भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १४०
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय १४०
दीपमालिकोत्सव

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — महाराज ! पूर्वकाल में भगवान् विष्णु ने वामनरूप धारणकर दानवराज बलि को छलकर इन्द्र को राज्य का भार सौंप दिया और राजा बलि को पाताल लोक में स्थापित कर दिया । भगवान् ने बलि के यहाँ सदा रहना स्वीकार किया । कार्तिक की अमावास्या को रात्रि में सारी पृथ्वी पर दैत्यों की यथेष्ट चेष्टाएँ होती हैं ।
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युधिष्ठिर ने पूछा — भगवन् ! कौमुदी तिथि की विधि को विशेष रूप से बताने की कृपा करें । उस दिन किस वस्तु का दान किया जाता है । किस देवता की पूजा की जाती है तथा कौन-सी क्रीडा करनी चाहिये ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — राजन् ! कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की चतुर्दशी को प्रभात के समय नरक के भय को दूर करने के लिये स्नान अवश्य करना चाहिये । अपामार्ग (चिचिड़ा) के पत्र सिर के ऊपर मन्त्र पढ़ते हुए घुमाये —

“हर पापमपामार्ग भ्राम्यमाणं पुनः पुनः ।
आपदं किल्वबषं चापि ममापहर सर्वशः ।
अपामार्ग नमस्तेऽस्तु शरीरं मम शोधय ॥”
(उत्तरपर्व १४० । ९)

इसके बाद धर्मराज के नामों — यम, धर्मराज, मृत्यु, वैवस्वत, अन्तक, काल तथा सर्वभूतक्षय का उच्चारण कर तर्पण करे । देवताओं की पूजा करने के बाद नरक से बचने के उद्देश्य से दीप जलाये । प्रदोष के समय शिव, विष्णु, ब्रह्मा आदि के मन्दिरों में, कोष्ठागार, चैत्य, सभामण्डप, नदीतट, महल, तडाग, उद्यान, वापी, मार्ग, हस्तिशाला तथा अश्वशाला आदि स्थानों में दीप प्रज्वलित करने चाहिये ।

अमावास्या के दिन प्रातःकाल स्नान कर देवता और पितरों का भक्तिपूर्वक पूजन-तर्पण आदि करे तथा पार्वण श्राद्ध करे । अनन्तर ब्राह्मण को दूध, दही, घृत और अनेक प्रकार के स्वादिष्ट भोजन कराकर दक्षिणा प्रदान करे और उन्हें संतुष्ट करे । अपराह्नकाल में राजा द्वारा अपने राज्य में यह घोषित कराना चाहिये कि ‘आज इस लोक में बलि का शासन है । नगर के सभी लोगों को अपनी सामर्थ्य अनुसार अपने घर को स्वच्छ साफ-सुथरा करके नाना प्रकार के रंग-बिरंगे तोरण-पताकाओं, पुष्पमालाओं तथा बंदनवारों से सजाना चाहिये । नगर के सभी लोगों अर्थात् नर-नारी, बाल-वृद्ध आदि को चाहिये कि सुन्दर उत्तम वस्त्र पहनकर कुंकुम, चन्दन आदि का लेप लगाकर ताम्बूल का भक्षण करते हुए आनन्दपूर्वक नृत्य-गीतादिकों का आयोजन करें । इस प्रकार अतीव उल्लास से एवं प्रीतिपूर्वक इस दिन दीपोत्सव मनाना चाहिये । प्रदोष के समय दीपमाला प्रज्वलित कर अनेक प्रकार के दीप-वृक्ष खड़े करने चाहिये । उस समय राक्षस लोक में विचरण करते हैं । उनके भय को दूर करने के लिये श्रेष्ठ कन्याओं को दीप-वृक्षों पर तण्डुल ( धानको लावा) फेंकते हुए दीपकों से नीराजन करना चाहिये । दीपमालाओं के जलाने से प्रदोष-वेला दोषरहित हो जाती है और राक्षसादि का भय दूर हो जाता है । इस प्रकार अति शोभासम्पन्न नगर की शोभा देखने के उद्देश्य से राजा को अपने मित्र, मन्त्री आदि के साथ अर्धरात्रि के समय धीरे-धीरे पैदल ही चलना चाहिये । राजकर्मचारी भी हाथ में फ्रज्वलित दीपक लिये रहें । पूरे नगर की रमणीयता देखकर राजा को यह मानना चाहिये कि राजा बलि मेरे ऊपर आज प्रसन्न हो गये होंगे । फिर राजा अपने महल में वापस आ जाय ।

