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॥ भगवती दुर्गा ॥

एकाक्षर:- भगवती दुर्गा का एकाक्षरी बीजमंत्र “दुं” है । दां दीं दूं दें दौं दः से अङ्गन्यास करे ।

॥ अथ अष्टाक्षर मंत्र प्रयोगः ॥

भगवती दुर्गा का अष्टाक्षर मंत्र प्रधान हैं ।

मंत्रोद्धार:- मायाद्रि ( माया-ह्रीं, अद्रि-द) कर्णविन्द्वाढ्यो (कर्ण-उ, बिन्दुअनुस्वार ) भूयोऽसौ सर्गवान भवेत् । (पुन यह वर्ण विसर्ग युक्त: दुः) पञ्चान्तकः (ग) प्रतिष्ठावान (आ) मारुतो (य) भौतिकासनः (ऐ) इस तरह ह्रीं दुं दुर्गायै हुआ । इसके बाद ” तारादि (ॐ) हृदयान्तोऽयं (हृदयः नमः) मंत्रोवस्वक्षरात्मकः । आदि में ॐ और अंत में नमः लगाने से यथा मन्त्रः-

ॐ ह्रीं दुं दुर्गायै नमः ।

॥ अष्टाक्षर मन्त्रस्य विधानम् ॥

विनियोग:- ॐ अस्य श्रीदुर्गाष्टाक्षरमंत्रस्य महेश्वर ऋषिः । श्री दुर्गाष्टाक्षरात्मिका देवता । दुं बीजम् । ह्रीं शक्तिः ॥ ॐ कीलकाय नम इति दिग्बंधः । धर्मार्थकाममोक्षार्थे जपे विनियोगः ।

ऋष्यादिन्यास:- ॐ महेश्वरऋषये नमः शिरसि ॥ १ ॥ अनुष्टप्छंदसे नमः मुखे ॥ २ ॥ श्रीदुर्गाष्टाक्षरात्मिकादेवतायै नमो हृदि ॥ ३ ॥ दुं बीजाय नमो नाभौ ॥ ४ ॥ ह्रीं शक्तये नमो गुह्ये ॥ ५ ॥ ॐ कीलकाय नमः पादयोः ॥ ६ ॥ नमो दिग्बंधः इति सर्वाङ्गे ॥ ७ ॥ इति ऋष्यादिन्यासः ।

करन्यासः- ॐ ह्रां अंगुष्ठाभ्यां नमः ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं तर्जनीभ्यां नमः ॥ २ ॥ ॐ हूँ मध्यमाभ्यां नमः ॥ ३ ॥ ॐ ह्रैं अनामिकाभ्यां नमः ॥ ४ ॥ ॐ ह्रौं कनिष्ठिकाभ्यां नमः ॥ ५ ॥ ॐ ह्रः करतलकरपृष्ठाभ्यां नमः ॥ ६ ॥ इति करन्यासः ।

हृदयादिन्यासः- ॐ ह्रां हृदयाय नमः ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं शिरसे स्वाहा ॥ २ ॥ ॐ ह्रूँ शिखायै वषट् ॥ ३ ॥ ॐ ह्रैं कवचाय हुम् ॥ ४ ॥ ॐ ह्रौं नेत्रत्रयाय वौषट् ॥ ५ ॥ ॐ ह्रः अस्त्राय फट् ॥ ६ ॥ इति हृदयादिषडंगन्यासः ।

वर्णन्यासः- ॐ ॐ नमः शिरसि ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं नमो मुखे ॥ २ ॥ ॐ दुं नमो वक्षसि ॥ ३ ॥ ॐ गां नमो नाभौ ॥ ४ ॥ ॐ यैं नमः पृष्ठे ॥ ५ ॥ ॐ नं नमो जान्वोः ॥ ६ ॥ ॐ मः नमः पादयोः ॥ ७ ॥ इतिवर्णन्यासः ।

तत्त्वन्यासः- ॐ ॐ आत्मतत्त्वाय नमः शिरसि ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं विद्यातत्त्वाय नमो मुखे ॥ २ ॥ ॐ ह्रीं दुं शिवतत्त्वाय नमो हृदि ॥ ३ ॥ ॐ गुरुतत्त्वाय नमो नाभौ ॥ ४ ॥ ॐ ह्रीं शक्तितत्त्वाय नमः जंघयोः ॥ ५ ॥ ॐ दुं शिवशक्तित्त्वाय नमः पादयोः ॥ ६ ॥ इति तत्त्वन्यास ।

