — राजन् ! सम्पूर्ण विश्वों के ऊर्ध्वभाग में गोलोक विद्यमान है, जो आकाश के समान विस्तृत है । वह श्रीकृष्ण की इच्छा से प्रकट हो सदा नित्य-अण्ड के रूप में प्रकाशित होता है । भूपाल ! आदिसर्ग में सृष्टि के लिये उन्मुख हो अपनी कला-स्वरूपा प्रकृति के साथ संयुक्त श्रीकृष्ण जब क्रीडा-परायण होकर लीला से ही थकान का अनुभव करते हैं, उस समय उनके मुखमण्डल से निर्गत पसीने की बूँदों से जो जलराशि प्रकट होती है, उसी के द्वारा गोलोक-धाम जल से परिपूर्ण रहता है ।

गणेशब्रह्मेशसुरेशशेषाः सुराश्च सर्वे मनवो मुनीन्द्राः । सरस्वतीश्रीगिरिजादिकाश्च नमन्ति देव्यः प्रणमामि तं विभुम् ॥

ॐ नमो भगवते वासुदेवाय

प्रकृति के गर्भ से संयुक्त एवं अण्डाकार में उत्पन्न विश्व आधारभूत महाविष्णु (या महाविराट्) हैं, उनका आधार वहाँ उपर्युक्त विस्तृत गोलोकधाम ही है । अत्यन्त विस्तृत जलाधार (अथवा जलशय्या) – पर शयन करने वाले जो महाविराट् हैं, वे श्रीराधावल्लभ श्रीकृष्ण का सोलहवाँ अंश कहे गये हैं। उनके श्रीअङ्गों की कान्ति दूर्वादल के समान श्याम है। उनके मुख पर मन्द मुसकान खेलती रहती है। उनके चार भुजाएँ हैं । वे वनमाला धारण करते हैं । श्रीमान् महाविष्णु पीताम्बर से सुशोभित हैं। सर्वोपरि आकाश में श्रीविष्णु का नित्य वैकुण्ठधाम है, जो आत्माकाश के समान नित्य तथा चन्द्र-मण्डल के तुल्य विस्तृत है । ईश्वर की इच्छा से उसका आविर्भाव हुआ है । वह अलक्ष्य तथा आश्रय-रहित है । आकाश के समान अत्यन्त विस्तृत तथा अमूल्य दिव्य रत्नों द्वारा निर्मित है। वहाँ वनमालाधारी श्रीमान् चतुर्भुज नारायणदेव, जो लक्ष्मी, सरस्वती, गङ्गा तथा तुलसी के पति हैं; सुनन्द, नन्द तथा कुमुद आदि पार्षदों से घिरे हुए निवास करते हैं ।

सर्वेश्वर, सर्वसिद्धेश्वर एवं भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये ही दिव्य विग्रह (अथवा कृपामय शरीर ) धारण करनेवाले भगवान् श्रीकृष्ण दो रूपों में प्रकट हैं — द्विभुज एवं चतुर्भुज । चतुर्भुजरूप से वे वैकुण्ठ में वास करते हैं और द्विभुजरूप से गोलोकधाम में। वैकुण्ठ से पचास करोड़ योजन ऊपर गोलाकार ‘गोलोक’ धाम विद्यमान है, जो समस्त लोकों से श्रेष्ठतम है । बहुमूल्य रत्नों द्वारा निर्मित विशाल भवन उस धाम की शोभा बढ़ाते हैं । रत्नेन्द्रसार के बने हुए विचित्र खम्भों और सीढ़ियों से वे भवन अलंकृत हैं । श्रेष्ठ मणिमय दर्पणों से जटित किवाड़ों तथा कलशों से उज्ज्वल एवं नाना प्रकार के चित्रों से विचित्र शोभा पानेवाले शिविर उस धाम की श्रीवृद्धि करते हैं । उसका विस्तार एक करोड योजन है तथा लंबाई उससे सौगुनी है । विरजा नदी से घिरा हुआ शतशृङ्ग पर्वत उस धाम का परकोटा है। विरजा नदी की लंबाई-चौड़ाई तथा शतशृङ्ग पर्वत की आधी ऊँचाई वाले वृन्दावन से वह धाम सुशोभित है। वृन्दावन की अपेक्षा आधी लंबाई-चौड़ाई में निर्मित रासमण्डल गोलोकधाम का अलंकार है । उपर्युक्त नदी, पर्वत और वन आदि के मध्यभाग में मुख्य गोलोकधाम है । जैसे कमल में कर्णिका होती है, उसी प्रकार उक्त नदी, शैल आदि के बीच में वह मनोहर धाम प्रतिष्ठित है ।

