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भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १२१
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय १२१
प्रकीर्ण व्रत मत्स्यपुराणके १०१ वें अध्याय तथा पद्मपुराणसृष्टिखण्ड, अध्याय २० में भी स्वल्प भेदके साथ इन व्रतोंका वर्णन है।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाराज ! अब मैं अत्यन्त गुप्त विविध प्रकीर्ण व्रतका वर्णन कर रहा हूँ । जो प्रातः स्नानकर अश्वत्थ वृक्ष का पूजनकर ब्राह्मणों को तिल से भरे हुए पात्र का दान करता है, उसे कृत-अकृत किसी कार्य के लिये शोक नहीं करना पड़ता । यह ‘पात्रव्रत’ सभी पापों को दूर करनेवाला है ।om, ॐ

सुवर्ण की बृहस्पति की प्रतिमा बनाकर उसे पीत वस्त्रादि से अलंकृतकर पुण्य दिन में ब्राह्मण को दान करना चाहिये । यह ‘वाचस्पतिव्रत’ बल और बुद्धिप्रदायक है ।

एकभुक्त रहकर लवण, कटु, तिक्त, जीरक, मरिच, हींग और सोंठ से युक्त पदार्थ तथा शिलाज़ीत — ये सात पदार्थ सात कुटुम्बी ब्राह्मणों को दान करना चाहिये, इस ‘शिलाव्रत’ को करने से लक्ष्मी लोक की तथा वाक्पटुता प्राप्त होती है ।

नक्तव्रत कर गाय, वस्त्र और सुवर्ण का सुदर्शन चक्र तथा त्रिशूल गृहस्थ ब्राह्मण को दान में दे और उन्हें प्रणाम कर ‘शिवकेशव प्रीयेताम्’ यह वाक्य कहे । यह ‘शिवकेशवव्रत’ महापातक को भी नष्ट कर देता है ।

एक वर्ष तक एकभुक्त रहकर सुवर्ण का बना हुआ बैल और उपस्करों सहित तिल-धेनु ब्राह्मण को दान करे । इस व्रत को ‘रुद्रव्रत’ कहते हैं । यह व्रत सभी प्रकार के पाप एवं शोक को दूर करता है और व्रती को शिवलोक की प्राप्ति कराता है ।

पञ्चमी तिथि के दिन सर्वौषधिमिश्रित जल से स्नानकर गृहस्थाश्रम के सात उपस्करों — घर, ऊखल, सूप, सिल, थाली, घड़ा तथा चूल्हा का दान गृहस्थ ब्राह्मण को देना चाहिये । इसे ‘गृहव्रत’ कहते हैं । इस व्रत को करने से सभी सुख प्राप्त होते हैं । इस व्रत का उपदेश अत्रिमुनि ने अनसूया को किया था ।

सुवर्ण का कमल तथा नीलकमल पात्रसहित श्रद्धा से गृहस्थ ब्राह्मण को दान देना चाहिये । यह ‘नीलव्रत’ है । इस व्रत को जो कोई भी व्यक्ति करता है, उसे विष्णुलोक की प्राप्ति होती है ।

आषाढ़ आदि चार महीनों में तैलाभ्यङ्ग नहीं करना चाहिये । अन्त में पारणा में तिल के तेल से भरा हुआ नया घड़ा ब्राह्मण को दे और घी तथा पायसयुक्त भोजन कराये, इस व्रत को ‘प्रीतिव्रत’ कहते हैं । इसे भक्तिपूर्वक करने से विष्णुलोक की प्राप्ति होती है ।

चैत्र मास में दही, दूध, घी और गुड़, खाँड़, ईख के द्वारा बने पदार्थों का त्याग करना चाहिये और बाद में दो ब्राह्मणों की पूजाकर दही, दूध तथा दो वस्त्र, रस से भरे पात्र आदि पदार्थ ‘गौरी में प्रीयताम्’ कहकर ब्राह्मण को देना चाहिये । यह ‘गौरीव्रत’ है । इस व्रत को जो करता है, उसे गौरीलोक की प्राप्ति होती है ।

