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भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय ४६
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय ४६
कुक्कुट-मर्कटी-व्रतकथा (मुक्ताभरण सप्तमीव्रत-कथा)
इसी व्रत का ठीक इन्हीं श्लोकों में हेमाद्रि, जयसिंह-कल्पद्रुम तथा व्रतराज आदि निबन्ध-ग्रन्थों में मुक्ताभरण-सप्तमी के नाम से उल्लेख किया गया है और उसके श्लोक भविष्यपुराण के नाम से सूचित किये गये हैं, किंतु आश्चर्य है कि वहाँ इसे कुक्कुट-मर्कटी-सप्तमी नहीं कहा गया है । सम्भव है कि भविष्यपुराणके अन्य किन्हीं हस्तलिखित प्रतियों की पुष्पिका में इन्हें मुक्ताभरण-सप्तमी के नाम से निर्दिष्ट किया गया हो ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाराज युधिष्ठिर ! एक बार महर्षि लोमश मथुरा आये और वहाँ मेरे मातापिता — देवकी-वसुदेव ने उनकी बड़ी श्रद्धा से आवभगत की । फिर वे प्रेम से बैठकर अनेक प्रकार की कथाएँ कहने लगे । उन्होंने उसी प्रसंग में मेरी माता से कहा — ‘देवकी ! कंस ने तुम्हारे बहुत से पुत्रों को मार डाला है, अतः तुम मृतवत्सा एवं दुःखभागिनी बन गयी हो । इसी प्रकार से प्राचीन काल में चन्द्रमुखी नाम की एक सुलक्षणा रानी भी मृतवत्सा एवं दुःखी हो गयी थी । om, ॐपरन्तु उसने एक ऐसे व्रत का अनुष्ठान किया, जिसके प्रभाव से वह जीवत्पुत्रा हो गयी । इसलिये देवकी ! तुम भी उस व्रत के अनुष्ठान के प्रभाव से वैसी हो जाओगी, इसमें संशय नहीं ।’

माता देवकी ने उनसे पूछा — महाराज ! वह चन्द्रमुखी रानी कौन थी ? उसने सौभाग्य और आरोग्य की वृद्धि करनेवाला कौन-सा व्रत किया था ? जिसके कारण उसकी संतान जीवित हो गयी । आप मुझे भी वह व्रत बतलाने की कृपा करें ।

लोमश मुनि बोले — प्राचीन काल में अयोध्या में नहुष नाम के एक प्रसिद्ध राजा थे, उन्हीं की महारानी का नाम चन्द्रमुखी था । राजा के पुरोहित की पत्नी मानमानिका से रानी चन्द्रमुखी की बहुत प्रीति थी । एक दिन वे दोनों सखियाँ स्नान करने के लिये सरयू-तट पर गयीं । उस समय नगर की और भी बहुत-सी स्त्रियाँ वहाँ स्नान करने आयी हुई थीं । उन सब स्त्रियों ने स्नानकर एक मण्डल बनाया और उसमें शिव-पार्वती की प्रतिमा चित्रितकर गन्ध, पुष्प, अक्षत आदि से भक्तिपूर्वक यथाविधि उनकी पूजा की । अनन्तर उन्हें प्रणामकर जब वे सभी अपने घर जाने को उद्यत हुई, तब महारानी चन्द्रमुखी तथा पुरोहित की स्त्री मानमानिका ने उनसे पूछा ‘देवियों ! तुम लोगों ने यह किसकी और किस उद्देश्य से पूजा की है ?’ इस पर वे कहने लगीं — ‘हमलोगों ने भगवान् शिव एवं भगवती पार्वती की पूजा की है और उनके प्रति आत्मसमर्पण कर यह सुवर्ण-सूत्र-मय धागा भी हाथ में धारण किया है । हम सब जबतक प्राण रहेंगे, तबतक इसे धारण किये रहेंगी और शिव-पार्वती का पूजन भी किया करेंगी ।’ यह सुनकर उन दोनों ने भी यह व्रत करने का निश्चय किया और वे अपने घर आ गयी तथा नियम से व्रत करने लगीं । परंतु कुछ समय बाद रानी चन्द्रमुखी प्रमावश व्रत करना भूल गयीं और सूत्र भी न बाँध सकीं । इस कारण मरने के अनन्तर वह वानरी हुई । पुरोहित की स्त्री का भी व्रत-भङ्ग हो गया, इसलिये मरकर वह कुक्कुटी हुई । उन योनियों में भी उनकी मित्रता और पूर्वजन्म की स्मृति बनी रहीं ।