वहाँ रासमण्डल में गौओं, गोपों और गोपियों से घिरे हुए गोपीवल्लभ श्रीकृष्ण रासेश्वरी श्रीराधा के साथ निरन्तर निवास करते हैं । उनके दो भुजाएँ हैं, वे हाथों में मुरली लिये बाल-गोपाल का रूप धारण किये रहते हैं। अग्निशुद्ध चिन्मय वस्त्र उनका परिधान है। वे रत्नमय आभूषणों से विभूषित हैं । उनके सारे अङ्ग चन्दन से चर्चित हैं । गले में रत्नों का हार शोभा देता है । वे रत्नमय सिंहासन पर विराजमान हैं। उनके ऊपर रत्नमय छत्र तना हुआ है तथा उनके प्रिय सखा ग्वालबाल श्वेत चवँर लिये सदा उनकी सेवामें तत्पर रहते हैं । वस्त्राभूषणों से विभूषित सुन्दर वेषवाली गोपियाँ माला और चन्दन के द्वारा उनका शृङ्गार करती हैं। वे मन्द मन्द मुस्कराते रहते हैं और वे गोपियाँ कटाक्षपूर्ण चितवन से उनकी ओर निहारती रहती हैं।

इस प्रकार जैसा मैंने भगवान् शंकर के मुख से सुना था और आगमों में जैसा वर्णन मिलता है, तदनुसार लोकविस्तार की यथाशक्ति चर्चा की है। अब काल का मान सुनो।

छः पल सोने का बना हुआ एक पात्र हो, जिसकी गहराई चार अंगुल की हो। उसमें एक-एक माशे सोने के बने हुए चार-चार अंगुल लंबे चार कीलों से छेद कर दिये जायँ। फिर उस पात्र को जल के ऊपर रख दिया जाय। उन छिद्रों से पानी आकर जितनी देर में वह पात्र भर दे, उतने समय को एक दण्ड कहते हैं दो दण्ड का एक मुहूर्त और चार मुहूर्तों का एक प्रहर होता है। आठ प्रहरों से एक दिन रात की पूर्ति होती है। पंद्रह दिन-रात को एक पक्ष कहते हैं। दो पक्षों का एक मास और बारह मास का एक वर्ष होता है । मनुष्यों के एक मास में जितना समय व्यतीत होता है, वह पितरों का एक दिन-रात है। कृष्णपक्ष में उनका दिन कहा गया है और शुक्लपक्ष रात्रि । मनुष्यों के एक वर्ष में देवताओं के एक दिन-रात की पूर्ति होती है। उत्तरायण में उनका दिन होता है और दक्षिणायन में रात्रि ।

नरेश्वर ! मनुष्य आदि की अवस्था युग एवं कर्म के अनुरूप होती है । अब प्रकृति, प्राकृत पदार्थ एवं ब्रह्मा आदि की आयु का परिमाण सुनो। सत्ययुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग – इन चारों को एक चतुर्युग कहते हैं। इनकी काल – संख्या बारह हजार दिव्य वर्ष है। सावधान होकर सुनो, सत्ययुग आदिका कालमान क्रमशः चार, तीन, दो और एक दिव्य वर्ष है। उनकी संध्या और संध्यांशकाल दो हजार दिव्य वर्षों के बताये गये हैं ।1

मनुष्यों के मान से चारों युगों का परिमाण तैंतालीस लाख बीस हजार वर्ष है। इनमें गणना के विद्वानों ने सत्ययुग का मान मनुष्यों के वर्ष से सत्रह लाख अट्ठाईस हजार बताया है । इसी तरह त्रेता का कालमान बारह लाख छियानबे हजार मानव-वर्ष है । द्वापर का आठ लाख चौंसठ हजार तथा कलियुग का चार लाख बत्तीस हजार मानव-वर्ष है। जैसे सात वार, सोलह तिथियाँ, दिन-रात, दो पक्ष, बारह मास और वर्ष चक्रवत् घूमते रहते हैं, उसी प्रकार चारों युगों का चक्र भी सदा ही चलता रहता है। राजेन्द्र ! जैसे युग परिवर्तित होते हैं, उसी प्रकार मन्वन्तर भी । इकहत्तर दिव्य युगों का एक मन्वन्तर होता है। इसी क्रम से चौदह मनु भ्रमण करते रहते हैं ।

नरेश्वर! मैंने भगवान् शंकर के मुख से धर्मात्मा मनुओं का जो आख्यान सुना है, वह बता रहा हूँ । तुम मुझसे सुनो। आदिमनु ब्रह्माजी के पुत्र हैं । इसलिये उन्हें स्वायम्भुव मनु कहा गया है । उनकी पत्नी पतिव्रता शतरूपा हैं । स्वायम्भुव मनु धर्मात्माओं में वरिष्ठ और मनुओं में गरिष्ठ हैं। वे तुम्हारे प्रपितामह लगते हैं। उन्होंने भगवान् शंकर का शिष्यत्व ग्रहण किया है । वे विष्णुव्रत का पालन करने वाले जीवन्मुक्त एवं महाज्ञानी थे । उन्होंने भगवान् शंकर की आज्ञा से भगवान् विष्णु की प्रसन्नता के लिये प्रतिदिन एक लाख बहुमूल्य रत्न, दस करोड़ स्वर्णमुद्रा, सोने के सींग से सुशोभित एवं सुपूजित एक लाख दिव्य धेनु, अग्निशुद्ध दिव्य वस्त्र, एक लाख श्रेष्ठ मणि, सब प्रकार की खेती से हरी-भरी भूमि, लाखों उत्तमोत्तम गजराज, सोने के आभूषणों से विभूषित तीन लाख रत्न, सहस्रों स्वर्णजटित रथरत्न, एक लाख शिबिका, अन्न से भरे हुए तीन करोड़ सुवर्णपात्र, जल से भरे हुए तीन कोटि सुवर्ण कलश, कर्पूर आदि से सुवासित ताम्बूल और विश्वकर्मा द्वारा रचित तथा श्रेष्ठ रत्नों के सारभाग से खचित एवं वह्निशुद्ध विचित्र वस्त्र-सहित माल्य समूहों से सुशोभित तीन करोड़ विचित्र स्वर्ण-पर्यङ्क का ब्राह्मणों के लिये दान किया था।

