भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय ३१
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय ३१
अङ्गारक चतुर्थी व्रत का वर्णन

युधिष्ठिर ने कहा — यादव ! यदि आप मेरे ऊपर अधिक प्रसन्न हैं, तो व्रत बताने की कृपा कीजिये, जिस के अनुष्ठान द्वारा रूप सौभाग्य सुख की प्राप्ति पूर्वक जो स्त्री पुरुषों को परम प्रिय, पापनाशक एवं अत्यन्त फलदायक हो और उपवास रहकर उसे सुसम्पन्न करने पर ऋद्धि, वृद्धि, स्वर्ग, यश एवं समस्त कामनाओं की सफलता अत्यन्त सुलभ हो ।om, ॐ

श्रीकृष्ण बोले — पार्थ ! पहले तुम्हारे वनवास के समय भी जिस गुह्य व्रत को नहीं बताया था, आज उसे मैं तुम्हें बता रहा हूँ । पार्वती-शिव के काम-केलि के समय जो रक्त बिन्दु पृथ्वी पर पड़े, उसे इस भूमि ने अत्यन्त प्रयत्न के साथ धारण किया था, जिससे एक रक्तवर्ण के कुमार की उत्पत्ति हुई । अंगारक नामक वेग का है, शिवजी के अंग से शीघ्रता से उत्पन्न होने और अंग में रहकर उसकी कांति समेत अंग प्रत्यंग से जन्मग्रहण एवं सौभाग्य आरोग्य प्रदान करने के कारण भी उन्हें अंगारक कहा जाता है । श्रद्धा भक्ति समेत चतुर्थी के दिन नक्त व्रत समेत उनकी अर्चना करने वाले स्त्री पुरुष को वे प्रसन्न होकर उपरोक्त सभी फलप्रदान करते हैं और वह रूप-सौभाग्य सम्पन्न एवं नर नारी को अत्यन्त प्रिय होता है ।

युधिष्ठिर ने कहा — देवेश ! इस अंगारक के शुभ विधान को, होम और अधिवास समेत बताने की कृपा कीजिये ।

श्रीकृष्ण जी बोले —
सर्वप्रथम संकल्प करने के उपरान्त स्नान के निमित्त जल में खड़े होकर मंत्रोच्चारण पूर्वक मृत्तिका ग्रहण करे —

“त्वं मृदे वन्दिता पूर्वं कृष्णेनोद्धरताकिल ।
तेन ने दह् पापौघं यन्मया पूर्वसञ्चितम् ॥”
(उत्तरपर्व ३१ । ११)

‘हे मृत्तिके ! उद्धार करने के समय कृष्ण ने सर्वप्रथम तुम्हारी वन्दना की है, इसलिए मेरे भी पापों को नष्ट करो, मैंने भी पूर्व पापों का संचय किया है ।’

इस मंत्र को कहते हुए वह मृतिका सूर्य को दिखाकर पुनः अपने सिर एवं अंग-प्रत्यंग में लेपन कर सूर्य की रश्मि से स्पृष्ट गंगाजल में स्नान करते हुए यह मंत्र कहे —

“त्वमापो योनिः सर्वेषां दैत्यदानवरक्षसाम् ।
स्वेदजोद्भिज्जयोनीनां रसानां पतये नमः ॥
(उत्तरपर्व ३१ । १४)

‘दैत्य, दानव राक्षस आदि सभी को उत्पन्न करने वाले, तथा स्वेदज, उद्भिज एवं समस्त रसों के पति तुम्हें नमस्कार है, मैं आप में स्नान कर रहा हूँ । इसलिए यह मेरा स्नान समस्त तीर्थों, झरनों, नदियों एवं देव कुण्डों के स्नान का फल प्राप्त करे ।’

इस प्रकार कहते हुए स्नान करके घर आने पर किसी का स्पर्श एवं बातचीत बिना किये (मौन रहकर) पहले यह देख ले कि यहाँ कोई पापी तो नहीं है । पश्चात् दूर्वा, अश्वत्थ (पीपल), शमी और मेरे मंत्र के उच्चारण पूर्वक स्पर्श करे। प्रथम दूर्वा के स्पर्श में —

“त्वं दूर्वेऽमृतजन्मासि सर्वदेवेश्च वन्दिता ।
वन्दिता दह तत्सर्वं यन्मया दुष्कृतं कृतम् ॥
(उत्तरपर्व ३१ । १८)

