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भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १९१
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय १९१
भुवनप्रतिष्ठा का वर्णन

युधिष्ठिर ने कहा — मधुसूदन ! किस दान द्वारा शाश्वती (नियमित) प्रतिष्ठा, लोक-परलोक में अद्भुतकीर्ति, पितृ-पितामह आदि की सद्गति, लोक में अक्षय सन्तान, अत्यन्त धन की प्राप्ति होती है । महाभाग, यदुनन्दन ! वह देवों के स्थापन अथवा किसी दान या नियम द्वारा सफल होता है मुझे बताने की कृपा करें ।
om, ॐ
श्री कृष्ण बोले — राजन् ! तुमने लोकोपकारार्थ यह अत्यन्त उत्तम प्रश्न किया है, इस परमोत्तम रहस्य को मैं बता रहा हूँ सावधान होकर सुनो ! मैं तुम्हें भुवनों की प्रतिष्ठा भी विवेचन पूर्ण बताऊँगा, जिससे देव, असुर, नाग, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, प्रेत, पिशाच, भूत का स्थापन ही होगा, इसमें संदेह नहीं । कर्ता अपने अनुकूल शुभ एवं विजय मुहूर्त में जो पुण्यतिथि एवं सौम्य ग्रहों से युक्त हो, किसी मरुस्थान में सात हाथ का विस्तृत तथा चौकोर वस्त्र रखे, जो सुसंहत (घना), अभिनाङ्ग, दृढ़, शुद्ध और शुद्ध स्फटिक की भाँति स्वच्छ हो । उस चित्र को सुसम्पन्न करने के लिए चार प्रकार के रङ्ग एकत्र कर किसी युवा चित्रकार की, जो शुभ मूर्ति एवं भव्य हो, दिव्य वस्त्राभूषणों द्वारा सुपूजा करे । पुनः उसी कर्म में वेदपाठी ब्राह्मणों की नियुक्ति करके शंख, नगाड़े, का गम्भीर विवाद, गीत-मङ्गलों की ध्वनि और पुण्याहवाचन एवं जयघोष के कोलाहल में ब्राह्मणों की अर्चा करे । राजन् ! प्रथम वस्त्राभूषणों द्वारा आचार्य की पूजा करके उस वस्त्र में यथोचित का उल्लेख कराये । राजन् ! उसके मध्यभाग में विस्तृत जम्बूद्वीप की रचना कर उसके मध्य में मेरुपर्वत और उसके ऊपर देवों के निवास स्थान, दिशाओं में आठों लोकपाल, सातों द्वीप समेत पृथ्वी, सातों पर्वत, सातों सागरों तथा उसी स्थान नदियों, सरोवरों, अन्य जलाशयों की रचना पूर्वक, पाताल आदि सातों लोक, सातों स्वर्ग के विभूति समस्त लोक, क्रमशः ब्रह्म, विष्णु, एवं शिव का आवासस्थान, ध्रुव का मार्ग, ग्रहों और तारागणों समेत, सूर्य, देव, दानव, गन्धर्व, यक्ष, राक्षस, नाग, ऋषि, मुनि, गौएँ देवमाताएँ, सुवर्ण (गरुड़) आदि पक्षीगण, ऐरावत, आदि गजराजगण, तथा आठों पदमन्त्र दिग्गजों की सुस्पष्ट रचना करे । राजन् ! इस भाँति के उस सुशोभन पट को उत्तर की ओर दश जलाशयों से आच्छन्न (घेर) कर उसे महान् एवं उग्र तेज से आवृत कर तेज को वायुसे, वायु को आकाश से, भूतों (तन्मात्राओं) से आकाश, महान् से पञ्चमहाभूत, और अव्यक्त द्वारा वह महान्, आवृत है, जो शुद्धि लक्षण सम्पन्न होकर चारों ओर व्याप्त है । वह अव्यक्त तम से आवृत है और वह तम रजसे सत्त्व से व्याप्त है, यही तीन रूप से प्रकृति कहा जाता है । नृप ! इस प्रकार आवरणों से युक्त यह निखिल ब्रह्माण्ड बाहर-भीतर सभी स्थान पुरुष से उपवृत है ।