भगवान् शंकर से परम दुर्लभ ज्ञान, श्रीकृष्ण का मन्त्र तथा श्रीहरि का दास्यभाव प्राप्त करके वे गोलोक को चले गये। अपने पुत्र को मुक्त हुआ देख प्रजापति ब्रह्मा बड़े प्रसन्न हुए । उन्होंने संतुष्ट होकर भगवान् शंकर की स्तुति की और आदि-मनु के स्थान पर दूसरे मनु की सृष्टि की। वे भी स्वयम्भू के पुत्र होने के कारण स्वायम्भुव मनु कहलाये। दूसरे मनु का नाम स्वारोचिष है । ये अग्निदेव के पुत्र हैं। राजा स्वारोचिष भी स्वायम्भुव मनु के समान ही महान् धर्मिष्ठ एवं दानी रहे हैं। दो अन्य मनु राजा प्रियव्रत के पुत्र तथा धर्मात्माओं में श्रेष्ठ हैं। उनके नाम हैं — तापस और उत्तम । दोनों ही वैष्णव हैं तथा क्रमशः तीसरे और चौथे मनु के पद पर प्रतिष्ठित हैं। वे दोनों भी भगवान् शंकर के शिष्य हैं तथा श्रीकृष्ण की भक्ति में तत्पर रहते हैं । धर्मात्माओं में श्रेष्ठ रैवत पाँचवें मनु हैं । चाक्षुष को छठा मनु जानना चाहिये। वे भी विष्णुभक्ति में तत्पर रहने वाले हैं। सूर्यपुत्र श्राद्धदेव जो विष्णु के भक्त हैं, सातवें मनु कहे गये हैं (इन्हीं को वैवस्वत मनु कहते हैं)। सूर्य के दूसरे वैष्णव पुत्र सावर्णि आठवें मनु हैं । विष्णु-व्रत-परायण दक्षसावर्णि नवें मनु हैं। ब्रह्मज्ञानविशारद ब्रह्मसावर्णि दसवें मनु हैं। ग्यारहवें मनु का नाम धर्मसावर्णि है। वे धर्मिष्ठ, वरिष्ठ तथा सदा ही वैष्णवों के व्रत का पालन करनेवाले हैं। ज्ञानी रुद्रसावर्णि बारहवें मनु हैं तथा धर्मात्मा देवसावर्णिको तेरहवाँ मनु कहा गया है। महाज्ञानी चन्द्रसावर्णि चौदहवें मनु हैं। मनुओं की जितनी आयु होती है, उतनी ही इन्द्रों की भी होती है ।

ब्रह्मा का एक दिन चौदह इन्द्रों से अविच्छिन्न कहा जाता है । जितना बड़ा उनका दिन होता है, उतनी ही बड़ी उनकी रात भी होती है । नरेश्वर ! उसे ब्राह्मी निशा के नाम से जानना चाहिये । उसी को वेदों में ‘कालरात्रि’ कहा गया है। राजन् ! ब्रह्मा का एक दिन एक छोटा कल्प माना गया है। महातपस्वी मार्कण्डेय ऐसे ही कल्पों से सात कल्प तक जीवित रहते  हैं । ब्रह्मा का दिन बीतने पर ब्रह्मलोक से नीचे के सारे लोक प्रलयाग्नि से जलकर भस्म हो जाते हैं। वह अग्नि सहसा संकर्षण ( शेषनाग ) — के मुख से प्रकट होती है । उस समय चन्द्रमा, सूर्य और ब्रह्माजी के पुत्रगण निश्चय ही ब्रह्मलोक में चले जाते हैं । जब ब्रह्मा की रात बीत जाती है, तब वे पुनः सृष्टि का कार्य प्रारम्भ करते हैं । ब्रह्मा की रात्रि में जो लोकों का संहार होता है, उसे ‘क्षुद्र प्रलय’ कहते हैं । उसमें देवता, मनु और मनुष्य आदि दग्ध हो जाते हैं । इस प्रकार जब ब्रह्मा के तीस दिन-रात व्यतीत हो जाते हैं, तब उनका एक मास पूरा होता है । वैसे ही बारह महीनों का उनका एक वर्ष होता है। इस प्रकार ब्रह्मा के पंद्रह वर्ष व्यतीत होने पर एक प्रलय होता है, जिसे वेदों में ‘दैनन्दिन प्रलय’ कहा गया है ।