शुद्धमातृकान्यासः- ॐ अँ आँ कँ खँ गँ घँ ङँ इँ ईं हृदयाय नमः ॥ १ ॥ ॐ ह्रीं उँ ऊँ चँ छँ जँ झँ ञँ ऋँ ‌ॠँ शिरसे स्वाहा ॥ २ ॥ ॐ दुं लृँ टँ ठँ डँ ढँ णँ ॡँ शिखायै वषट् ॥ ३ ॥ ॐ गां एं तं थं दं धं नं ऐं कवचाय हुम् ॥ ४ ॥ ॐ यैं ओं पं फं बं भं मं औं नेत्रत्रयाय वौषट् ॥ ५ ॥ ॐ नमः अं यं रं लं वं शं षं सं हं लं क्षं अः अस्त्राय फट ॥ ६ ॥ इति शुद्धमातृकान्यासः । एवं करन्यासं कुर्यात् ।
ततः पद्धतिमार्गेण देवीकलामातृका विन्यस्य पूर्वोक्तषडंगं कृत्वा ध्यायेत् ।

॥ अथ ध्यानम् ॥
दूर्वानिभां त्रिनयनां विलसत्किरीटां शंखाब्जखङ्गशरखेटकशूलचापान् ।
संतर्जनीं च दधतीं महिषासनस्थां दुर्गां नवारकुलपीठगतां भजेऽहम् ॥

॥ अथ यंत्रपूजनम् ॥


भद्रमंडल पर दुर्गा की नवपीठशक्तियों का अर्चन करे । यंत्र की आवरण पूजा हेतु गंध, पुष्पाक्षत का मिश्रण कर लेवे । प्रत्येक आवरण पूजा के पहले अनुमति हेतु पुष्पांजलि देवे । आवरण देवताओं का पादुका पूजन गंधपुष्पाक्षत से कर पुनः पुष्पांजलि देवे तथा विशेषार्ध से जल छोड़े एवं कहे ‘पूजितास्तर्पिताः संतु’ । नवपीठशक्तीः पूजयेत् । तद्यथा – ॐ प्रभायै नमः ॥ १ ॥ ॐ मायायै नमः ॥ २ ॥ ॐ जयायै नमः ॥ ३ ॥ ॐ सूक्ष्मायै नमः ॥ ४ ॥ ॐ विशुद्धायै नमः ॥ ५ ॥ ॐ नंदिन्यै नमः ॥ ६ ॥ ॐ सुप्रभायै नमः ॥ ७ ॥ ॐ विजयायै नमः ॥ ८ ॥ ॐ सर्वसिद्धिदायै नमः ॥ ९ ॥ इति पूजयेत् ।

इसके बाद स्वर्णादि से निर्मित यन्त्रपत्र को ताम्रपात्र में रख कर धी से उसका अभ्यङ्ग करके उसके ऊपर दूध की धारा तथा जल की धारा देकर स्वच्छ वस्त्र से सुखाकर उसके ऊपर चार द्वार वाले, तीन वृत्त वाले, आठ कमलों वाले, गोलाकार, षट्कोण, त्रिकोण, और विन्दुमय श्रीचक्र को अष्टगन्ध से लिखकर “ॐ ह्रीं वज्रनखदंष्ट्रायुधाय महासिंहाय फट् ।” इस मन्त्र से पुष्पाद्यासन देकर पीठ के बीच में स्थापित करके उसमें प्राणप्रतिष्ठा करके मूलमन्त्र से मूर्ति की कल्पना करके पुनः ध्यान करके आवाहन से लेकर पुष्पांजलिदान तक उपचारों से पूजा करके देवी की आज्ञा से इस प्रकार आवरण पूजा करे । तद्यथापुष्पांजलिमादाय –
ॐ संविन्मये परे देवि परामृतरसप्रिये।
अनुज्ञां देहि मे दुर्गे परिवारार्चनाय ते ॥ १ ॥
ॐ ह्रीं दुं सर्वसिद्धिप्रदाय श्रीचक्राय नमः ।
इससे पुष्पांजलि दें । इस प्रकार आज्ञा लेकर आवरण पूजा करें ।