‘दूर्वे ! अमृत द्वारा तुम्हारा जन्म हुआ है और समस्त देवों से तुम अर्चित हो । अतः मैं भी तुम्हारी वन्दना कर रहा हूँ, मेरे सभी दुष्कृतों का दहन करो ।’

अनन्तर शमी वृक्ष के समीप जाकर इस प्रकार कहते हुए उसका स्पर्श करे —

“पवित्राणां पवित्रं त्वं काश्यपी पठ्यसे श्रुतौ ।
शमी शमय तत्पापं यन्मयां दुरनुष्ठितम् ॥
(उत्तरपर्व ३१ । १९)

‘तुम अत्यन्त पवित्र, और वेद में काश्यप भी कहे जाते हो, अतः शमी वृक्ष ! मेरे सभी पापों को विनष्ट करो ।’

अश्वत्थ के समीप जाकर करबद्ध होकर प्रार्थना करें —

“अक्षिस्पंदं भुजस्पंद दुःस्वप्नं दुर्विचिन्तितम् ॥
शत्रूणां च समुत्थानमश्वत्थ शमयस्व मे
(उत्तरपर्व ३१ । २०)

‘अश्वत्थ ! अशुभ नेत्र एवं भुजा के स्फुरण, दुःस्वप्न, तथा शत्रुओं के समुत्थान का शमन करो ।’

उसी प्रकार दान के निमित्त गौ के समीप जाकर क्षमा प्रार्थी हो कि —

“सर्वं देवमये देवि दैवतैस्त्वं सुपूजिता ।
तस्मात्स्पृशामि मन्दामि वन्दिता पापहा भव ॥”
(उत्तरपर्व ३१ । २३)

‘सर्वदेवमये, देवि ! समस्त देवों ने तुम्हारी अर्चना की है, इसलिए मैं भी तुम्हारा स्पर्श एवं वन्दना करता हूँ, मेरे पापों का अपहरण करो ।’

पार्थ ! इस प्रकार अत्यन्त भक्ति में तन्मय होकर जो उतम गौ की प्रदक्षिणा करते हैं, वे समस्त पृथ्वी की प्रदक्षिणा करते हैं, इसमें संदेह नहीं । पुनः मौन ही रहकर वन्दनीयाँ की वन्दना पूर्वक मृत्तिका से हाथ चरण शुद्ध कर अग्नि शाला में जहाँ आहिताग्नि स्थापित हो, जाकर मंत्रोच्चारण पूर्वक हवन आरम्भ करे —

“शर्वाय शर्वपुत्राय पार्वत्या गोः सुताय च ।
कुजाय लोहिताङ्गाय ग्रहेशाङ्गारकाय च ॥
भूयो भूयोयाहुत्या हुत्वाहुत्वा जुहोति वै ॥”
(उत्तरपर्व ३१ । २६)

‘मैं उन मंगल के निमित्त आहुति प्रदान करता हूँ, जो शर्व रूप, शर्व पुत्र, तथा पार्वती और गौ के पुत्र कहे गये हैं, तथा लोहित अंग, गृहेश एवं अंगारक कहे जाते हैं। एवं जिसके लिए बार-बार आहुति प्रदान की जाती है ।’

इस प्रकार ओंकार पूर्वक उनके नाम के अन्त में स्वाहा पद लगाकर (कुजाय नमः स्वाहा) एक सौ आठ, आधा अथवा तदर्द्ध आहुति अपनी शक्ति के अनुसार खैर आदि की लकड़ी की प्रज्वलित अग्नि में घृत, दुग्ध, तिल, जवा और अनके भाँति के भक्ष्य पदार्थों समेत डालकर अनन्तर देव को पृथ्वी में स्थापित कर गुड़ समेत ताँबे के पात्र अथवा सुवर्ण या काष्ठ के रक्तवर्णपात्र में जो कृष्ण अगरू तथा श्रीखण्ड से विभूषित हो, अथवा कुंकुम केसर युक्त सुवर्ण चाँदी के पात्र में रखकर रक्तवर्ण के पुष्प वस्त्र उत्तम फल एवं रत्नों द्वारा उनकी अर्चना करें।