त्रयोदशी से एक वर्ष तक नक्तव्रत करने के बाद पारणा में दो वस्त्रों सहित सुवर्ण का अशोक वृक्ष तथा ब्राह्मण को दक्षिणा देकर ‘प्रद्युम्नः प्रीयताम्’ यह वाक्य कहना चाहिये । यह ‘कामव्रत’ है । इस व्रत को करने से सभी प्रकार के शोक दूर हो जाते हैं तथा विष्णुलोक की प्राप्ति होती है ।

आषाढ़ आदि चार मासों में अपने नख नहीं काटने चाहिये और बैगन का भोजन भी नहीं करना चाहिये । अन्त में कार्तिक पूर्णिमा के दिन घी और शहद से भरे हुए घट के साथ सुवर्ण का बैगन ब्राह्मण को दान दे । इसे ‘शिवव्रत’ कहते हैं । शिवव्रत करनेवाला व्यक्ति रुद्रलोक को प्राप्त करता है ।

इसी प्रकार पूर्णिमा को एकभुक्त व्रत करने के बाद चन्दन से पूर्णिमा की मूर्ति बनाकर उसका पूजन करे । अनन्तर दूध, दही, घी, शहद और श्वेत शर्करा — इन पाँच सामग्रियों से भरे हुए पाँच घड़े पांच ब्राह्मणों को दान में दें । इस व्रत को ‘पञ्चव्रत’ कहते हैं । इस व्रत को करने से समस्त मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं ।

हेमन्त और शिशिर ऋतु में अद्भुत पुष्पों का त्यागकर फाल्गुन की पूर्णिमा को यथाशक्ति सुवर्ण के बने हुए तीन पुष्प ब्राह्मण को दान देकर ‘शिवकेशव प्रीयताम्’ इस वाक्य का उच्चारण करना चाहिये । इसे ‘सौगन्ध्यव्रत’ कहते हैं । इस व्रत के करने से शिरःप्रदेश से सुगन्धि उत्पन्न होती रहती है और व्रती को उतम लोक की प्राप्ति होती है ।

फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को नमक नहीं खाना चाहिये । जो व्यक्ति एक वर्ष तक नियमपूर्वक इस ‘सौभाग्यव्रत’ को करके अन्त में सपत्नीक ब्राह्मण की पूजा कर गृह के साथ गृहस्थ के उपयोगी सामग्रियों तथा उत्तम शय्या को दान देकर ‘भवानी प्रीयताम्’ इस वाक्य को कहता है, उसे गौरीलोक की प्राप्ति होती है । यह उत्तम सौभाग्य को प्रदान करनेवाला है ।

संध्या-समय एक वर्ष तक मौनव्रत रखकर पारणा कर तथा घृत-कुम्भ, दो वस्त्र और घण्टा ब्राह्मण को दान करना चाहिये । इसे ‘सारस्वतव्रत’ कहते हैं । यह व्रत विद्या और रूप को देनेवाला है । इस को व्रत करने से सरस्वतीलोक की प्राप्ति होती है ।

एक वर्ष तक पञ्चमी तिथि को उपवास करने के बाद सुवर्णकमल और श्रेष्ठ गौ ब्राह्मण को दान देना चाहिये । इसे ‘लक्ष्मीव्रत’ कहते हैं । यह व्रत कान्ति एवं सौभाग्य को प्रदान करता है । व्रती को जन्म-जन्म में लक्ष्मी की प्राप्ति और अन्त में विष्णुलोक की प्राप्ति होती है ।

जो स्त्री चैत्र मास से आरम्भ कर नियम से (प्रातःकाल) एक वर्ष तक जल का पान करे और (भगवान् सूर्यके निमित्त) जलधारा प्रदान करे और वर्ष के अन्त में घृतपूर्ण नवीन कलश का दान करे तो उसे सौभाग्य प्राप्त होता है । इसे ‘धाराव्रत’ कहा गया है । यह सभी रोगों का नाशक, कान्ति एवं सौभाग्य-प्रदायक तथा सपत्ली के दर्प को नाश करनेवाला है ।