प्रथमावरणम्:- तद्यथा – भूपुराभ्यंतरे पूर्वादिचतुर्दिक्षु – ॐ ह्रीं दुं गं गणेशाय नमः गणेशश्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः इति सर्वत्र ॥ १ ॥ ॐ ह्रौं कुमाराय नमः कुमार श्री पा० ॥ २ ॥ ॐ प्रीं पुष्पदंताय नमः पुष्पदंत श्री पा० ॥ ३ ॥ ॐ वें विकर्तनाय नमः विकर्तन श्री पा० ॥ ४ ॥ इस प्रकार द्वारपालों की पूजा करके पुष्पांजलि लेकर मूलमन्त्र का उच्चारण करके –
ॐ अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले ।
भक्त्या समर्पये तुभ्यं प्रथमावरणार्चनम् ॥ १ ॥
यह पढ़कर पुष्पांजलि देकर विशेष अर्घ से जल बिन्दु डालकर “पूजितास्तर्पिताः सन्तु” यह कहे । इति प्रथमावरणम् ॥ १ ॥

द्वितीयावरणम्:- इसके बाद अष्टदलों में पूज्य – पूजक के बीच पूर्व दिशा को अन्तराल मानकर तदनुसार अन्य दिशाओं की कल्पना करके पूर्व दिशा से आरम्भ कर वामावर्त क्रम से : ॐ ब्राह्मयै नमः ब्राह्मी श्री० ॥ १ ॥ ॐ नारायण्यै नमः नारायणी श्री० ॥ २ ॥ ॐ चामुण्डायै नमः चामुण्डा श्री० ॥ ३ ॥ ॐ अपराजितायै नमः अपराजिता श्री० ॥ ४ ॥ ॐ माहेश्वर्यै नमः माहेश्वरी श्री० ॥ ५ ॥ ॐ कौमार्यै नमः कौमारी श्री० ॥ ६ ॥ ॐ वाराह्यै नमः वाराही श्री० ॥ ७ ॥ ॐ नरसिंह्यै नमः । नारसिंही श्री० ॥ ८ ॥
इन आठों की पूजा कर पुष्पांजलि लेकर मूल का उच्चारण करके
“ॐ अभीष्टसिद्धिं मे देहि शरणागतवत्सले ।
भक्त्या समर्पये तुभ्यंद्वितीयावरणार्चनम् ॥ २ ॥
ॐ ह्रीं दुं सर्वाशापूरकाय श्रीचक्राय नमः । इस प्रकार पुष्पांजलि दे । इति द्वितीयावरणम् ॥ २ ॥

तृतीयावरणम् :- ततोऽष्टदलागेषु प्राचीक्रमेण वामावर्तेन च – ॐ असितांगभैरवाय नमः असिगांगभैरव श्री० ॥ १ ॥ ॐ रुरुभैरवाय नमः । रुरुभैरव श्री० ॥ २ ॥ ॐ चण्डभैरवाय नमः । चण्डभैरव श्री० ॥ ३ ॥ ॐ क्रोधभैरवाय नमः । क्रोधभैरव श्री० ॥ ४ ॥ ॐ उन्मत्तभैरवाय नमः । उन्मत्तभैरव श्री० ॥ ५ ॥ ॐ कपालभैरवाय नमः । कपालभैरव श्री० ॥ ६ ॥ ॐ भीषणभैरवाय नमः । भीषणभैरव श्री० ॥ ७ ॥ ॐ संहारभैरवाय नमः । संहारभैरव श्रीपा० ॥ ८ ॥
इत्यष्टौ भैरवान्यूजयित्वा पूर्वोक्तं पुष्पांजलिं च दद्यात् । इति तृतीयावरणम् ॥ ३ ॥