प्राचीन वेदज्ञों ने उसी को ‘मोहरात्रि’ की संज्ञा दी है। उसमें चन्द्रमा, सूर्य आदि; दिक्पाल, आदित्य, वसु, रुद्र, मनु, इन्द्र, मानव, ऋषि, मुनि, गन्धर्व तथा राक्षस आदि; मार्कण्डेय, लोमश और पेचक आदि चिरजीवी; राजा इन्द्रद्युम्न, अकूपार नामक कच्छप तथा नाडीजंघ नामक बक- ये सब-के-सब नष्ट हो जाते हैं । ब्रह्मलोक के नीचे के सब लोक तथा नागों के स्थान भी विनाश को प्राप्त हो जाते हैं। ऐसे समय में ब्रह्मपुत्र आदि सब लोग ब्रह्मलोक में चले जाते हैं । दैनन्दिन प्रलय व्यतीत होने पर ब्रह्माजी पुनः लोकों की सृष्टि आरम्भ करते हैं । इस प्रकार सौ वर्षों तक ब्रह्मा की आयु पूरी होती है । तदनन्तर ब्रह्माजी की आयु पूर्ण होने पर एक कल्प पूरा हो जाता है। उस समय जो ‘महाप्रलय’ आता है, उसीको पुरातन महर्षियोंने ‘महारात्रि‘ कहा है । ब्रह्माजी की आयु पूर्ण होने पर ब्रह्माण्ड-समूह जल में डूब जाता है । वेदमाता सावित्री, वेद और धर्म आदि सब-के-सब तिरोहित हो जाते हैं । मृत्यु का भी विनाश हो जाता है। परंतु देवी प्रकृति और भगवान् शिव का नाश नहीं होता । विश्व के वैष्णवगण भगवान् नारायण में लीन हो जाते हैं। संहारकारी कालाग्नि-रुद्र समस्त रुद्रगणों के साथ मृत्युञ्जय महादेव में लीन हो जाते हैं । उनके साथ ही तमोगुण का भी लय हो जाता है। तदनन्तर प्रकृति की एक पलक गिरती है। साथ ही नारायण, शिव तथा महाविष्णु की भी पलक गिरती है।

नरेश्वर ! निमेष के अन्त में अर्थात् पलक उठने पर श्रीकृष्ण की इच्छा से पुनः सृष्टि का आरम्भ होता है । श्रीकृष्ण निमेष से रहित हैं। उनकी पलक नहीं गिरती है; क्योंकि वे प्रकृति से परे तथा प्राकृत गुणों से रहित हैं। जो सगुण हैं, उन्हीं के निमेष होता है। वह निमेष काल-संख्यात्मक अवस्था से सीमित होता है। जो नित्य, निर्गुण, अनादि और अनन्त हैं, उनके निमेष कहाँ ? जब प्रकृति की एक सहस्र बार पलकें गिर जाती हैं, तब उसका एक दण्ड पूरा होता है। ऐसे साठ दण्डों का उसका एक दिन कहा गया है। तीस दिनों का एक मास और बारह महीनों का वर्ष होता है। ऐसे एक सौ वर्ष बीत जाने पर प्रकृति का श्रीकृष्ण में लय होता है। श्रीकृष्ण में उसके लय होने पर जो प्रलय होता है, उसे ‘प्राकृत प्रलय’ कहा गया है ।

महाविष्णु की जननी वह एकमात्र मूलप्रकृति ईश्वरी सबका संहार करके स्वयं श्रीकृष्ण के वक्षःस्थल में विलीन हो जाती है। संतपुरुष उसी को सनातनी विष्णुमाया, सर्वशक्तिस्वरूपा दुर्गा, सती नारायणी, श्रीकृष्ण की बुद्धि की अधिष्ठात्री देवी तथा निर्गुणात्मिका कहते हैं। जिसकी माया से बड़े-बड़े देवता मोहित होते हैं, उस देवी को वैष्णवजन महालक्ष्मी तथा ‘परा राधा’ कहते हैं । श्रीकृष्ण के आधे अङ्ग से प्रकट हुई महालक्ष्मी नारायण की प्रिया है । वही राधारूप से श्रीकृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी और उनकी प्राणाधिका है। शश्वत् प्रेममयी शक्ति है। निर्गुण परमात्मा की निर्गुणा प्रियतमा है । नारायण और शिव दोनों शुद्ध सत्त्वस्वरूपी हैं। वे अपने बहुत से पार्षदगणों का अपने-आपमें संहार करके निर्गुण श्रीकृष्ण में लीन हो जाते हैं ।

नरेश्वर ! गोप, गोपियाँ और सवत्सा गौएँ सब-की-सब प्रकृतिस्वरूपा श्रीराधा में लीन हो जाती हैं और वे प्रकृतिदेवी परमेश्वर श्रीकृष्ण में। जो क्षुद्र विष्णु हैं, वे सब महाविष्णु में लीन होते हैं । महाविष्णु प्रकृति में और वह श्रीकृष्ण की मूल- प्रकृति परमात्मा श्रीकृष्ण में लीन होती है। माया तथा ईश्वर की इच्छा से प्रकृति ने योगनिद्रा बनकर श्रीकृष्ण के नेत्र-कमलों में निवास किया। जितने समय में प्रकृति का एक दिन होता है, उतने समय तक वृन्दावन में परमात्मा श्रीकृष्ण को नींद लगी रहती है । वहाँ बहुमूल्य रत्नों का पर्यङ्क बिछा होता है, जो अग्निशुद्ध चिन्मय वस्त्रों से आच्छादित होता है । गन्ध, चन्दन और फूलों की वायु से वह पर्यङ्क सुवासित रहता है । उसी पर श्यामसुन्दर शयन करते हैं। उनके पुनः जागने पर सारी सृष्टि का कार्य आरम्भ होता है। उन निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्ण का वन्दन, स्मरण, ध्यान, पूजन और गुण – कीर्तन महापातकों का नाश करनेवाला है। महाराज! मैंने मृत्युञ्जय महादेव के मुख से जैसा सुना था और आगमों में जो कुछ कहा गया है, उसके अनुसार यह सब कुछ बता दिया। अब तुम और क्या सुनना चाहते हो ?