कुछ काल के अनन्तर दोनों की मृत्यु हो गयी । फिर रानी चन्द्रमुखी तो मालव देश के पृथ्वीनाथ नामक राजा की मुख्य रानी और पुरोहित अग्निमील की स्त्री मानमानिका उसी राजा के पुरोहित की पत्नी हुई । रानी का नाम ईश्वरी और पुरोहित की स्त्री का नाम भूषणा था । भूषणा को अपने पूर्वजन्मों का ज्ञान था । उसके आठ उत्तम पुत्र हुए । परंतु रानी ईश्वरी को बहुत समय के बाद एक पुत्र उत्पन्न हुआ, वह रोगग्रस्त रहता था । इस कारण थोड़े ही समय याद (नवें वर्ष) उसकी मृत्यु हो गयी । तब दुःखी हो भूषणा अपने आठों पुत्रों सहित अपनी सखी रानी ईश्वरी को आश्वासन देने उनके पास आयी । भूषणा के बहुत से पुत्रों को देखकर ईश्वरी के मन में ईर्ष्या उत्पन्न हो गयी, फलस्वरूप रानी ईश्वरी ने धीरे-धीरे भूषणा के सभी पुत्र मरवा डाले, परन्तु भगवान् शंकर के अनुग्रह से वे मरकर भी पुनः जीवित हो उठे । तब ईश्वरी ने भूषणा को अपने यहाँ बुलवाया और उससे पूछा — ‘सखि ! तुमने ऐसा कौन-सा पुण्यकर्म किया है, जिसके कारण तुम्हारे मरे हुए भी पुत्र जीवित हो जाते हैं और तुम्हारे बहुत से चिरंजीवी पुत्र उत्पन्न हुए हैं, मुक्ता आदि आभूषणों से रहित होनेपर भी कैसे तुम सदा सुशोभित रहती हो ?’

भूषणा ने कहा — सखि ! मुक्ताभरण सप्तमी-व्रत का विलक्षण माहात्म्य है । भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी को किये जानेवाले इस व्रत में स्नानकर एक मण्डल बनाकर उसमें शिव-पार्वती का पूजन करे और शिव को आत्म-निवेदित सूत्र (दोरक) को हाथ में धारण करे अथवा चाँदी, सोने की अँगूठी बनाकर अँगुली में पहने । उस दिन उपवास करे । बाद में व्रत का उद्यापन करे । उद्यापन के दिन शिव-पार्वती का मण्डल में पूजन कर वह अंगूठी ताम्र के पात्र में रखकर ब्राह्मण को दे दे तथा यथाशक्ति ब्राह्मण-भोजन भी कराये । इस व्रत करने से सभी पदार्थ प्राप्त होते हैं ।

सखी ! भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की सप्तमी तिथि को तुमने और मैंने साथ ही इस व्रत का नियम ग्रहण किया था, परंतु प्रमादवश तुमने इसे छोड़ दिया, इसीसे तुम्हारा पुत्र नष्ट हो गया और राज्य पाकर भी तुम दुःखी ही रहती हो । मैंने व्रत का भक्तिपूर्वक पालन किया, इससे मैं सब प्रकार से सुखी हूँ, परंतु मेरा व्रत अन्त में भङ्ग हो गया था, इसलिये एक जन्म में मुझे कुक्कुटी बनना पड़ा । सखि ! मैं तुम्हें अपने द्वारा किये गये व्रत का आधा पुण्यफल देती हूँ, इससे तुम्हारे सभी दुःख दूर हो जायेंगे । इतना कहकर भूषणा ने अपने व्रत का आधा पुण्यफल ईश्वरी को दे दिया । उसके प्रभाव से ईश्वरी के दीर्घ आयुवाले बहुत पुत्र उत्पन्न हुए और उसे सब प्रकार का सुख प्राप्त हुआ तथा अन्त्त में मोक्ष भी प्राप्त हुआ ।

लोमश मुनि बोले — देवकी ! तुम भी इस व्रत को करो, इससे तुम्हारी संतान स्थिर हो जायगी और तुम्हारा पुत्र तीनों लोकों का स्वामी होगा । यह कहकर लोमश मुनि अपने आश्रम को चले गये ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाराज ! (मेरी माताको इसी व्रतके प्रभावसे मेरे-जैसा पुत्र पैदा हुआ और मेरी इतनी आयु बढ़ी तथा कंस आदि दुष्टों से बच भी गया ।) यह प्रसंगवश मैंने इस व्रत का माहात्म्य बतलाया है, अन्य जो भी कोई स्त्री इस व्रत का आचरण करेगी, उसे कभी संतान का वियोग नहीं होगा और अन्त में वह शिवलोक को प्राप्त करेगी’।
(अध्याय ४६)

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