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भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय २०१
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय २०१
घृताचल दान विधि-वर्णन

श्रीकृष्ण बोले — मैं तुम्हें घृताचल का विधान बता रहा हूँ, जो तेज तथा अमृतमय, दिव्य एवं महापातकों का नाश करता है । इसके निर्माण में पाँच सौ घृत पूर्ण कलश का उत्तम पर्वत, उसके आधे भाग का मध्यम और उसके भी आधे भाग का अधम कहा गया है । अल्प-वित्त वाले पुरुष को यथा शक्ति यह दान सविधान सुसम्पन्न करना चाहिए । om, ॐउसके चौथाई भाग द्वारा विष्कम्भ पर्वतों की रचना करके साठी चावल राशि के ऊपर उन कलशों की ऊपर-नीचे रखते हुए उत्तम रचना करनी चाहिए। वस्त्र, ऊखदण्ड, और फलादि द्वारा उसे आवेष्टित कर धान्य पर्वत की भाँति समस्त विधानों को सम्पन्न करते हुए अधिवासन और हवन, देव पूजन आदि सम्पन्न करे । कौंतेय ! निर्मल प्रातःकाल वह पर्वत गुरु को और निष्कम्भ पर्वत ऋत्विजों को अर्पित करे । उस समय शान्ति चित्त से जिस मंत्र का उच्चारण किया जाता है, उसे मैं बता रहा हूँ, सुनो —

संयोगाद्घृतमुत्पन्नं यस्मादमृततेजसे ।
तस्माद्घृताचलश्चास्मात् प्रीयतां मम शङ्करः ॥
यस्मात् तेजोमयं ब्रह्मा घृते नित्यं व्यवस्थितम् ।
घृतपर्वतरूपेण तत्मान्नः पाहि भूधर ॥
(उत्तरपर्व २०१ । ८-९)
अमृत और तेज रूप यह घृत संयोग से ही उत्पन्न हुआ है अतः इस घृताचल के दान द्वारा शंकर प्रसन्न हों । भूधर ! घृत में तेजोमय ब्रह्म नित्य सुव्यवस्थित रहता है, अतः इस घृत पर्वत रूप से मेरी रक्षा करें ।

इस विधान द्वारा घृताचल का परमोत्तम दान करने वाला महापातकी भी प्राणी शङ्कर लोक की प्राप्ति करता है । उस विमान पर सुशोभित होकर, जो हंस-सारस पक्षियों से युक्त किंकिड़ी समूहों से आबद्ध और अप्सराओं तथा सिद्धविद्याधरों से आच्छन्न रहता है, पितरों के साथ महाप्रलय पर्यन्त बिहार करता है । इस प्रकार उज्ज्वल कुण्डलों से विभूषित सुन्दरियों से सुसेवित उस घृताचल का दान करने वाले मनुष्य सुरेन्द्र भवन स्वर्ग पर शिव संविधान प्राप्त कर उसके स्नेह में सदैव के लिए बँध जाते हैं ।
(अध्याय २०१)

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