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भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय ३९
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय ३९
कमलषष्ठी (फलषष्ठी-) व्रत
 (मत्स्यपुराण के अध्याय ७६ में फलसप्तमी नाम से इसी व्रत का वर्णन हुआ है।)

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — राजन् ! अब मैं कमलषष्ठी नामक व्रत को बतलाता हूँ, जिसमें उपवास करने से व्यक्ति पाप-मुक्त होकर स्वर्ग को प्राप्त करता है । मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की पञ्चमी को नियतव्रत होकर षष्ठी को उपवास करे । कृष्ण सप्तमी को सुवर्णकमल, सुवर्णफल तथा शर्करा के साथ कलश ब्राह्मण को प्रदान करे । इसी विधि से एक वर्षपर्यन्त दोनों पक्षों में प्रत्येक षष्ठी को उपवास करे । भानु, अर्क, रवि, ब्रह्मा, सूर्य, शुक्र, हरि, शिव, श्रीमान्, विभावसु, त्वष्टा तथा वरुण — इन बारह नामों से क्रमशः बारह महीनों में पूजन करे और ‘भानुर्मे प्रीयताम्’, ‘अर्को मे प्रीयताम्’ इस प्रकार प्रतिमास सप्तमी को दान और षष्ठी-पूजन आदि के समय उच्चारण करे । om, ॐव्रत के अन्त में ब्राह्मण-दम्पति की पूजाकर वस्त्र-आभूषण, शर्करापूर्ण कलश और सुवर्ण-कमल तथा स्वर्णफल ब्राह्मण को देकर निम्नलिखित मन्त्र पढ़कर व्रत पूर्ण करे —

“यथा फलकरो मासस्त्वद्भक्तानां सदा रवे ।
तथानन्तफलावाप्तिरस्तु जन्मनि जन्मनि ॥
(उत्तरपर्व ३९ । ११)

‘हे सूर्यदेव ! जिस प्रकार आपके भक्तों के लिये यह मास-व्रत फलदायी होता है, उसी प्रकार मुझे भी जन्म-जन्ममें अनन्त फलों की प्राप्ति होती रहे ।’

इस अनन्त फल देनेवाली फल-षष्ठी-व्रत को जो करता है, वह सुरापानादि सभी पापोंसे मुक्त हो सूर्यलोकमें सम्मानित होता है और अपने आगे-पीछे की इक्कीस पीढ़ियों का उद्धार करता है । जो इसका माहात्म्य श्रवण करता है, वह भी कल्याण का भागी होता है ।
(अध्याय ३९)

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