गौरीसहित रुद्र, लक्ष्मीसहित विष्णु और राज्ञीसहित भगवान् सूर्य की मूर्ति को विधिपूर्वक स्थापित कर उनका पूजन करे, घण्टायुक्त गो, दोहनी और दक्षिणा के साथ उस मूर्ति को ब्राह्मण को दान दे । इस व्रत को ‘देवव्रत’ कहते हैं । इस व्रत को करने से शरीर दिव्य हो जाता है ।

श्वेत चन्दन, श्वेत पुष्प आदि से शिवलिङ्ग और विष्णु की मूर्ति का प्रतिदिन एक वर्ष तक उपलेपन करने के बाद जल से भरे हुए घट के साथ सुन्दर गाय ब्राह्मण को दान दे । यह ‘शुक्लव्रत’ है । यह व्रत बहुत कल्याणकारी है । इस व्रत को करनेवाला शिवलोक को प्राप्त करता है ।

अश्वत्थ, सूर्यनारायण और गङ्गाजी का नित्य प्रणामपूर्वक पूजनकर नौ वर्ष तक एकभुक्त व्रत करे, अन्त में सपत्नीक ब्राह्मण की पूजा कर तीन गाय और सुवर्ण का वृक्ष ब्राह्मण को दान दें । इस व्रत को ‘कीर्तिव्रत’ कहते हैं । यह व्रत ऐश्वर्य और कीर्ति को देनेवाला है ।

प्रतिदिन गोबर का मण्डल बनाकर उसमें अक्षत द्वारा कमल बनाये, उसके ऊपर शिव, विष्णु, ब्रह्मा, सूर्य, गौरी तथा गणपति को घी से स्नान कराकर एक वर्ष तक प्रतिदिन पूजन करने के बाद सामवेद का गान करके अन्त में आठ अंगुल के सुवर्ण-कमल सहित उत्तम गाय ब्राह्मण को दान दे । इस व्रत को ‘सामव्रत’ कहते हैं । इस व्रत को करनेवाला व्यक्ति शिवलोक को प्राप्त करता है ।

नवमी को एकभुक्तव्रत कर अन्त में कन्याओं को भोजन कराये तथा उन्हें कंचुकी, दो वस्त्र प्रदान करे एवं सुवर्ण का सिंहासन भी ब्राह्मण को दे । इस व्रत को ‘वीरव्रत’ कहते हैं । जो सभी इस व्रत को करती है, उसे अनेक जन्मों तक सुन्दर रूप, अखण्ड सौभाग्य और सुख की प्राप्ति होती रहती है । व्रती को शिवलोक की प्राप्ति होती है ।

अमावास्या से जो एक वर्षपर्यन्त श्राद्ध करता है और श्रद्धापूर्वक पाँच पयस्विनी सवत्सा गौ, पीले वस्त्र तथा पूर्ण कलश दान करता है, वह व्यक्ति अपने पूर्वजों का उद्धार कर विष्णुलोक को प्राप्त करता है । यह ‘पितृव्रत’ कहलाता है ।

जो स्त्री एक वर्ष तक ताम्बूल का त्यागकर अन्त में सुवर्ण के तीन ताम्बूल बनाकर उसमें चुने की जगह मोती रखकर तथा सुपारी के चूर्ण के साथ गणेश को निवेदित कर ब्राह्मण को दान करती है, उसे कभी भी दुर्भाग्य की प्राप्ति नहीं होती, साथ ही मुख में उत्तम सुगन्ध और सौभाग्य की प्राप्ति होती है । यह ‘पत्रव्रत’ है ।

चैत्र, वैशाख, ज्येष्ठ तथा आषाढ़ — इन चार मासों में अथवा एक मास अथवा एक पक्षपर्यन्त जल का अयाचितव्रत करना चाहिये । अन्त में जलपूर्ण कलश, अन्न, वस्त्र, घी, सप्तधान्य, तिलपात्र और सुवर्ण ब्राह्मण को दे । इस व्रत को ‘वारिव्रत’ कहते हैं । वारिव्रत को करनेवाला व्यक्ति एक कल्पपर्यन्त ब्रह्मलोक में निवास करने के बाद पृथ्वी पर चक्रवर्ती राजा होता है ।