सुयज्ञ ने पूछा — ब्रह्माजी की आयु पूर्ण होने पर समस्त लोकों के संहारकारी कालाग्निरुद्र, तमोगुण तथा सत्त्वगुण यदि मृत्युञ्जय शिव में विलीन होते हैं तथा यदि उस प्राकृत लय की बेला में शिव निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्ण में लीन होते हैं तो आपके गुरु भगवान् शिव का नाम श्रुति में मृत्युञ्जय क्यों रखा गया ? तथा जिनके रोमकूपों में असंख्य ब्रह्माण्ड निवास करते हैं, उन महाविष्णु की जननी यह मूलप्रकृति कैसे हुई ?

सुतपा बोले — नरेश्वर ! ब्रह्माजी की आयु पूर्ण होने पर ब्रह्मा आदि समस्त लोकों का संहार करनेवाली मृत्युकन्या जलबिम्ब की भाँति नष्ट हो जाती है। ऐसी कितनी ही मृत्युकन्याओं और करोड़ों ब्रह्माओं का लय हो जाने पर यथासमय भगवान् शिव सत्त्वरूपधारी निर्गुण श्रीकृष्ण में लीन होते हैं । मेरे गुरु भगवान् शिव ने मृत्यु-कन्या पर सदा ही विजय पायी है। परंतु मृत्यु ने कभी शिव को पराजित नहीं किया है। यह बात प्रत्येक कल्प में श्रुतियों द्वारा सुनी गयी है। अतः भगवान् शिव का मृत्युञ्जय नाम उचित ही है। नरेश्वर ! शम्भु, नारायण और प्रकृति- इन तीनों नित्य तत्त्वों का नित्य परमात्मा श्रीकृष्ण में लय होना लीला मात्र है, वास्तविक नहीं है। स्वयं निर्गुण परमपुरुष परमात्मा ही काल के अनुसार सगुण होते हैं। वे स्वयं ही माया से नारायण, शिव एवं प्रकृति के रूप में प्रकट होते हैं; अतः सदा उनके समान ही हैं। जैसे अग्नि और उसकी चिनगारियों में भेद नहीं है, वैसे ही नारायण आदि तथा श्रीकृष्ण में कोई अन्तर नहीं है । ब्रह्माजी के द्वारा प्रत्येक कल्प में जिन-जिन रुद्र, आदित्य आदि की सृष्टि हुई है, वे सब मृत्युकन्या से पराजित होने के कारण नश्वर हैं । परंतु शिव की सृष्टि ब्रह्माजी ने नहीं की है। शिव सत्य, नित्य एवं सनातन हैं ।

भूमिपाल ! उनके निमेषमात्र में कितने ही ब्रह्माओं का पतन हो जाता है। आदिसर्ग में जगद्गुरु श्रीकृष्ण प्रकृति के भीतर वीर्य का आधान किया था । पवित्र वृन्दावन के भीतर रास में उनके वामांश से प्रकट हुई रासेश्वरी राधा ही परा प्रकृति हैं। उन्होंने ही गर्भ धारण किया । तदनन्तर समय आने पर राधा ने गोलोक के रासमण्डल में एक अण्ड को जन्म दिया। अपनी संतति को अण्डाकार देख उनके हृदय में बड़ी व्यथा हुई । वे कुपित हो उठीं तथा उन्होंने उस अण्डे को वहाँ से नीचे विश्वगोलक में फेंक दिया। उसी अण्ड से सबके आधारभूत महाविराट् ( महाविष्णु) – की उत्पत्ति हुई ।

सुयज्ञ ने कहा — प्रभो ! आज मेरा जन्म सफल हो गया। जीवन सार्थक हो गया। मेरे लिये आपका शाप भक्ति का कारण होने से वरदान बन गया। समस्त मङ्गलों का भी मङ्गल करने वाली हरि – भक्ति परम दुर्लभ है। विप्रवर! वेदों में जो पाँच प्रकार की भक्ति बतायी गयी है, वह भी इसके समान नहीं है। महामुने ! परमात्मा श्रीकृष्ण में जिस प्रकार भी मेरी भक्ति सम्भव हो सके, वह उपाय कीजिये; क्योंकि वह सभी के लिये परम दुर्लभ है।