उस वस्त्र में इस प्रकार के चित्र का निर्माण कराकर कार्तिक पूर्णिमा, अयन-संक्रान्ति, विषुवयोग, ग्रहण के समय जिस विधान द्वारा अर्चा सुसम्पन्न करे । उसके समक्ष विचित्र मण्डप का निर्माण करके उसमें चौकोर चार कुण्डों को बना कर उस प्रत्येक कुण्ड पर दो-दो वेदपारगामी ब्राह्मणों को नियुक्त करे, जो यज्ञ के समस्त साधनों से सम्पन्न वस्त्राभूषणों से भूषित हों वे सभी संयमी व्राह्मण मौन होकर हवन कार्य सुसम्पन्न करें । पद में प्रतिदिन देवों के निमित्त ओंकार पूर्वक आहुति प्रदान करने के अनन्तर सम्मान तथा समस्त अलंकारों से अलंकृत होकर यजमान आचार्य के साथ पुष्प-वस्त्रादि द्वारा उस पट की सर्व प्रथम पूजा करते हुए इस मंत्र का उच्चारण करें —

ब्रह्माण्डोदरवर्तीनि भुवनानि चतुर्दश ।
तानि सन्निहितान्यत्र पूजितानि भवन्तु मे ॥
ब्रह्मा विष्णुस्तथा रुद्रो ह्यादित्या वसवस्तथा ।
पूजिताः प्रतिष्ठाश्च भवन्तु सततं मम ॥
(उत्तरपर्व १९१ । ३०-३१)
‘ब्रह्माण्ड के मध्य में प्रतिष्ठित चौदहों भुवन यहाँ स्थित रह मेरे इस पूजन द्वारा पूजित हों । उसी भाँति ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, आदित्यगण, वस्त्र गण, आदि सभी देव मेरे इस पूजन द्वारा विस्तार पूजित और प्रतिष्ठा हों ।’

इस प्रकार प्रदक्षिणासमेत उस पट की अर्चा करके अपने भाँति के भक्ष्य अन्न, नैवेद्य अर्पित करे । अनन्तर शंख, तुरुही, आदि के गीत, मंगल और ब्रह्म घोष द्वारा उसका जागरण कराकर विमल प्रातःकाल में स्थान, पवित्रतापूर्ण और अलंकारों से अलंकृत होकर पूर्वोक्त विधान द्वारा उस पट की पूजा करे । पश्चात् उस यजमान् विद्वान् को सौ गौएँ द्वारा ऋत्विजों की अर्चा या प्रत्येक को सर्वाभरण भूषित दो-दो गौएँ अर्पित करे । उसी प्रकार उपानह, छत्र, गृह के समस्त साधन और अपनी अभीष्ट सभी वस्तुएँ अर्पित करनी चाहिए । अनन्तर गजराज जुते हुए या घोड़े से सुसज्जित रथ पर जो पताका-ध्वजाओं से भूषित हो, सहस्र की दक्षिणा पूर्वक वह पट आरोपित करे अथवा उस रथ द्वारा व्राह्मण के देवालय लाकर स्थापन करते हुए गन्ध, पुष्पादि द्वारा उसकी पूजा करे । नैवेद्य अर्पित करते हुए वहाँ भी महोत्सव करना चाहिए । नृप ! जिस देवालय में उसकी प्रतिष्ठा न कर सके, वहाँ भी उस ऐश्वर्य इच्छुक यजमान को पूजा-सम्भार महान् ही करना चाहिए । राजेन्द्र ! चाँदी का छत्र, घंटा और ध्वजा आदि यथाशक्ति गुरु को अर्पित करते हुए दक्षिणा द्वारा ब्राह्मणों को सुसम्मानित कर विसर्जन करके और उस दिन दीन, अंधे, कृपण व्यक्तियों को अनिवार्य भोजन देते हुए मित्र एवं स्वजन आदि बन्धुओं को भी भोजन कराये ।

इस भाँति इस विधान द्वारा श्रद्धा और संयमपूर्वक उस सार्वलौकिकी प्रतिष्ठा को सुसम्पन्न करने वाला पुरुष-स्त्री कोई हो, उसने सचराचर तीनों लोक की स्थापना की इसमें संशय नहीं । युधिष्ठिर ! उस सत्पुत्र ने अपने कुल का भी उद्धार किया है ऐसा जानना चाहिए । उस देवालय में वह पट जितने दिन वर्तमान रहता है, उतने समय तक उसकी अक्षय कीर्ति तीनों लोकों में विचरण करती है । दान द्वारा इस मर्त्यलोक में जितने दिन उसकी कीर्ति फूलती-फलती है, उतने सहस्र वर्ष वह स्वर्ग लोक में सुसम्मानित होता है और गन्धर्व गण उसके गुणगान करते हैं तथा अप्सरायें सुसेवा करती हैं । चौदह इन्द्रों के समय तक सहर्ष स्वर्ग में सुखानुभव करने के उपरांत पुण्यक्षीण होने के नाते पुनः यहाँ धार्मिक राजा होता है, जो पुत्र-पौत्र समेत दीर्घायु, श्रीमान् और अति धार्मिक होता है । राजेन्द्र! दस जन्म तक वह इसी भाँति सपरिवार सुखी जीवन व्यतीत करता है ।