जो एक वर्षतक पञ्चामृत से भगवान् शिव और भगवान विष्णु को स्नान कराकर अन्त में गाय, शहद और सुवर्ण ब्राह्मण को दान करता है, वह बहुत कालतक शिवलोक में निवास करता है और राजा का पद प्राप्त करता है । यह ‘वृत्तिव्रत’ कहलाता है ।

जो व्यक्ति सर्वथा मांसाहार का परित्याग कर अन्त में सुवर्ण का हरिण और सवत्सा गौ ब्राह्मण को दान करता है, उसे अश्वमेधयज्ञ का फल प्राप्त होता है । इसे ‘अहिंसाव्रत’ कहते हैं, यह सम्पूर्ण शान्तियों को देनेवाला है ।

जो माघ मास में प्रातःकाल स्नानकर अन्त में ब्राह्मण-दम्पति की वस्त्र, आभूषण, पुष्पमाला आदि से पूजाकर उनको स्वादिष्ट भोजन कराता है, वह आरोग्य और सौभाग्य को प्राप्त करता है और कल्पपर्यन्त सूर्यलोक में निवास करता है । इस व्रत को ‘सूर्यव्रत’ कहते हैं ।

जो आषाढ़ आदि चार मासों में प्रातःकाल स्नानकर कार्तिक पूर्णिमा के दिन घृत-कुम्भ और गौ गृहस्थ ब्राह्मण को दान देकर अपनी शक्ति के अनुसार ब्राह्मण-भोजन कराता है, उसकी सभी मनःकामनाएँ पूर्ण हो जाती हैं और उसे अन्त में विष्णुलोक की प्राप्ति होती है । यह ‘वैष्णवव्रत’ कहलाता है ।

जो एक अयन से दूसरे अयन तक मधु और घी का त्याग करके अन्त में घी और गौ ब्राह्मण को दानकर घी और पायस ब्राह्मणों को भोजन कराता है, उसे शील और आरोग्य की प्राप्ति होती है । इस व्रत को ‘शीलव्रत’ कहते हैं ।

जो (नियतकालतक) प्रतिदिन संध्या के समय दीपदान करता है तथा अभक्ष्य पदार्थ एवं तेल का सेवन नहीं करता, फिर व्रत समाप्त होने पर ब्राह्मण को दीपक, सुवर्ण के बने चक्र, त्रिशूल और दो वस्त्र दान करता है, वह महान् तेजस्वी होता है । यह कान्ति प्रदान करनेवाला व्रत ‘दीपव्रत’ कहलाता है ।

जो स्त्री एकभुक्त रहकर एक सप्ताह तक गन्ध, पुष्प, रक्त चन्दन आदि से भगवती गौरी की पूजा करती है, साथ ही प्रत्येक दिन क्रम-क्रम से कुमुदा, माधवी, गौरी, भवानी, पार्वती, उमा तथा काली — इन सात नामों से एक-एक सुवासिनी स्त्री को पुष्प, चन्दन, कुंकुम, ताम्बूल तथा नारिकेल एवं अलंकारो से पूजनकर ‘कुमुदा प्रीयताम्’ इस प्रकार से कहकर विसर्जन करती है तथा आठवें दिन उन्हीं पूजित सुवासिनी स्त्रियों को निमन्त्रित कर उन्हें षड्-रस भोजन आदि से तृप्तकर वस्त्र, माला तथा आभूषण एवं दर्पण आदि प्रदान करती है, साथ ही एक ब्राह्मण की भी पूजा करती है, उसे सुन्दर देह और सौभाग्य प्राप्त होता है, इसे ‘सप्तसुन्दरकव्रत’ कहा जाता है ।

चैत्र मास में सभी प्रकार के सुगन्धित पदार्थों का त्याग करना चाहिये और अन्त में सुगन्ध द्रव्य से पूर्ण एक सीपी, दो सफेद वस्त्र अपनी शक्ति के अनुसार दक्षिणा के साथ ब्राह्मण को दान देना चाहिये । इस व्रत को ‘वरुणव्रत’ कहते हैं । इसको करने से सभी कामनाएँ पूर्ण होती हैं और वरुणलोक की प्राप्ति होती है ।

वैशाख मास में नमक का त्यागकर अन्त में सवत्सा गौ ब्राह्मण को दे । यह ‘कान्तिव्रत’ है । इस व्रत को करने से कीर्ति और कान्ति की वद्धि होती है तथा अन्त में विष्णुलोक की प्राप्ति होती है ।

