भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १७८
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय १७८
सुवर्णनिर्मित कल्पवृक्ष दान का वर्णन

श्रीकृष्ण बोले — पूर्वकाल में भगवान् शङ्कर ने उमा देवी के साथ पाणिग्रहण करके अनेक वर्षों तक रमण किया । अनन्तर समस्त देवगण उन दोनों से उत्पन्न होने वाली सन्तान के भय से त्रस्त होकर उनके शरण में गये । वैश्वानर (अग्नि) आदि समस्त देवताओं ने त्रिनेत्र महादेव के पास पहुँचकर उन्हें प्रसन्न किया ।

ईश्वर बोले — देवगण ! क्या आप लोग भयभीत हो रहे हैं ? कौन वर तुम्हें प्रदान करूं, क्योंकि मेरे प्रसन्न होने पर कुछ भी दुर्लभ नहीं होता है ।
om, ॐ
देवों ने कहा — देवेश, भगवन्, शंकर, ! पार्वती के साथ किया हुआ तुम्हारा भोग निष्फल हो जाये हम लोग तुम्हारे पुत्र से भयभीत हो रहे हैं । देवेश, भूतपते ! आप सदैव सन्तानहीन रहें क्योंकि आप के तेज को धारण करने में हम सभी असमर्थ हैं ।

श्रीभगवान् बोले — देवगण ! आज से मैं अब उर्ध्वरेता रहकर स्थाणु की भाँति स्थित रहूँगा, जिसे ‘स्थाणु’ भी मेरा नाम हो । तदुपरान्त उमा ने क्रुद्ध होकर देवताओं से कहा — देवगण ! तुम लोगों ने मेरा पुत्र-जन्य सौख्य निष्फल कर दिया है, इसलिए तुम लोग भी पुत्र उत्पन्न न कर सकोगे ! भूपते ! उसी समय से देवों के कोई प्रसव न हो सका ।
इस भाँति देवों को शाप देने के अनन्तर देवी ने शंकर जी से कहा — जगतपते ! महाभाग ! मुझे पुर्नजन्म का सुख प्रदान हो सका, और श्रुति भी कहती कि पुत्रहीन की गति नहीं होती है, अतः दोनों लोकों का हित करने वाली कोई आज्ञा प्रदान करने की कृपा करें ।

भगवान् बोले — पर्वतात्मजे ! पुत्र हीन स्त्री या पुरुष को सुवर्ण को सुरचित कल्पवृक्ष दान करना चाहिए । देवि ! इस प्रकार कृत्रिम, या स्थवरादि वृक्ष अथवा उत्पन्न पुत्र में प्रभुत्व की कल्पना करने से लोक पुत्रवान् कहा जाता है । इसमें संशय नहीं शुद्ध-स्वर्ण द्वारा एक कल्पवृक्ष का निर्माण करें । जो बहुत शाखाओं से आच्छन्न, सुवर्णाङ्ग होते हुए अनेक पुष्पों से भूषित, महान् स्कंध और उसकी समस्त शरीर रत्न से अलंकृत हो । उसके दिव्य फल भी सुवर्ण निर्मित ही होने चाहिए । नृपसत्तम ! बीस पल से अधिक सुवर्ण या चाँदी का यह उत्तम दान करना चाहिए । जो प्रवाल के अंकुरों से आच्छन्न और मोती की मालायें आबद्ध होकर लटकी हों । उसके चारों कोण पर चार सुवर्ण वृक्ष होने चाहिए । वरानने ! मैं सुवर्ण प्रभाव तुम्हें बता रहा हूँ, सुनो ! सहस्र या तदर्द्ध अथवा उसके भी आधे भाग से उसका निर्माण करके नदी, गृह या देवालय के प्रदेश में पूर्वोत्तर (ईशान) की ओर निम्न एक मण्डप की रचना करे, जो दस हाथ का विस्तृत हो और उसकी वेदी भी दसहाथ की विस्तृत हो । उसके अग्नि कोण में एक हांथ का विस्तृत कुण्ड बनाकर उसे मेखलाओं से भूषित करे । उसके चारों ओर ऋग्वेद, यजुर्वेद एवं सामवेद के मर्मज्ञ विद्वानों को सादर नियत करे, जो उपदेष्टा समेत तीन या पाँच की संख्या में हों । उन्हें समस्ताभरणभूषित, दो ताम्रपात्रों से युक्त, चन्दन से आहुति से अनुलिप्त और वस्त्र-माला आदि से अलंकृत करने के उपरान्त एक सेर गुड़ के ऊपर वह कल्पवृक्ष स्थापित करे जो ब्रह्मा, विष्णु, शिव से युक्त, पाँच शाखाओं से अन्वित एवं भास्कर समेत हो । उसके नीचे रति समेत कामदेव की लवण के ऊपर रचना करनी चाहिये । संतान समेत गायत्री, दाहिने पार्श्व में घृत पर श्री समेत मन्दार, पश्चिम में उमा समेत पारिजात वृक्ष, तिल के ऊपर सुरभी समेत हरिचन्दन की स्थापना करते हुए चारों ओर रेशमी वस्त्र भूषित और ईख, माला, फल आदि समेत आठ पूर्ण कलश स्थापित करे । अग्नि स्थापन पूजन और वृक्षों के अधिवासन करके चारों ओर समस्त धान्यों की कल्पना करे । जहाँ अनेक भाँति के भक्ष्यपदार्थ एवं नैवेद्य सुसज्जित हों । वहाँ दीपमालाएँ प्रज्वलित कर, जो चित्र-विचित्र शोभित होती हो । वरानने ! इस प्रकार उनका आयोजन करके मेरे कहे हुए मंत्र द्वारा उनकी अर्चना करें —