चतुर्थावरणम् :- ततः नवकोणे देव्यग्निकोणमारभ्य वामावर्तेन च । ॐ शैलपुत्र्यै नमः । शैलपुत्री श्रीपा० ॥ १ ॥ ॐ ब्रह्मचारिण्यै नमः । ब्रह्मचारिणी श्रीपा० ॥ २ ॥ ॐ चन्द्रघण्टायै नमः । चन्द्रघण्टा श्रीपा० ॥ ३ ॥ ॐ कूष्माण्डायै नमः । कूष्माण्डा श्रीपा० ॥ ४ ॥ ॐ स्कन्दमात्रे नमः । स्कन्दमातृ श्रीपा० ॥ ५ ॥ ॐ कात्यायन्यै नमः । कात्यायनी श्रीपा० ॥ ६ ॥ ॐ कालरात्र्यै नमः । कालरात्रि श्रीपा० ॥ ७ ॥ ॐ महागौर्यै नमः । महागौरी श्रीपा० ॥ ८ ॥ ॐ सिद्धिदायै नमः । सिद्धिदा श्रीपा० ॥ १ ॥
इति संपूज्य अभीष्ट० ॐ ह्रीं दुं अष्टसिद्धिदाय श्रीचक्राय नमः । इति दूर्वादलांजलिं च दद्यात् । इति चतुर्थावरणम् ॥ ४ ॥

पंचमावरणम्:- ततो वृत्ते (प्रथम वीथिकायाम्) पूर्वादिक्रमेण वामावर्तेन च । ॐ अंबिकायै नमः अंबिका श्रीपादुकां पूजयामि तर्पयामि नमः ॥ १ ॥ ॐ अष्टाक्षरायै नमः अष्टाक्षरा श्रीपा० ॥ २ ॥ ॐ अष्टभुजायै नमः । अष्टभुजा श्री० ॥ ३ ॥ ॐ नीलकण्ठायै नमः नीलकण्ठा श्रीपा० ॥ ४ ॥ ॐ जगदंबिकायै नमः जगदंबिका श्री० ॥ ५ ॥
इति संपूज्य पुष्पांजलिं च दद्यात् । इति पंचमावरणम् ॥ ५ ॥

षष्ठावरणम् :- ततो वृत्ते (द्वितीय वीथिकायाम्) प्राचीक्रमेण वामावर्तेन च । ॐ शंखाय नमः ॥ १ ॥ ॐ पद्माय नमः ॥ २ ॥ ॐ खगाय नमः ॥ ३ ॥ ॐ बाणेभ्यो नमः ॥ ४ ॥ ॐ धनुषे नमः ॥ ५ ॥ ॐ खेटकाय नमः ॥ ६ ॥ ॐ शूलाय नमः ॥ ७ ॥ ॐ तर्जन्यै नमः ॥ ८ ॥
इत्यस्त्राणि संपूज्य पुष्पांजलिं च दद्यात् । इति षष्ठावरणम् ॥ ६ ॥

सप्तमावरणम्:- ततो भूपुरे पूर्वादिकमेण । ॐ लं इन्द्राय नमः ॥ १ ॥ ॐ रं अग्नये नमः ॥ २ ॥ ॐ मं यमाय नमः ॥ ३ ॥ ॐ क्षं निर्ऋतये नमः ॥ ४ ॥ ॐ वं वरुणाय नमः ॥ ५ ॥ ॐ यं वायवे नमः ॥ ६ ॥ ॐ कुं कुबेराय नमः ॥ ७ ॥ ॐ हं ईशानाय नमः ॥ ८ ॥ ॐ आ ब्रह्मणे नमः ॥ ९ ॥ ॐ ह्रीं अनंताय नमः ॥ १० ॥
तद्बाह्ये – इन्द्रादिसमीपे ॐ वं वज्राय नमः ॥ १ ॥ ॐ शं शक्तये नमः ॥ २ ॥ ॐ दं दंडाय नमः ॥ ३ ॥ ॐ खं खड्गाय नमः ॥ ४ ॥ ॐ पां पाशाय नमः ॥ ५ ॥ ॐ अं अंकुशाय नमः ॥ ६ ॥ ॐ गं गदायै नमः ॥ ७ ॥ ॐ त्रिं त्रिशूलाय नमः ॥ ८ ॥ ॐ पं पद्माय नमः ॥ ९ ॥ ॐ चं चक्राय नमः ॥ १० ॥
इति इन्द्रादिदशदिक्पालान् वज्राद्यायुधानि च संपूज्य पुष्पांजलिं च दद्यात् । इति सप्तमावरणम् ॥ ७ ॥