जो तीन पल से अधिक परिमाण का सोने का ब्रह्माण्ड बनाकर उसे तिल की ढेरी से तथा ‘मैं अहंकाररूपी तिल का दान करनेवाला हूँ’ ऐसी भावना करके घी से अग्नि को तथा दक्षिणा से ब्राह्मण को तृप्त करे एवं तीन दिन तक तिलव्रती रहे । फिर माला, वस्त्र तथा आभूषणों द्वारा ब्राह्मण-दम्पति का पूजन करके विश्वात्मा की तृप्ति के उद्देश्य से किसी शुभ दिन में तिलसहित ब्रह्माण्ड ब्राह्मण को दान करे तो ऐसा करनेवाला पुरुष पुनर्जन्म से रहित ब्रह्मपद को प्राप्त होता है । इसका नाम ‘ब्रह्मव्रत’ है । यह मनुष्यों को मोक्ष देनेवाला है ।

जो तीन दिन तक दुग्ध का आहारकर सुवर्णसहित सवत्सा गौ तथा एक पल से अधिक सुवर्ण से कल्पवृक्ष बनाकर चावलों के ढेर पर स्थापित कर उत्तम वस्त्र और पुष्पमालाओं से ढककर ब्राह्मण को दान करता है, उसे कल्पभर स्वर्ग में निवास स्थान मिलता है, इसे ‘कल्पव्रत’ कहते हैं । जो अयाचितव्रत कर सभी अलंकारों से अलंकृत एक श्रेष्ठ बछिया का व्यतीपात तथा ग्रहण, अयन-संक्रान्ति में ब्राह्मण को दान करता है, उसे परलोकगमन में कोई कष्ट नहीं होता तथा उसका मार्ग सुखदायी होता है, इसे ‘द्वारव्रत’ कहते हैं ।

जो एक वर्ष तक अष्टमी को रात्रि में एक बार भोजन करता है तथा अन्त में ब्राह्मण को पयस्विनी गौ का दान करता है, वह इन्द्रलोक में जाता है । इसे ‘सुगतिव्रत’ कहते हैं ।

जो हेमन्त और शिशिर ऋतु में ईंधन का दान करता है और अन्त में घी तथा गाय ब्राह्मण को दान करता है, वह आरोग्य, द्युति, कान्ति तथा ब्रह्मपद को प्राप्त करता है । यह ‘वैश्वानरव्रत’ सभी पापों का नाशक है ।

जो एकादशी को नक्तव्रत कर चैत्र मास के चित्रा नक्षत्र में सुवर्ण का शंख और चक्र ब्राह्मण को दान करता है, वह कल्पपर्यन्त विष्णुलोक में निवास कर पृथ्वी पर राजा का पद प्राप्त करता है । यह ‘विष्णुव्रत’ कहलाता है ।

जो एक वर्ष तक पञ्चमी को दुग्धाहार कर अन्त में दो गाय ब्राह्मण को दान करता है, वह एक कल्पतक लक्ष्मीलोक में निवास करता है । यह ‘देवीव्रत’ कहलाता है ।

जो एक वर्ष तक सप्तमी के दिन नक़व्रत कर अन्त में पयस्विनी गाय ब्राह्मण को दान करता है, उसे सूर्यलोक की प्राप्ति होती है । इसे ‘भानुव्रत’ कहते हैं ।

जो चतुर्थी को एक वर्ष तक रात्रि में भोजन करता है और अन्त में आठ गौएँ अग्निहोत्री ब्राह्मण को दान करता है, उसके सभी तरह के विघ्न दूर हो जाते हैं । इसे ‘विनायकव्रत’ कहते हैं ।

जो चातुर्मास्य में फलों का त्याग कर कार्तिक में सुवर्ण का फल, दो गौ, दो श्वेत वस्त्र और घी से पूर्ण घट दक्षिणासहित ब्राह्मण को दान करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण होते हैं । इसे ‘फलव्रत’ कहते हैं ।