केवल जलमय तीर्थ ही तीर्थ नहीं है, मिट्टी और पत्थरकी प्रतिमारूप देवता ही देवता नहीं हैं, श्रीकृष्णभक्त ही मुख्य तीर्थ और देवता हैं। वे जलमय तीर्थ और मिट्टी – पत्थरके देवता दीर्घकालमें उपासकको पवित्र करते हैं, परंतु श्रीकृष्णभक्त दर्शनमात्र से ही पवित्र कर देते हैं। समस्त वर्णों में ब्राह्मण श्रेष्ठ हैं, उनमें भी जो भारतवर्ष में रहकर स्वधर्म-पालन में लगे रहते हैं, वे श्रेष्ठ हैं। उनमें भी जो श्रीकृष्णमन्त्र का उपासक श्रीकृष्णभक्तिपरायण तथा प्रतिदिन श्रीकृष्ण के नैवेद्य को भोजन करनेवाला है, वह सर्वश्रेष्ठ और महान् पवित्र है । आप वैष्णव हैं, अतः ब्राह्मणों में श्रेष्ठ हैं। साथ ही महान् ज्ञान के श्रेष्ठ सागर हैं। मुने! आप-जैसे शिव-शिष्य महात्मा पुरुष को पाकर मैं दूसरे किसकी शरण जाऊँ ? महामुने! आपके शाप से इस समय मैं गलित कुष्ठ का रोगी हूँ । अपवित्र हूँ और तप के अधिकार से वञ्चित हूँ । ऐसी दशा में कैसे तपस्या करूँ ?

सुतपा बोले — राजन् ! सनातनी विष्णुमाया हरि-भक्ति प्रदान करनेवाली है। वह जिन लोगों पर कृपा करती है, उन्हें भगवान्‌ की भक्ति देती है । माया जिन्हें मोहित करती है, उन्हें हरि-भक्ति नहीं देती है, अपितु उनको नश्वर धन देकर ठग लेती है । अतः तुम प्राकृत गुणों से रहित कृष्णप्रेममयी शक्ति तथा श्रीकृष्ण के प्राणों की अधिष्ठात्री देवी श्रीराधा की आराधना करो, जो सम्पूर्ण सम्पदाओं को देनेवाली हैं। उनके अनुग्रह एवं सेवा से शीघ्र ही गोलोक में चले जाओगे। वे सर्वाराध्य श्रीकृष्ण से भी सेवित एवं पूजित हैं । निर्गुण परमात्मा श्रीकृष्ण ध्यान से भी वश में न होनेवाले और दुराराध्य हैं। उनकी सेवा करके भक्त जन सुदीर्घकाल किंवा अनेक जन्मों के पश्चात् गोलोक में जाते हैं । परंतु सर्वसम्पत्स्वरूपिणी श्रीराधा महाविष्णु की भी जननी हैं, कृपामयी हैं । अतः उनका सेवन करके भक्तजन शीघ्र ही गोलोक में चले जाते हैं ।

तुम एक सहस्र वर्षों तक ब्राह्मण का चरणोदक पीते रहो। इससे कामदेव के समान रूपवान् तथा रोगहीन हो जाओगे। जब तक पृथ्वी ब्राह्मण के चरणोदक से भीगी रहती है, तब तक उस ब्राह्मणभक्त पुरुष के पितर कमल के पत्तों में जल पीते हैं। पृथ्वी पर जो-जो तीर्थ हैं, वे सब समुद्र में भी हैं और समुद्र में जो तीर्थ हैं, वे सब ब्राह्मण के चरणों में हैं । ब्राह्मण का चरणोदक पापों तथा रोगों का विनाश करनेवाला है। वह सम्पूर्ण तीर्थों के जल के समान भोग तथा मोक्ष देनेवाला और शुभ है । ब्राह्मण मनुष्य के रूपमें साक्षात् देवाधिदेव जनार्दन हैं । ब्राह्मण के दिये हुए पदार्थको सब देवता भोग लगाते हैं ।

ऐसा कहकर ब्राह्मण सुतपा सुयज्ञ के सत्कार को ग्रहण करके अपने घर को चले गये । जाते-जाते यह कह गये कि मैं एक वर्ष के बाद फिर आऊँगा । शिवे ! राजा प्रतिदिन भक्तिभाव से ब्राह्मण के चरणोदक का पान करने लगे। उन्होंने एक वर्ष तक ब्राह्मणों की पूजा की और उन्हें भोजन कराया। वर्ष बीतते-बीतते राजा रोग-व्याधि से मुक्त हो गये। फिर कश्यपकुल के अग्रणी मुनिश्रेष्ठ सुतपा वहाँ आये । उन्होंने श्रीराधा की पूजा के विधान, स्तोत्र, कवच, मन्त्र और सामवेदोक्त ध्यान का राजा सुयज्ञ को उपदेश दिया और कहा — ‘राजन् ! शीघ्र घर छोड़कर निकल जाओ ।’