राजन् ! अत्यन्त भक्ति श्रद्धा समेत यथाशक्ति दान करने से सैकड़ों एवं सहस्रों गुना पुण्य की वृद्धि होती है । बाँस अथवा मृत्तिका के रक्तपात्र में रक्तपुष्प, कुंकुम, केशर द्वारा मनुष्यों को ‘ॐ अंगारकाय नमः’ से शिर, ‘ॐ कुजाय नमः’ से मुख, ‘ॐ भौमाय नमः’ से कंधे, ‘ॐ मंगलाय नमः’ से बाहुओं ‘ॐ रक्ताय नमः’ से उर, ‘ॐ लोहिताङ्गाय नमः’ से कटि, ‘ॐ आराय नमः’ से जंघे, ‘ॐ महीधराय नमः’ से चरण की पूजा करनी चाहिए । पुरुषाकार आकृत्ति बनाकर पात्र में स्थापन पूर्वक इस आठ पुष्पिका रूप कुज के मंत्र द्वारा उनकी सविधान अर्चना करना बताया गया है । पूजन के समय घृत, कृष्ण अगरु समेत गुग्गुल की अथवा किसी उत्तम वस्तु की धूप अर्पित करना चाहिए । पश्चात् उस समाधिनिष्ठ पुरुष को पूर्वोक्त मंगल मंत्र के उच्चारण द्वारा हवन करके प्रणाम पूर्वक उस देव को ब्राह्मण के लिए अर्पित करे । यथाशक्ति दक्षिणा समेत अग्नि पक्व के अतिरिक्त अन्य भोजन अर्पित करना चाहिए । वित्तशाठ्य तो कभी करना ही न चाहिए, क्योंकि उसके करने से मुख्य फल की प्राप्ति कभी नहीं हो सकती है । तदुपरान्त मौन होकर भूमि पर भोजन पात्र रखकर इस मंत्र के उच्चारण पूर्वक भोजन करें —

“सर्वौषधिरसावासे सर्वदा सर्वदायिनी ।
त्वत्तले भोक्तुकामोऽहं तद्भुक्तममृतं भवेत् ॥”
(उत्तरपर्व ३१ । ३९)

‘समस्त औषधों के रस से सुवासित सर्वदा सब कुछ देने वाली पृथ्वी देवी ! मैं तुम्हारे तल के ऊपर भोजन करने की इच्छा प्रकट कर रहा हूँ, अतः वह मेरे भुक्त पदार्थ अमृत के समान होये ।’

युधिष्ठिर ने कहा — यादव ! अंगारक संयुक्त चतुर्थी का नक्त भोजन द्वारा एक ही तिथि में उपवास करना चाहिए अथवा अनेक चतुर्थी तिथि में इसे विस्तार पूर्वक बताने की कृपा कीजिये ।

श्रीकृष्ण जी बोले — पाण्डव ! अंगारक युक्त प्रत्येक चतुर्थी तिथि में उपवास रह कर सविधान मंगल के लिए अर्चना की वस्तुएँ अर्पित करनी चाहिए। निर्धन लोगों को धन प्राप्ति के निमित्त अंगारक युक्त प्रत्येक चतुर्थी का विधान विस्तार पूर्वक बता रहा हूँ, सुनो ! पार्थ ! अंगारक की अकृत्रिम प्रतिमा सुवर्ण के उस पात्र में जो दश तोले, तदर्ध (पाँच), तदर्ध (ढाई), बीस पल, दश पल अथवा बीस कर्ष के परिमाण का बना हो, इससे न्यून का पात्र कभी न बनाना चाहिए, स्थापित कर वस्त्र से आवेष्टित करने के उपरांत पुष्प मण्डपिका में पूर्वोक्त मंत्रों के उच्चारण पूर्वक सविधान दिव्य धूप आदि वस्तुओं से उनकी अर्चना करे । पुनः भक्तिपूर्वक भोज्यार्थ अनेक फल, समुद्र रत्न, ऊनी वस्त्र, पान, शय्या, उपानह, उत्तमासन, छत्र, पुष्प, गन्ध आदि यथाशक्ति समुपार्जित वस्तुओं का समर्पण कर किसी व्रती, पवित्रता पूर्ण, वेदाध्याय धनसम्पन्न, शास्त्र मर्मज्ञ एवं निराभिमानी ब्राह्मण को सादर बुलाकर जो अंगारक के शास्त्रीय विधान को भली भाँति जानता हो, तथा आह्वान, हवन, अर्चन और विसर्जन का मर्मज्ञ हो, वस्त्र और आभूषणों द्वारा उसकी पूजा करके मंगल की वह उत्तम प्रतिमा उन्हें अर्पित करे। उस समय इस मंत्र के उच्चारण करते हुए ब्राह्मण को सादर समर्पित करना चाहिए—