एक वर्ष तक सप्तमी को उपवास कर अन्त में सुवर्ण का कमल बनाकर और कांस्य की दोहनीसहित सवत्सा गौ पौराणिक ब्राह्मण को दान करने से सूर्यलोक की प्राप्ति होती है । यह ‘सौरव्रत’ है ।

जो बारह द्वादशियों को उपवास करके अन्त में यथाशक्ति वस्त्रसहित जलपूर्ण बारह घट ब्राह्मणों को दान करता है, उसके सभी कार्य सिद्ध हो जाते हैं । यह ‘गोविन्दव्रत’ भगवान् गोविन्द के पद को प्राप्त करानेवाला है ।

कार्तिक पूर्णिमा को वृषोत्सर्ग कर रात्रि में भोजन करना चाहिये । इस व्रत को ‘वृषव्रत’ कहते हैं । इस व्रत को करने से गोलोक की प्राप्ति होती है ।

कृच्छ्र-प्रायश्चित्त के अन्त में गोदान कर यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन कराना चाहिये । यह ‘प्राजापत्यव्रत’ है । इससे पापशुद्धि होती है ।

जो एक वर्ष तक चतुर्दशी को नक्तव्रत करके अन्त में दो गायों का दान करता है, वह शैव-पद को प्राप्त करता है । यह ‘त्र्यम्बकव्रत’ है ।

सात रात्रि उपवास कर ब्राह्मण को घृतपूर्ण घट का दान करे । इसे ‘ब्रह्मव्रत’ कहते हैं, इससे ब्रह्मलोक की प्राप्ति होती है ।

कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्दशी को उपवास कर रात्रि के समय पञ्चगव्य-पान करे अर्थात् कपिला गौ का मूत्र, कृष्णा गौ का गोबर, श्वेत गौ का दूध, लाल गौ का दही तथा कबरी गौ का घी लेकर मन्त्रों से कुशोदक मिलाकर प्राशन करे । दूसरे दिन प्रातः स्नान कर देवता और पितरों का तर्पण आदि करने के बाद ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं भी मौन होकर भोजन करे । इसे ‘ब्रह्मकूर्चव्रत’ कहते हैं । इस व्रत को करने से बाल्य, यौवन और बुढ़ापे में किये गये सभी प्रकार के पापों का नाश हो जाता है ।

जो एक वर्ष तक तृतीया को बिना पकाये अन्न, फल इत्यादि का भोजन करता है और अन्त में सुन्दर गौ ब्राह्मण को दान में देता है, वह शिवलोक में निवास करता है । इसे ‘ऋषिव्रत’ कहते हैं ।

एक वर्ष तक ताम्बूल आदि मुखवास के पदार्थों का त्यागकर अन्त में ब्राह्मण को गाय का दान करे । यह ‘सुमुखव्रत’ है । इससे कुबेरलोक की प्राप्ति होती है ।

रात्रि भर जल में निवास कर प्रातःकाल जो गोदान करता है, उसे वरुणलोक की प्राप्ति होती है । यह ‘वरुणव्रत’ कहलाता है ।

जो चान्द्रायणव्रत करने के बाद सुवर्ण का चन्द्रमा बनाकर ब्राह्मण को दान करता है, उसे चन्द्रलोक की प्राप्ति होती है । यह ‘चन्द्रव्रत’ है ।

ज्येष्ठ मास की अष्टमी और चतुर्दशी को पञ्चाग्नि-सेवन करके सुवर्णसहित गौ का ब्राह्मण को दान करे, यह ‘रुद्रव्रत’ है । इससे रुद्रलोक की प्राप्ति होती है ।

जो एक वर्ष तक तृतीया को शिवालय में उपलेपन करने के बाद गोदान करता है वह स्वर्गलोक प्राप्त करता है । यह ‘भवानीव्रत’ है ।

जो माघ मास की सप्तमी तिथि को रात्रि में आर्द्र वस्त्रों को धारण किये रहता है और उपवास कर ब्राह्मण को गौ का दान करता है, वह कल्पभर तक स्वर्ग में निवास करता है । यह ‘तापनव्रत’ कहलाता है ।

जो तीन रात्रि उपवास कर फाल्गुन की पूर्णिमा को गृहदान करता है, उसे सूर्यलोक की प्राप्ति होती है । यह ‘धामव्रत’ है ।

