भगवान् श्रीकृष्णोपासना
मन्त्रः-

“ॐ क्लीं ग्लौं क्लीं कृष्णाय क्लीं ग्लौं क्लीं ॐ”
विनियोगः- ॐ अस्य श्री एकादशाक्षर श्रीकृष्ण-मन्त्रस्य भगवान् नारद ऋषिः, गायत्री छन्दः, श्रीकृष्ण परमात्मा देवता, ॐ इति शक्तिः, क्लीं बीजं, ग्लौं कीलकं, भगवान्-श्रीकृष्ण-परमात्मा-प्रीत्यर्थे जपे विनियोगः।
ऋष्यादि-न्यासः- श्रीनारद ऋषये नमः शिरसि, गायत्री छन्दसे नमः मुखे, श्रीकृष्ण परमात्मा देवतायै नमः हृदि, ॐ इति शक्तये नमः नाभौ, क्लीं बीजाय नमः लिंगे, ग्लौं कीलकाय नमः पादयो, भगवान्-श्रीकृष्ण-परमात्मा-प्रीत्यर्थे जपे विनियोगाय नमः सर्वांगे।
कर-न्यासः- ॐ क्लीं अंगुष्ठाभ्यां नमः, ग्लौं क्लीं तर्जनीभ्यां स्वाहा, कृष्णाय मध्यमाभ्यां वषट्, क्लीं ग्लौं अनामिकाभ्यां हुं, क्लीं ॐ कनिष्ठिकाभ्यां वौषट्, ॐ क्लीं ग्लौं क्लीं कृष्णाय क्लीं ग्लौं क्लीं ॐ करतल-कर-पृष्ठाभ्यां फट्।
अंग-न्यासः- ॐ क्लीं हृदयाय नमः, ग्लौं क्लीं शिरसे स्वाहा, कृष्णाय शिखायै वषट्, क्लीं ग्लौं कवचाय हुं, क्लीं ॐ नेत्र-त्रयाय वौषट्, ॐ क्लीं ग्लौं क्लीं कृष्णाय क्लीं ग्लौं क्लीं ॐ अस्त्राय फट्।
ध्यानः-
कस्तूरी-तिलकं ललाट-पटले, वक्ष-स्थले कौस्तुभम्।
नासाग्रे वर-मौक्तिकं, कर-तले वेणु, करे कंकणम्।।
सर्वांगे वर-चन्दन-सुललितं, कण्ठे च मुक्तावलिः।
सर्वस्वात्म-परो परात्म-परमो चिश्वात्मने धीमहि।।
अर्थात् भगवान् कृष्ण के मस्तक पर कस्तूरी का तिलक है, वक्षः स्थल पर कौस्तुभ-मणि है, नाक के अग्र-भाग में श्रेष्ठ मोती है, कर-तल में वंशी है, कर-कमलों में कंगन हैं, सारे शरीर में श्रेष्ठ सुन्दर चन्दन है और कण्ठ में मोतियों की माला है। आत्मा, परात्मा और विश्वात्मा-परायण- सभी के सर्वस्व-स्वरुप भगवान् कृष्ण का मैं ध्यान करता हूँ।

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