ऐसा कहकर मुनि तो तपस्या के लिये चले गये और राजा तुरंत ही घर छोड़कर दुर्गम वन को चल दिये । राजा की चारों रानियों ने प्राण त्याग दिये तथा उनका पुत्र राजा हुआ । सुयज्ञ ने पुष्कर में जाकर सुदुष्कर तपस्या की। उन्होंने सौ दिव्य वर्षों तक श्रीराधा के उत्कृष्ट मन्त्र का जप किया। तब उन्होंने आकाश में रथप र बैठी हुई परमेश्वरी श्रीराधा के दर्शन किये। उनके दर्शन मात्र से राजा के सारे पाप ताप दूर हो गये। उन्होंने मनुष्य-देह को त्याग दिया और दिव्य रूप धारण कर लिया। देवी श्रीराधा उस रत्नेन्द्रनिर्मित विमान द्वारा राजा को साथ ले गोलोक में चली गयीं। राजा ने विरजा नदी तथा मनोहर शतशृङ्ग पर्वत से घिरे हुए, श्रीवृन्दावन से युक्त तथा रासमण्डल से मण्डित गोलोक का दर्शन किया।

वह धाम गौओं, गोपियों और गोपसमूहों से सेवित तथा रलेन्द्रसार से निर्मित अत्यन्त मनोहर भवनों द्वारा सुशोभित हो रहा था। भाँति-भाँति के चित्र-विचित्र दृश्य उसकी शोभा बढ़ाते थे तथा वह कल्पवृक्षयुक्त सैंतीस उपवनों से शोभायमान था । उन उपवनों में पारिजात के वृक्ष भी भरे हुए थे। सारा गोलोक कामधेनुओं से आवेष्टित था । आकाश की भाँति विपुल विस्तार से युक्त तथा चन्द्रमण्डल के समान गोलाकार था । वैकुण्ठ से पचास करोड़ योजन ऊपर वह शून्य में बिना किसी आधार के स्थित है और भगवान्‌ की इच्छा से ही सुस्थिर है। आत्माकाश के समान नित्य है और हम लोगों के लिये भी परम दुर्लभ है । मैं, नारायण, अनन्त, ब्रह्मा, विष्णु, महाविराट् धर्म, क्षुद्र विराट् गङ्गा, लक्ष्मी, सरस्वती, तुम (पार्वती), विष्णुमाया, सावित्री, तुलसी, गणेश, सनत्कुमार, स्कन्द, नर-नारायण ऋषि, कपिल, दक्षिणा, यज्ञ, ब्रह्मपुत्र, योगी, वायु, वरुण, चन्द्रमा, सूर्य, रुद्र, अग्नि तथा कृष्णमन्त्र के उपासक भारतीय वैष्णव — इन सबने ही गोलोक को देखा है । दूसरों ने इसे कभी नहीं देखा है I

उस गोलोकधाम में श्यामसुन्दर श्रीकृष्ण निरामय रत्नसिंहासन पर विराजमान हैं । रत्नों के हार, किरीट तथा रत्नमय भूषणों से वे विभूषित हैं । अग्रिशुद्ध, अत्यन्त निर्मल चिन्मय पीताम्बर उनके श्रीअङ्ग की शोभा बढ़ाता है। उनके सारे अङ्ग चन्दन से चर्चित हैं। वे किशोर गोपबालक के रूप में दिखायी देते हैं। नूतन जलधर के समान श्याम कान्ति, श्वेत कमल के समान नेत्र, शरत् की पूर्णिमा के चन्द्रमण्डल को तिरस्कृत करने वाला मन्द हास्य से सुशोभित मुख, मनोहर आकृति, दो भुजाएँ और हाथों में मुरली – यही उनके रूप की झाँकी है। भक्तों पर अनुग्रह करने के लिये ही वे दिव्य विग्रह धारण करते हैं । श्रीकृष्ण स्वेच्छामय (परम स्वतन्त्र), प्रकृति से परे, परब्रह्मस्वरूप निर्गुण परमात्मा हैं । ध्यान से भी वे वश में आने वाले नहीं हैं। उनकी आराधना बहुत कठिन है । वे हमारे लिये भी परम दुर्लभ हैं । उनके प्रिय सखा बारह ग्वालबाल सफेद चँवर लिये उनकी सेवा करते हैं। प्रेमपीडिता, सुस्थिरयौवना, वह्निशुद्ध चिन्मय वस्त्रधारिणी, रत्नभूषणभूषिता एवं परम मनोहारिणी गोपिकाएँ मन्द मन्द मुस्कराती हुई उनकी छबि निहारती रहती हैं । रासमण्डल के मध्यभाग में परात्पर पुरुष श्रीकृष्ण के राजा सुयज्ञ ने इसी रूप में दर्शन किये। श्रीराधा ने ही वहाँ उन्हें अपने प्राणवल्लभ के दर्शन कराये थे। चारों वेद मनोहर मूर्ति धारण करके उनके दर्शन करते थे राग-रागिनियाँ भी मूर्तिमती होकर वाद्ययन्त्र और मुख से उन्हें अत्यन्त मनोहर संगीत सुनाती थीं । शिवे ! नित्य सनातनी प्रकृति के साथ तुम भी सदा उनके चरणारविन्दों की सेवा करती हो । वे तुलसीदल से मण्डित होते हैं तथ कस्तूरी, कुङ्कुम, गन्ध, चन्दन, दूर्वा, अक्षत, पारिजातपुष्प तथा विरजा के निर्मल जल से उनके लिये नित्य अर्घ्य दिया जाता है।