पूर्णमासी को उपवास कर तीनों संध्याओं में वस्त्र, आभूषण, भोजन आदि देकर सपत्नीक ब्राह्मण की पूजा करनी चाहिये । इस व्रत को ‘इन्दुव्रत’ कहते हैं । इस व्रत के प्रभाव से उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है ।

जो शुक्ल पक्ष की द्वितीया को नमक से भरे हुए काँसे के पात्र के साथ वस्त्र और दक्षिणा एक वर्ष तक ब्राह्मण को देता है और अन्त में शिवमन्दिर में गोदान करता है, वह कल्पभर तक शिवलोक में निवास करने के बाद राजाओं का राजा होता है । इसे ‘सोमव्रत’ कहते हैं ।

एक वर्ष तक प्रत्येक प्रतिपदा को एक समय भोजन करने के बाद कपिला गौ ब्राह्मण को दान करें । यह ‘आग्नेयव्रत’ है । इसके करने से अग्निलोक की प्राप्ति होती है ।

जो माघ मास की एकादशी, चतुर्दशी और अष्टमी को एकभुक्त रहता है तथा वस्त्र, जूता, कंबल, चर्म आदि शीत निवारण करनेवाली वस्तुओं का दान करता है तथा चैत्र में इन्हीं तिथियों में छाता, पंखा आदि उष्णनिवारक पदार्थों का दान करता है, उसे अश्वमेध यज्ञ करने का फल प्राप्त होता है । यह ‘सौख्यव्रत’ है ।

एक वर्ष तक दशमी तिथि को एकभुक्तव्रत करके अन्त में सुवर्ण की स्त्री-रूप दस दिशाओं की मूर्ति तिलों की राशि पर स्थापितकर गायसहित ब्राह्मण को दान करने से महापातक दूर हो जाते हैं । यह ‘विश्वव्रत’ है । इसे करने से ब्रह्माण्ड का आधिपत्य मिलता है ।

जो शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को नक्तव्रत करके सूर्यनारायण का पूजनकर सप्तधान्य और लवण ब्राह्मणों को दान देता है, वह अपने सात कुलों का उद्धार करता है । यह ‘धान्यव्रत’ है ।

एक मास उपवासकर जो ब्राह्मण को गाय प्रदान करता है, उसे विष्णुलोक की प्राप्ति होती है । इसे ‘भीमव्रत’ कहते हैं ।

जो तीस पल से अधिक पर्वत और समुद्रसहित स्वर्ण की पृथ्वी बनाकर तिलों की राशि पर रखकर कुटुम्बी ब्राह्मण को दान करता है तथा दूध पीकर रहता है, वह सात कल्प तक रुद्रलोक में प्रतिष्ठित होता है । यह ‘महीव्रत’ कहलाता है ।

माघ अथवा चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया को गुड़ का भक्षण करे तथा सभी उपस्करों सहित गुड-धेनु ब्राह्मण को दान दे, उसे ‘उमाव्रत‘ कहते हैं । इस व्रत को करनेवाला गौरीलोक में निवास करता है ।

जो एक वर्ष तक केवल एक ही अन्न का भोजन करता है और भक्ष्य पदार्थों के साथ जल का घड़ा दान करता है, वह कल्पपर्यन्त शिवलोक में निवास करता है । इसे ‘प्राप्तिव्रत’ कहते हैं ।

जो कार्तिक से आरम्भ कर प्रत्येक मास की तृतीया को रात्रि में गोमूत्र में पकायी गयी लपसी का प्राशन करता हैं, वह गौरीलोक में एक कल्प तक निवास करता है, अनन्तर पृथ्वी पर राजा होता है । यह महान् कल्याणकारी ‘रुद्रव्रत’ है ।

जो पुरुष कन्यादान करता है अथवा कराता है, वह अपने इक्कीस कुलसहित ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है । कन्यादान से बढ़कर कोई भी दान उत्तम नही है । इस दान को करने से अक्षय स्वर्ग की प्राप्ति होती है । यह ‘कन्यादानव्रत’ है ।