कामदस्त्वं हि देवानां कामवृक्षस्ततः स्मृतः ।
मया सम्पूजितो भक्त्या पूरयस्व मनोरथान् ॥
(उत्तरपर्व १७८ । ३१)
‘देवों की समस्त कामनाओं को सफल करने के नाते तुम्हें कामवृक्ष कहा जाता है इसलिए मैंने भी भक्तिपूर्वक आपकी अर्चना की है मेरे मनोरथों को सफल करने की कृपा करें ।’

इस प्रकार पूजा के उपरान्त रात्रि में जागरण करें । सारी रात शंख तुरुही आदि की ध्वनि, जयघोष, एवं वेदध्वनि होती रहती रहे । अनन्तर मेरे स्मरणपूर्वक ब्राह्मणों को हवन कार्य सुसम्पन्न करना चाहिए । सर्वप्रथम आज्यभाग आधार की आहुति प्रदान करते हुए स्थापित देवों के निमित्त उनके लिंग द्वारा आहुति अन्य महाव्याहृतियों के उच्चारण पूर्वक यज्ञ की दशसहस्र संख्या की आहुति की पूर्ति करे । वरवर्णिने ! इस प्रकार यज्ञ सिद्धि होने के अनन्तर प्रातःकाल स्नान, शुक्लाम्बर धारण कर पवित्रता पूर्ण उस पर्व के समय उसकी तीन प्रदक्षिणा करते हुए दक्षिणा समेत वह कल्पवृक्ष वाहनगण को अर्पित करे —

“नमस्ते कल्पवृक्षाय विततार्थप्रदाय च ।
विश्वम्भराय देवाय नमस्ते विश्वमूर्तये ॥
यस्मात् त्वमेव विश्वात्मा ब्रह्मस्थाणुदिदाकराः ।
मूर्तामूर्तपरं बीजमतः पाहि सनातन ॥
(उत्तरपर्व १७८ । ३८)

‘विस्तृत अर्थ प्रदान करने वाले कल्प वृक्ष को नमस्कार है, विश्वमूर्ति स्वरूप उस विधान विश्वम्भर देव को नमस्कार है। आप विश्वात्मा, ब्रह्मा, स्थाणु (शिव) एवं सूर्य हो, तथा मूर्त अर्भूत के परम बीज और सनातन हो, अतः मेरी रक्षा करो ।’

देवि ! इस विधान द्वारा इसके दान करने पर जिस पुण्य फल की प्राप्ति होती है उसे मैं बता रहा हूँ, सुनो ! सूर्य के समान तेजस्वी विमान पर बैठकर, जो अप्सरागणों से आच्छन्न और किंकणीजालों से भूषित रहता है, इन्द्र के उस सर्वबाधा रहित लोक में जाता है । पुनः कभी इस कर्म क्षेत्र (भूतल) में आने पर श्रोत्रिय (वेदाध्यायी) कुल में जन्म ग्रहण करता है, जो याज्ञिक, शूर, विद्वान्, और परम धार्मिक होता है और पुनः अन्त में उसे विष्णु लोक की प्राप्ति होती है ।
(अध्याय १७८)

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