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भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय ३८
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय ३८
विशोक –षष्ठी – व्रत

राजा युधिष्ठिर ने कहा — जनार्दन ! आपके श्रीमुख से पंचमी-व्रतों का विधान सुनकर बहुत प्रसन्नता हुई । अब आप षष्ठी व्रतों का विधान बतलाये । मैंने सुना हैं कि षष्ठी को भगवान सूर्य की पूजा करने से सभी व्याधियाँ शान्त हो जाती हैं और सभी कामनाएँ पूर्ण हो जाती है ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाराज ! सर्वप्रथम मैं विशोक-षष्ठी-व्रत का विधान बतलाता हूँ । इस तिथि को उपवास करने से मनुष्य को कभी शोक नहीं होता । om, ॐमाघ मास के शुक्ल पक्ष की पञ्चमी को प्रभातकाल में उठकर दन्तधावन करे, कृष्ण तिलों से स्नान आदि द्वारा पवित्र हो कृशर (खिचड़ी)- का भोजन करे, रात्रि में ब्रह्मचर्यपूर्वक रहे । दूसरे दिन षष्ठी को प्रभातकाल में उठकर स्नान आदि से पवित्र हो जाय । सुवर्ण का एक कमल बनाये, उसे सूर्यनारायण का स्वरुप मानकर रक्तचन्दन, रक्तकरवीर-पुष्प और रक्तवर्ण के दो वस्त्र, धूप, दीप, नैवेद्य आदि से उनका पूजन करे । तदनन्तर हाथ जोडकर इस मन्त्र से प्रार्थना करे —

यथा विशोकं भवनं त्वयैवादित्य सर्वदा ।
तथा विशोकता में स्यात् त्वद्भक्तिर्जन्मजन्मनि ॥
(उत्तरपर्व ३८ । ७)

‘हे आदित्यदेव ! जैसे आपने अपना स्थान शोक से रहित बनाया हैं, वैसे ही मेरा भी भवन सदा शोकरहित हो तथा जन्म-जन्म में आप में भक्ति बनी रहे ।’

इस विधि से पूजनकर षष्ठी को ब्राह्मण-भोजन कराये । गोमूत्र का प्राशन करे । फिर गुड़, अन्न, उत्तम दो वस्त्र और सुवर्ण ब्राह्मण को प्रदान करे । सप्तमी को मौन होकर तेल और लवणरहित भोजन करे और पुराण भी श्रवण करे । इसप्रकार एक वर्षपर्यन्त दोनों पक्षों की षष्ठी का व्रतकर अन्त में शुक्ल सप्तमी को सुवर्ण-कमलयुक्त कलश, श्रेष्ठ सामग्रियों से युक्त उत्तम शय्या और पयस्विनी कपिला गौ ब्राह्मण को दान करे । इस विधि से कृपणता छोडकर जो इस व्रत को करता हैं, वह करोड़ों वर्षों से भी अधिक समयतक शोक, रोग, दुर्गति आदि से मुक्त रहता है । यदि किसी कामना से यह व्रत किया जाय तो उसकी वह कामना अवश्य पूर्ण होती है और यदि निष्काम होकर व्रत करे तो उसे मोक्ष की प्राप्ति होती है । जो इस शोक-विनाशिनी विशोक-षष्ठी का एक बार भी उपवास करते हैं, वह कभी दु:खी नहीं होता और इन्द्रलोक में निवास करता है ।
(अध्याय ३८)

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