उस समय उनकी बड़ी शोभा होती है। वे सुप्रसन्न, स्वतन्त्र, समस्त कारणों के भी कारण, सर्वान्तरात्मा, सर्वेश्वर, सर्वजीवन, सर्वाधार, परमपूज्य, सनातन ब्रह्मज्योति, सर्वसम्पत्तिस्वरूप, सम्पूर्ण सम्पदाओं के दाता, सर्वमङ्गलरूप, सर्वमङ्गलकारण, सर्वमङ्गलदाता तथा समस्त मङ्गलों के भी मङ्गल हैं । श्रीकृष्ण का दर्शन करके सशङ्कित हो राजा सुयज्ञ तुरंत रथ से उतर पड़े और नेत्रों से आँसू बहते हुए पुलकित शरीर से भगवान्‌ के चरणों में मस्तक रखकर उन्होंने प्रणाम किया । परमात्मा श्रीकृष्ण ने राजा को अपना दासत्व शुभाशीर्वाद तथा वह सत्य एवं अविचल श्रीकृष्णभक्ति प्रदान की, जो हमलोगों के लिये भी परम दुर्लभ है। तदनन्तर श्रीराधा अपने रथ से उतरकर श्रीकृष्ण के वक्ष में विराजमान हो गयीं। उनकी अत्यन्त प्यारी गोपियाँ सफेद चँवर लिये उनकी सेवामें लग गयीं। उनके आने पर श्रीकृष्ण भक्ति और आदर से सहसा उठकर खड़े हो गये। उन्होंने मन्द मुस्कान के साथ श्रीराधा के साथ वार्तालाप और उनका सम्मान किया।

प्राचीनकाल के वे वेदवेत्ता विद्वान् वेदों के कथनानुसार पहले राधा नाम का उच्चारण करके पीछे कृष्ण या माधव कहते हैं। जो इसके विपरीत उच्चारण करते या उन जगदम्बा श्रीकृष्णप्राणाधिका एवं प्रेममयी शक्ति श्रीराधिका की निन्दा करते हैं, वे चन्द्रमा तथा सूर्य की स्थितिपर्यन्त कालसूत्र नरक में यातना भोगते हैं। तत्पश्चात् सौ वर्षों तक स्त्री-पुत्र से रहित तथा रोगी होते हैं।

दुर्गे ! इस प्रकार मैंने परम उत्तम राधिकाख्यान का वर्णन किया है। वह सती भगवती वैष्णवी, सनातनी, नारायणी, विष्णुमाया, मूलप्रकृति एवं ईश्वरी नाम धारण करनेवाली तुम्हीं हो। माया का
आश्रय लेकर मुझसे पूछ रही हो। तुम स्वयं ही सर्वज्ञा, सर्वरूपिणी, स्त्रीजाति की अधिदेवी तथा पूर्वजन्म की बातों को याद रखनेवाली श्रेष्ठ पराशक्ति हो । राधिका की कथा तो मैंने सुना दी, अब और क्या सुनना चाहती हो ?      (अध्याय ५४)

॥ इति श्रीब्रह्मवैवर्त्ते महापुराणे द्वितीये प्रकृतिखण्डे नारदनारायणसं वादान्तर्गतहरगौरीसंवादे राधाख्याने सुयज्ञाख्याने सुतपःसुयज्ञसंवादे सुयज्ञस्य गोलोकप्राप्तिर्नाम चतुष्पञ्चाशत्तमोऽध्यायः ॥ ५४ ॥
॥ हरिः ॐ तत्सत् श्रीकृष्णार्पणमस्तु ॥

1. इस विषय का स्पष्टीकरण यों समझना चाहिये। सत्ययुग चार हजार दिव्य वर्षों का होता है। युग के आरम्भ में चार सौ दिव्य वर्षों की संध्या होती है और युग के अन्त में चार सौ दिव्य वर्षों का संध्यांशकाल होता है। इस प्रकार सत्ययुग का कालमान चार हजार आठ सौ दिव्य वर्ष है। त्रेता का संध्यामान तीन सौ दिव्य वर्ष, युगमान तीन सहस्र दिव्य वर्ष और संध्यांशमान तीन सौ दिव्य वर्ष । इस तरह त्रेता का सम्पूर्ण कालमान तीन हजार छः सौ दिव्य वर्ष है। द्वापर का संध्यामान दो सौ दिव्य वर्ष, युगमान दो हजार दिव्य वर्ष और संध्यांशमान दो सौ दिव्य वर्ष है। ये सब मिलाकर दो हजार चार सौ दिव्य वर्ष होते हैं। इसी तरह कलियुग का संध्यामान एक सौ दिव्य वर्ष, युगमान एक सहस्र दिव्य वर्ष और संध्यांशमान एक सौ दिव्य वर्ष है। इस प्रकार कलियुग का पूरा मान बारह सौ दिव्य वर्ष है। इन चार युगों का सम्मिलित कालमान बारह हजार दिव्य वर्ष है।

Content is available only for registered users. Please login or register

Please follow and like us:
Pin Share

Discover more from Vadicjagat

Subscribe to get the latest posts sent to your email.

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

This site uses Akismet to reduce spam. Learn how your comment data is processed.