आधी रात बीत जाने पर जब सब लोग निद्रा में हों, उस समय घर की स्त्रियों को चाहिये कि वे सूप बजाते हुए घरभर में घूमती हुई आँगन तक आये और इस प्रकार वे दरिद्रा—अलक्ष्मी का अपने घर से निस्सारण करें । प्रातःकाल होते ही राजा को चाहिये कि वस्त्र, आभूषण आदि देकर ब्राह्मणों, सत्पुरुषों को संतुष्ट करे और भोजन, ताम्बूल देकर मधुर वचनों से पण्डितों का सत्कार करे तथा सामन्त, सिपाही और सेवक आदि को आभूषण, धन आदि देकर संतुष्ट करे तथा अनेक प्रकार के मल्लक्रीडा आदि का आयोजन करे । राजा को मध्याह्न के अनन्तर नगर के पूर्व दिशा में ऊँचे स्तम्भ अथवा वृक्षों पर कुश और काश की बनी मार्गपाली मार्गपाली दरवाजे के पास बना हुआ स्वागतद्वार है, जो कुश, काश, तृण आदि और आम्र तथा अशोक के पत्ते से अलंकृत कर बनायी जाती है। बाँधकर उसकी पूजा करे । फिर हवन करे । अपनी प्रजा को भोजन देकर संतुष्ट करे । उस समय राजा को मार्गपाली की आरती करनी चाहिये, यह आरती विजय प्रदान करती है । उसके बाद गाय, बैल, हाथी, घोड़ा, राजा, राजपुत्र, ब्राह्मण, शूद्र आदि सभी लोगों को उस मार्गपाली के नीचे से निकलना चाहिये । मार्गपाली को बाँधनेवाला अपने दोनों कुलों का उद्धार करता है । इसका लङ्घन करनेवाले वर्ष भर सुखी और नीरोग रहते हैं । फिर भूमि पर पाँच रंगों से मण्डल लिखकर उसके मध्य में प्रसन्नमुख, द्विभुज, कुण्डल धारण करनेवाले कूष्माण्ड, बाण तथा मुर आदि दानव के साथ सर्वाभरणभूषित रानी विन्ध्यावली सहित राजा बलि की मूर्ति की स्थापना करे और कमल, कुमुद, कह्लार, रक्त कमल आदि पुष्पों तथा गन्ध, दीप, नैवेद्य, अक्षत और दीपकों तथा अनेक उपहारों से राजा बलि की पूजा कर इस प्रकार प्रार्थना करे —

“बलिराज नमस्तुभ्यं विरोचनसुत प्रभो ।
भविष्येन्द्रसुराराते पूजेयम् प्रतिगृह्यताम् ॥”
(उतरपर्व १४० | ५४)

इस प्रकार पूजन कर रात्रि को जागरणपूर्वक महोत्सव करना चाहिये । नगर के लोग अपने-अपने घर में शय्या में श्वेत तण्डुल बाँधकर राजा बलि को उसमें स्थापित कर फल-पुष्पादि से पूजन करें और बलि के उद्देश्य से दान करें, क्योंकि राजा बलि के लिये जो व्यक्ति दान देता है, उसका दिया हुआ दान अक्षय हो जाता है । भगवान् विष्णु ने प्रसन्न होकर बलि से पृथ्वी को प्राप्त किया और यह कार्तिकी अमावास्या तिथि राजा बलि को प्रदान की, उसी दिन से यह कौमुदी का उत्सव प्रवृत्त हुआ है । यह तिथि सभी उपद्रव, सभी प्रकार के विघ्न, शोक आदि को दूर करनेवाली है । धन, पुष्टि, सुख आदि प्रदान करती है । ‘कु’ यह पृथ्वी का वाचक शब्द है और ‘मुदी’ का अर्थ होता है प्रसन्नता । इसलिये पृथ्वी पर सबको हर्ष देने के कारण इसका नाम कौमुदी पड़ा । जो राजा वर्षभर में एक दिन राजा बलि का उत्सव करता है, उसके राज्य में रोग, शत्रु, महामारी और दुर्भिक्ष का भय नहीं होता । सुभिक्ष, आरोग्य और सम्पत्ति की वृद्धि होती है । इस कौमुदी तिथि को जो व्यक्ति जिस भाव में रहता है, उसे वर्षभर उस भाव की प्राप्ति होती है । यदि व्यक्ति उस दिन रुदन कर रहा हो तो रुदन, हर्षित है तो हर्ष, दुःखी है तो दुःख, सुखी है तो सुख, भोग से भोग, स्वस्थता से स्वस्थता तथा दीन रहने से दीनता की प्राप्ति होती है । इसलिये इस तिथि को हृष्ट और प्रसन्न रहना चाहिये । यह तिथि वैष्णवी भी है, दानवी भी हैं और पैत्रिकी भी है । दीपमाला के दिन जो व्यक्ति भक्ति से राजा बलि का पूजन-अर्चन करता है, यह वर्षभर आनन्दपूर्वक सुख से व्यतीत करता है और उसके सारे मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं ।
(अध्याय १४०)

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