तिलपिष्ट का हाथी बनाकर दो लाल वस्त्र, अंकुश, चामर, माला आदि से उसको सजाकर तथा ताम्रपत्र में स्थापित करने के बाद वस्त्राभूषण आदि से पत्नीसहित ब्राह्मण का पूजन करके गलेतक जल में स्थित होकर वह हाथी उनको दान कर दे । यह ‘कान्तारव्रत’ है । इस व्रत को करने से जंगल आदि से सम्बन्धित समस्त संकट और पापों से छुटकारा मिल जाता है ।

जो ज्येष्ठा नक्षत्र आने पर ‘त्रातारमिन्द्रमवितारमिन्द्रम्०’ आदि मन्त्रों से इन्द्रदेवता का व्रत-पूजन तथा हवन करते हैं, ये प्रलयपर्यन्त्त इन्द्रलोक में निवास करते हैं । इसे ‘पुरन्दरव्रत’ या ‘इन्द्रव्रत’ कहते हैं ।

जो पञ्चमी को दूध का आहार करके सुवर्ण की नाग-प्रतिमा ब्राह्मण को देता है, उसे कभी सर्प का भय नहीं रहता । शुक्ल पक्ष की अष्टमी को उपवास कर दो श्वेत वस्त्र और घण्टा से भूषित बैल ब्राह्मण को दान दे । इसे ‘वृषव्रत’ कहते हैं । इस व्रत को करनेवाला एक कल्प तक शिवलोक में निवास करता है तथा पुनः राजा का पद प्राप्त करता है ।

उत्तरायण के दिन एक सेर घी से सूर्यनारायण को स्नान कराकर उतम घोड़ी ब्राह्मण को दे । इस व्रत को ‘राज्ञीव्रत’ कहते हैं । इस व्रत को करनेवाले व्यक्ति को अभीष्ट फल की प्राप्ति होती है तथा अन्त में वह पुत्र, भाई, स्त्री आदिसहित सूर्यलोक में निवास करता है ।

जो नवमी को नक्तव्रत कर भगवती विन्ध्यवासिनी की पूजाकर पिञ्जर के साथ सुवर्ण का शुक ब्राह्मण को प्रदान करता है, उसे उत्तम वाणी और अन्त में अग्निलोक की प्राप्ति होती है । इसे ‘आग्नेयव्रत’ कहते हैं ।

विष्कुम्भ आदि सत्ताईस योगों में नक्तव्रत करके क्रम से घी, तेल, फल, ईख, जौ, गेहूँ, चना, सेम, शालि-चावल, नमक, दही, दूध, वस्त्र, सुवर्ण, कंबल, गाय, बैल, छतरी, जूता, कपूर, कुंकुम, चन्दन, पुष्प, लोहा, ताम्र, कांस्य और चाँदी ब्राह्मण को देना चाहिये । यह ‘योगव्रत’ है । इस व्रत को करनेवाला व्यक्ति सभी पापों से मुक्त हो जाता है और उसको कभी अपने इष्ट से वियोग नहीं होता ।

जो कार्तिकी पूर्णिमा से आरम्भ कर आश्विन की पूर्णिमा तक बारह पूर्णिमाओं में क्रम से मेष, वृष, मिथुन, कर्क, सिंह, कन्या, तुला, वृश्चिक, धनु, मकर, कुम्भ तथा मीन —इन बारह राशियों की स्वर्णप्रतिमाओं को वस्त्र, माल्य आदि से अलंकृत एवं पूजितकर दक्षिणा के साथ ब्राह्मण को दान करता है, उसके सम्पूर्ण उपद्रव का शमन हो जाता है एवं सारी आशाएँ पूर्ण हो जाती हैं और उसे सोमलोक की प्राप्ति होती है । यह ‘राशिव्रत’ कहलाता है ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाराज ! मैंने इन विविध व्रतों को बतलाया है, इन व्रत की विधि श्रवण करने या पढ़नेमात्र से ही पातक, महापातक और उपपातक नष्ट हो जाते है । जो कोई भी व्यक्ति इन व्रतों को भक्तिपूर्वक करेगा, उसे धन, सौख्य, संतान, स्वर्ग आदि कोई भी पदार्थ दुर्लभ नहीं होगा ।
(अध्याय १२१)

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