इस प्रकार आवरण पूजा करके धूपदान से लेकर नमस्कार पर्यन्त षडङ्ग पूजा करके पुनः ध्यान करके देवी के आगे माला लेकर जप करे । इसका पुरश्चरण आठ लाख, चार लाख या एक लाख करे । तत्तद्दशांश होम, तर्पण, मार्जन तथा ब्राह्मण – भोजन कराये । ऐसा करने से मन्त्र सिद्ध होता है । मन्त्र के सिद्ध हो जाने पर साधक प्रयोगों को सिद्ध करे ।
तथा च महाचीनक्रमस्थानां साधकानां जयावहः ।
मन्त्रराजो महादेवि सद्यो भोगापवर्गदः ॥ १ ॥
तथा हे महादेवि ! महाचीन की परम्परा से साधना करने वालों के लिए यह मन्त्रराज शीघ्र ही जय देने वाला तथा भोग और मोक्ष देनेवाला होता है ।

॥ प्रयोग विधान ॥
मन्त्र में जितने वर्ण हैं उतने लाख या उससे आधा पुरश्चरण करे । कम-से-कम एक लाख पुरश्चरण करे । इससे कम पुरश्चरण कभी न करे । इस पुरश्चरण को करके साधक कलियुग में कल्पद्रुम के समान हो जाता है । इसलिए दुर्गा के मन्त्र का जप अवश्य करे जो आठो सिद्धियों को देने वाला है । इसका जप करके साधक पृथिवी पर भैरव के समान विचरता है । हे महेश्वरी ! स्तम्भन, मोहन, मारण, आकर्षण, वशीकरण, उच्चाटन, शांतिकरण तथा पुष्टिकरण और इनके प्रयोगों के साधन को गै कहूंगा ।
महाचीन की परम्परा से साधना करने वालों के हित के लिए रात्रि में मूलमंत्र का दश हजार जप साधक को करना चाहिए । इसका दशांश घी, जव, तथा हिरण के मांस का हवन करना चाहिये । इससे शीघ्र वादी, जन, कामी जन तथा पानी का स्तम्भन होता है ।
वट के नीचे रुद्राक्षमाला से दश हजार जप करे । उसका दशांश घी तथा पद्माख (कमलगट्टा) और कमलपुष्प से होम करे । आरग्बंध तथा स्वधा के मूल से क्षणभर में देव और दानवों का मोहन हो जाता है तब स्वल्पबुद्धि वाले मनुष्यों की क्या कथा ?
साधक वन में वेतसी के मूल में दश हजार जप करे तथा वहाँ उसका दशांश, घी, खीर, घोंघा, से होम करे तो शत्रु मृत्यु के मुख में चला जाता है ।
सूने घर में रात में दश हजार जप करे तथा करे तथा उसका दशांश घी, सोंठ, जीरा तथा केवाँच के बीजों से होम करे तो प्रायः स्त्री का आकर्षण होता है ।
चबूतरे पर दश हजार जप करे और तुरन्त घी, कमल, गन्ने के रस, शक्कर तथा लाल फूलों से होम करे तो इन्द्र भी वश में हो जाता है, साधारण राजा का क्या कहना ।
पीपल के नीचे दश हजार जप करे तथा दशांश से स्त्रियों के केश तथा चमड़े के टुकड़ों से होम करे तो शीघ्र ही शत्रु का उच्चाटन होता है चाहे वह इन्द्र के ही समान क्यों न हो ।
प्रश्नकर्ता देववृक्ष के नीचे दश हजार जप करे तथा घी, मुर्गे का अण्डा, नाना प्रकार के फूलों का होम करे तो रोग तथा उपद्रवकाल की शीघ्र शांति होती है ।
लीला उपवन में मूल मन्त्र का दश हजार जप करे तथा दशांश घी, मछली, बकरे के सिर में होम करे तो हे ईशानि ! आठ चरणों में शीघ्र पुष्टि होती है ।
शारदातिलक में कहा गया है: राजा शत्रु पर विजय प्राप्त कर लेता है । साधक विजय और लक्ष्मी को पा जाता है । रोगी दीर्घायुष्य पाता है और वह सभी व्याधियों से रहित हो जाता है । वन्ध्या स्त्री भी विधिपूर्वक अभिषिक्त होने पर पुत्र को प्राप्त करती है । इस मन्त्र से अभिमंत्रित घी क्षुद्र ज्वर का नाशक होता है । गर्भिणी स्त्रियों के लिए विशेष रूप से इन मन्त्र से अभिमंत्रित भस्म आदि रोगबाधानाशक होता है ।
इति श्री देवीरहस्य तन्त्रोक्त दुर्गा अष्टाक्षर मन्त्र प्रयोग समाप्त ।

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