“सम्पूज्य वस्त्राभरणैस्तत्मै देयः कुजोत्तरः ।
अथा श्रुतो यथा ज्ञातस्तथा भक्त्या सुपोषितः ॥
वित्तसारे तुष्य त्वं मन भौम भवाद्भव ।
(उत्तरपर्व ३१ । ४९-५०)

‘शास्त्र में जिस प्रकार सुना और जिस भाँति मेरी बुद्धि में इसकी धारणा हुई उसके अनुसार भक्ति पूर्वक मैंने उपवास रहकर अपनी शक्ति के अनुसार आपकी अर्चना की है, अतः भव (शिव) द्वारा उत्पन्न भौमदेव ! मेरे ऊपर प्रसन्न हो ।’

दानप्रतिग्रहीता उस विद्वान् को भी उस समय यह मंत्रोच्चारण करना चाहिए कि —

मङ्गलं प्रतिगृह्णामि उभयोरस्तु मङ्गलम् ।
दातृप्रतिग्राहकयोः क्षेमारोग्यं भवत्विति ॥
(उत्तरपर्व ३१ । ५१) प्रतिग्राहकमन्
त्र
‘मंगल की यह उत्तम मूर्ति मैं अपना रहा हूँ, इसलिए दोनों (दाता प्रतिग्रहीता) के यहाँ मंगल होता रहे तथा वे दोनों कुशल एवं आरोग्य रहें ।’

इस प्रकार चतुर्थी के दिन पूजन करने पर यदि धन लाभ न हो तो यंत्र के पूजन पूर्वक पुनः अंगारक युक्त चतुर्थी में मंगल की पूजा प्रारम्भ कर आजीवन करता रहे, तो अवश्य फलभागी होगा । निर्धन व्यक्ति को भी अंगारक युक्त सभी चतुर्थी के दिन उपवास पूर्वक कुज के लिये वस्त्र, तिल, एवं कसोरा आदि के समर्पण पूर्वक सविधान उनकी अर्चना करनी चाहिए, जिससे उसे भी समस्त फल प्राप्त होते हैं । युधिष्ठिर ! इस प्रकार मंगल युक्त चतुर्थी के दिन उपवास रहकर अर्चना समेत उन्हें उपरोक्त वस्तुओं के समर्पण करने से जिस पुण्य फल की प्राप्ति होती है, मैं बता रहा हूँ, सुनो ! इस मर्त्य लोक में चिरकाल तक पुत्र-पौत्र आदि परिवार समेत अनेक सुखों के उपभोग करने के उपरांत देहावसान होने पर दिव्य तेज, द्वारा आनन्द मग्न देवों के साथ देवलोक की यात्रा करता है। वहाँ पहुँचकर इन्द्र की भाँति देवों के साथ समस्त सुखोपभोग करते हुए छत्तीस चतुर्युगी व्यतीत करता है। अनन्तर कदाचित् पृथिवी पर जन्मग्रहण करके उत्तम कुल में रूपवान्, धनवान, सत्यवक्ता, दानी, एवं दयाशील राजा होता है। इस व्रत को सुसम्पन्न करने वाली स्त्री भी रूप सौन्दर्य, सौभाग्य एवं उत्तमगति की प्राप्ति पूर्वक पुत्र-पौत्र समेत अपने पति के साथ चिरकाल तक रमण करती है और देहावसान होने पर पुनः स्वर्ग की प्राप्ति करती है। राजन् ! इस प्रकार मैंने सरहस्य इस अंगारक चतुर्थी के विधान को सुना दिया जो मनुष्यों एवं देवों के लिए अत्यन्त दुर्लभ हैं । तुम्हारा मंगल हो । कुरुकुलोद्वह ! शुक्ल पक्ष की चतुर्थी अंगारक युक्त होने पर देवार्चना और पितरों के पिण्डदान के लिए उत्तम बतायी गयी है । अतः जो कोई उस दिन मंगल की सविधान अर्चना सुसम्पन्न करते हैं, उन्हें इस भूतल में अत्यन्त कल्याण की प्राप्ति होती है ।
(अध्याय ३१)

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