भगवत्स्तुति
नमोऽस्म्यहं त्वाखिलहेतुहेतुं नारायणं पूरुषमाद्यमव्ययम् ।
यन्नाभिजाताद‌रविन्दकोशाद् ब्रह्मऽऽविरासीद् यत एष लोक: ।।
भूस्तोयमग्रि: पवन: खमादिर्महानजादिर्मन इन्द्रियाणि ।
सर्वेन्द्रियार्था विबुधाश्च सर्वे ये हेतवस्ते जगतोऽङ्गभूता: ।।
यानि यानीह रूपाणि क्रीडनार्थ बिभर्षि हि ।
तैरामृष्टशुचो लोका मुदा गायन्ति ते यश: ।।
नम: कारणमत्स्याय प्रलयाब्धिचराय च ।
हयशीर्ष्णे नमस्तुभ्यं मधुकैटभमृत्यवे । ।
अकूपाराय बृहते नमो मन्दरधारिणे ।
क्षित्युद्धारविहाराय नम: सूकरमूर्तये ।।
नमस्तेऽद्भुतसिंहाय साधुलोक भयापह ।
वामनाय नमस्तुभ्यं क्रान्तत्रिभुवनाय च ।।
नमो भृगणां पतये दृप्तक्षत्रवनच्छिदे ।
नमस्ते रघुवर्याय रावणान्तकराय च ।।
नमस्ते वासुदेवाय नम: सङ्कर्षणाय च ।
प्रद्युम्नायानिरुद्धाय सात्वतां पतये नम: ।।
नमो बुद्धाय शुद्धाय दैत्यदानवमोहिने ।
म्लेच्छप्रायक्षत्रहन्त्रे नमस्ते कल्किरूपिणे ।।
नमस्ते वासुदेवाय सर्वभूतक्षयाय च ।
हृषीकेश नमस्तुभ्यं प्रपन्नं पाहि मां प्रभो ।।
(श्रीअकूरजी बोले-) प्रभो ! आप प्रकृति आदि समस्त कारणोंके परम कारण हैं । आप ही अविनाशी पुरुषोत्तम नारायण हैं तथा आपके ही नाभिकमलसे उन ब्रह्माजीका आविर्भाव हुआ है, जिन्होंने इस चराचर जगत्‌की सृष्टि की है । मैं आपके चरणोंमें नमस्कार करता हूँ । पृथ्वी, जल, अग्नि, वायु आकाश, अहङ्कार. महत्तत्त्व. प्रकृति, पुरुष, मन, इन्द्रिय, सम्पूर्ण इन्द्रियोंके विषय और उनके अधिष्ठातृदेवता-यही सब चराचर जगत् तथा उसके व्यवहारके कारण हैं और ये सब-के-सब आपके ही अङ्गस्वरूप हैं । प्रभो ! आप क्रीडा करनेके लिये पृथ्वीपर जो-जो रूप धारण करते हैं, वे सब, अवतार लोगोंके शौक-मोहको धो-बहा देते हैं और फिर सब लोग बड़े आनन्दसे आपके निर्मल यशका गान करते हैं । प्रभो ! आपने वेदों, ऋषियों, औषधियों और सत्यव्रत आदिकी रक्षा -दीक्षाके लिये मत्स्यरुप धारण किया था और प्रलयके समुद्रमें स्वच्छन्द विहार किया था । आपके मत्स्यरूपको मैं नमस्कार करता हूँ आपने ही मधु और कैटभ नामक असुरोंका संहार करनेके लिये हयग्रीव अवतार ग्रहण किया था । मैं आपके उस रूपको भी नमस्कार करता हूँ । .आपने ही वह विशाल कच्छपरूप ग्रहण करके मन्दराचलको धारण किया था, आपको मैं नमस्कार करता हूँ । आपने ही पृथ्वीके उद्धारकी लीला करनेके लिये वराहरूप स्वीकार किया था, आपको मेरा बार-बार नमस्कार । प्रह्लाद-जैसे साधुजनोंका भय मिटानेवाले प्रभो ! आपके उस अलौकिक नृसिंहरूपको मैं नमस्कार करता हूँ । आपने वामनरूप ग्रहण करके अपने पगोंसे तीनों लोक नाप लिये थे, आपको मैं नमस्कार करता हूँ । धर्म का उल्लङ्घन करनेवाले घमंडी क्षत्रियोंके वनका छेदन कर देनेके लिये आपने भृगुपति परशुरामरूप ग्रहण किया था । मैं आपके उस रूपको नमस्कार: करता हूँ । रावणका नाश करनेके लिये आपने रघुवंश में भगवान राम के रुप से अवतार ग्रहण किया था । मैं आपको नमस्कार करता हूँ । वैष्णवजनों नथा यदुवंशियोंका पालन- पोषण करनेके लिये आपने अपनेको वासुदेव, सङ्कर्षण, प्रद्युम्न और अनिरुद्ध-इस चतुर्व्यूहके रूपमें प्रकट किया है । मैं आपको नमस्कार करता हूँ । दैत्य और दानवोंको मोहित करनेके लिये आप शुद्ध अहिंसा-मार्गके प्रवर्तक बुद्धका रुप ग्रहण करेंगे । मैं आपको नमस्कार करता हूँ और पृथ्वीके क्षत्रिय जब म्लेच्छप्राय हो जायेंगे, तब उनका नाश करने के लिये आप ही कल्किके रूपमें अवतीर्ण होंगे । मैं आपको नमस्कार करता हूँ । प्रभो ! आप ही वासुदेव, आप ही समस्त जीवों के आश्रय (संङ्कर्षण) हैं; तथा आप ही बुद्धि और मनके अधिष्ठातृ देवता हृषीकेश ( प्रद्युम्न और अनिरुद्ध) हैं । मैं आपको बार-बार नमस्कार करता हूँ । प्रभो ! आप मुझ शरणागतकी रक्षा कीजिये ।
(श्रीमद्भागवत)

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