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भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १५२
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय १५२
तिलधेनु-दान की विधि

भगवान् श्रीकृष्ण कहते हैं — महाराज ! अब मैं भगवान् वाराह के द्वारा कहे गये तिलधेनु-दान की विधि बता रहा हूँ । जिससे दाता ब्रह्महत्यादि महापातकों तथा सभी उपपातकों से मुक्त हो जाता है और स्वर्ग में निवास करता है ।

पहले पृथ्वी को गोबर से लीपकर उसपर काला मृगचर्म तथा उसके चारों ओर कुश बिछा ले । तदनन्तर उस पर गाय की आकृति के रूप में तिल की राशि फैला ले अर्थात् तिलमयी धेनु बना ले । सफेद, कृष्ण, भूरे तथा गोमूत्रवर्ण के तिलों से धेनु की रचना करनी चाहिये ।om, ॐ चार आढक के मान की गाय और एक द्रोण तिल से बछडे का निर्माण करे । गाय के खुर के पास चाँदी, सींग के पास स्वर्ण, जिह्वा के पास शक्कर, मुख के पास गुड़, गलकम्बल के पास कम्बल, पैर के स्थान में ईख, पीठ के स्थान पर ताँबा और नेत्रों के लिये मुक्ता रखनी चाहिये । इसी प्रकार कान के स्थान पर पीपल के पत्ते, दाँत के स्थान पर फल, पूँछ स्थान पर माला और स्तनों के स्थान पर मक्खन रखे । सिर के स्थान पर सफेद वस्त्र, रोमों के स्थान पर सफेद सरसों रख दे । सुन्दर फलों तथा मणि-मुक्ताओं से उस तिलमयी कल्पित घेनु को सुसज्जित करे । कांस्य की दोहनी भी समीप में रख दें । किसी पुण्य पर्व के दिन उस धेनु का पूजन इत्यादि कर ब्राह्मण को दान कर दे और इस मन्त्र को पढ़ते हुए प्रार्थनापूर्वक प्रदक्षिणा करे —

“या लक्ष्मीः सर्वभूतानां या वै देवेष्ववस्थिता ।
धेनुरूपेण सा देवी मम पापं व्यपोहतु ॥”
(उतरपर्व १५२ । १५)

दक्षिणा सहित गाय ब्राह्मण को दे दे । इस विधि से जो तिल-धेनु का दान करता है, वह व्यक्ति सभी पापों से मुक्त होकर परब्रह्म को प्राप्त कर लेता है ।

जो व्यक्ति इस दान का अनुमोदन कर प्रसन्नचित्त होकर प्रशंसा करते हैं तथा विधिपूर्वक जो ब्राह्मण दान ग्रहण करते हैं ये भी ब्रह्मलोक को प्राप्त करते हैं । प्रशान्त, सुशील, वेदव्रतपरायण ब्राह्मण के लिये तिलधेनु का दान करनेवाले व्यक्ति को अपने कृत-अकृत का शोक नहीं करना पड़ता । तिलधेनु-दान करनेवाले व्यक्ति को तीन दिन अथवा एक दिन तिल का ही भोजन करना चाहिये । दान करने से मनुष्य के पाप नष्ट हो जाते हैं और उसके अंदर पवित्रता आ जाती है । तिल का भक्षण करना चान्द्रायणव्रत से अधिक श्रेष्ठ माना गया है । बाल्य, युवा अथवा वृद्धावस्था में मन, वचन तथा कर्म से जो पाप हुआ हो अथवा अभक्ष्य-भक्षण, अगम्यागमन, अपेयपान इत्यादि जो पातक, महापातक और उपपातक किये गये हों, वे सब तिल-धेनु के दान से दूर हो जाते हैं । पवित्र गङ्गा आदि नदियों में थूकने तथा नग्न स्नान करने से जो पाप होता है, वह भी नष्ट हो जाता है । तिलधेनु का दान करनेवाला व्यक्ति यमलोक के मार्ग की भयंकर यातनाओं का अतिक्रमणकर सुवर्ण के विमान में बैठकर उत्तम लोक में चला जाता है ।
राजन् ! नैमिषारण्य में कथा-प्रसंग के समय मुनियों ने यह विधि सुनायी और नारदजी ने मुझे इस विधि का उपदेश किया, वही तिलधेनु-दान की विधि मैंने आपसे कहीं हैं । तिलधेनु का दान करना पवित्र, पुण्य और माङ्गल्यप्रद तथा कीर्तिवर्धक है । श्राद्ध के समय ब्राह्मणों को इस माहात्म्य को श्रवण कराने से अनन्त पुण्य प्राप्त होता है । गौ, घर, शय्या और कन्या एक व्यक्ति को ही देनी चाहिये, क्योंकि विभाजन से दोनों को अघोगति की प्राप्ति होती है और विक्रय करने से सात कुल दुर्गति को प्राप्त करते हैं । इस दान के प्रभाव से दान करनेवाला उत्तम विमान में बैठकर साक्षात् विष्णुभगवान् के समीप पहुँच जाता है । माघ अथवा कार्तिक की पूर्णिमा, चन्द्र-सूर्य-ग्रहण, अयन-संक्रान्ति मकर और कर्क की संक्रांति, विषुव-योग उत्‍तरायण और दक्षिणायन के मध्‍य भाग में जबकि रात और दिन बराबर होते हैं, वह समय ‘विषुवयोग’ नाम से पुकारा जाता है। उस दिन संध्‍या के समय मैं, ब्रह्मा और महादेव जी क्रिया, कारण और कार्यों की एकता पर विचार करने के लिये एक बार एकत्रित होते हैं।, व्यतीपात-योग ज्योतिषशास्त्र के सत्ताइस योगों में से सत्रहवाँ योग, वैशाख अथवा मार्गशीर्ष की, पूर्णिमा और गजच्छाया-योग जब सूर्य हस्त नक्षत्र पर हो और त्रयोदशी के दिन मघा नक्षत्र होता है तब ‘गजच्छाया योग’ बनता है। यह श्राद्धकर्म के लिए अत्यन्त शुभ होता है। इसमें किए गए श्राद्ध का अक्षय फ़ल होता है।में तिलधेनु का दान प्रशस्त माना गया है ।
(अध्याय १५२)

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