सुना जाता है कि प्राचीन काल में रजि नामक एक महाबलवान् राजा राज करता था, जो चक्रवर्ती, तीक्ष्ण बुद्धि, शत्रुजेता, एवं संयमी था । उसने प्राचीन काल में पृथ्वी दान किया था और देवराज के संग्राम में दैत्य सेनाओं को पराजित कर देवेन्द्र को निष्कण्टक स्वर्ग भी अर्पित किया था । महाभाग ! एक बार सभा मध्य सिंहासन पर बैठे हुए राजा से सम्मुख ब्रह्मपुत्र पुलस्त्य महर्षि का आगमन हुआ, जो वेद-वेदाङ्ग के पारगामी शिष्यों से, सदैव सुशोभित रहते थे । राजा द्वारा दिपे गये उस अर्घ्यादि को ग्रहण कर उस उत्तम आसन पर दूसरे पितामह की भाँति भी सम्पन्न मुनि के सुशोभित होने पर स्वयं राजा ने मधुपर्क से उनकी पूजा की और अन्त में विनीत-विनम्र होकर अपने वैभव के विषय में उनसे पूछा — भगवन् ! किस दान, नियम, अथवा तप द्वारा मुझे इस प्रकार की श्री, अव्याहत तेज, बल, पुष्टि, धन, धान्य, तथा उत्तम पुत्र-पौत्र की प्राप्ति हुई है । धर्मज्ञ, द्विजोत्तम ! आप सर्वज्ञ हैं अतः इसे मुझे बताने की कृपा करें ।

पुलस्त्य बोले — राजन्! मैं तुम्हें इस आत्मीय एवं सुमनोहर कथा का वर्णन सुना रहा हूँ, जो तुम्हारे इस सातवें जन्म में कथा के रूप में प्रकट और ऐश्वर्य बढ़ाने वाली है, सुनो ! नरोत्तम ! आज से पिछले सातवें जन्म में तुम काशी में उत्पन्न वैश्य कुल में महान् सेठ थे, अनेक सेवक परिवार से युक्त रहने पर भी तुम धार्मिक, सत्यप्रेमी रहते हुए अपने वैश्य (व्यापार) धर्म में सदैव लगे रहते थे । वहाँ तुमने अनेक धर्मस्थानों द्वारा धर्मों के अनेक रूप का श्रवण किया, जिसमें अनेक भाँति के दान बहुभाँति के विविध व्रत बताये गये थे । उसी प्रसङ्ग में तुमने भुवनों की प्रतिष्ठा (पट-दान) भी सुनकर उसे सविधि सुसम्पन्न किया था, जो बहुत पुण्य प्रदान करती है । राजेन्द्र ! उसी के फलस्वरूप तुम सात जन्म तक राजा हुए, तुम्हारी कीर्ति लोकों में प्रख्यात हुई और तुम्हें महान् फल की प्राप्ति हुई है । इसीलिए अन्य सात जन्मों में भी राजा होकर राजसुखों का अनुभव कर अन्त मे योगीकुल में उत्पन्न होने पर निर्वाण पद की प्राप्ति करोगे । इस विषय का प्रश्न तुमने जो मुझसे पहले किया था, उसकी सविस्तार व्याख्या मैंने तुम्हें सुना दी है । इस भाँति भुवनप्रतिष्ठा (पट-दान) को सविधि सुसम्पन्न करने वाले पुरुष या स्त्री कृतकृत्य हो जाते हैं । राजा से ऐसा कहकर वेदानुगामी मुनि पुलस्त्य जो सूर्य, एवं अग्नि की भाँति तेजोमय दिखायी देते थे, उसी स्थान अन्तर्निहित हो गये । इस भाँति मैंने तुम्हें जो यह-दान प्रतिष्ठा (पट-दान) सुनाया है, सुसम्पन्न होने पर धर्म की वृद्धि करती है, सैकड़ों भाँति की कीर्ति फैलाती है, कामनाएँ सफल करती हैं और पापों को नष्ट करती हैं और अन्य कोई ऐसा सुख नहीं है जिसे यह प्रदान नहीं कर सकती है ।
(अध्याय १९१)

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