भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय ५ से ६
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय ५ से ६
विविध प्रकार के पापों एवं पुण्य-कर्मों का फल

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — महाराज ! अधम कर्म करने से जीव घोर नरक में गिरते हैं और अनेक प्रकार की यातनाएँ भोगते हैं । उस अधम कर्म को ही पाप और धर्म कहते हैं । चित्तवृत्ति के भेद से अधर्म का भेद जानना चाहिये । स्थूल, सूक्ष्म, अतिसूक्ष्म आदि भेदों के द्वारा करोड़ों प्रकार के पाप हैं । परन्तु यहाँ मैं केवल बड़े-बड़े पापों का संक्षेप में वर्णन करता हूँ — परस्त्री का चिन्तन, दुसरे का अनिष्ट-चिन्तन और अकार्य (कुकर्म) में अभिनिवेश — ये तीन प्रकार के मानस पाप हैं । om, ॐअनियन्त्रित प्रलाप, अप्रिय, असत्य, परनिन्दा और पिशुनता अर्थात् चुगली – ये पाँच वाचिक पाप हैं । अभक्ष्य-भक्षण, हिंसा, मिथ्या कामसेवन (असंयमित जीवन व्यतीत करना) और परधन-हरण – ये चार कायिक पाप हैं । इन बारह कर्मों के करने से नरक की प्राप्ति होती है । इन कर्मों के भी अनेक भेद होते हैं । जो पुरुष संसाररूपी सागर से उद्धार करनेवाले महादेव अथवा भगवान् विष्णु से द्वेष रखते हैं, वे घोर नरक में पड़ते हैं । ब्रह्महत्या, सुरापान, सुवर्ण की चोरी और गुरु-पत्नीगमन – ये चार महापातक हैं । इन पातकों को करनेवालों के सम्पर्क में रहनेवाला मनुष्य पाँचवाँ महापातकी गिना जाता है । ये सभी नरक में जाते हैं ।

अब मैं उपपातकों का वर्णन करता हूँ । ब्राह्मण को कोई पदार्थ देने की प्रतिज्ञा करके फिर नहीं देना, ब्राह्मण का धन हरण करना, अत्यन्त अहंकार, अतिक्रोध, दाम्भिकत्व, कृतघ्नता, कृपणता, विषयों से अतिशय आसक्ति, अच्छे पुरुषों से द्वेष, परस्रीहरण, कुमारीगमन, स्त्री, पुत्र आदि को बेचना, स्त्री-धन से निर्वाह करना, स्त्री की रक्षा न करना, ऋण लेकर न चुकाना; देवता, अग्नि, साधु, गौ, ब्राह्मण, राजा और पतिव्रता की निन्दा करना आदि उपपातक है । इन पापों को करनेवाले पुरुषों का जो संसर्ग करते हैं वे भी पातकी होते हैं । इस प्रकार पाप करनेवाले मनुष्यों को मृत्यु के बाद यमराज नरक में ले जाते हैं । जो भूल से पाप करते हैं, उनको गुरुजनों की आज्ञा के अनुसार प्रायश्चित करना चाहिये । जो मन, वचन, कर्म से पाप करते हैं एवं दूसरों से कराते हैं अथवा पाप करते हुए पुरुषों का अनुमोदन करते हैं, वे सभी नरक में जाते हैं और जो उत्तम कर्म करते हैं, वे स्वर्ग में सुख से आनन्द भोगते हैं । अशुभ कर्मों का अशुभ फल और शुभ कर्मों का शुभ फल होता है ।

महाराज ! यमराज की सभा में सबके शुभ-अशुभ कर्मों का विचार चित्रगुप्त आदि करते हैं । जीव को अपने कर्मानुसार फल भोगना पड़ता है । इसलिए शुभ कर्म ही करना चाहिये । किये गये कर्म का फल बिना भोगे किसी प्रकार नष्ट नहीं होता । धर्म करनेवाले सुखपूर्वक परलोक जाते हैं और पापी अनेक प्रकार के दुःख का भोग करते हुए यमलोक जाते हैं । इसलिए सदा धर्म ही करना चाहिये । जीव छियासी हजार योजन चलकर वैवस्वतपुर में पहुँचता है । पुण्यात्माओं को इतना बड़ा मार्ग निकट ही जान पड़ता है और पापियों के लिये बहुत लम्बा हो जाता है । पापी जिस मार्ग से चलते हैं, उसमें तीखें काँटे, कंकड़, पत्थर, कीचड़, गड्डे और तलवार की धारके समान तीक्ष्ण पत्थर पड़े रहते है और लोहे की सुइयाँ बिखरी रहती है । उस मार्ग में कहीं अग्नि, कहीं सिंह, कहीं व्याघ्र और कहीं–कहीं मक्षिका, सर्प, वृश्चिक आदि दुष्ट जन्तु घूमते रहते हैं । कहीं पर डाकिनी, शाकिनी, रोग और बड़े क्रूर राक्षस दुःख देते रहते हैं । उस मार्ग में न कहीं छाया है और न जल । इस प्रकार के भयंकर मार्ग से यमदूत पापियों को लोहे की शृंङ्खला से बाँधकर घसीटते हुए ले जाते हैं । उस समय अपने बन्धु आदि से रहित वे प्राणी अपने कर्मों को सोचते हुए रोते रहते हैं । भूख और प्यास के मारे उनके कण्ठ, तालू और ओष्ठ सुख जाते हैं । भयंकर यमदूत उन्हें बार-बार ताडित करते हैं और पैरों में अथवा चोटी में साँकल से बाँधकर खींचते हुए ले जाते हैं । इस प्रकार दुःख भोगते-भोगते वे यमलोक में पहुँचते है और वहाँ अनेक यातनाएँ भोगते हैं ।

पुण्य करने वाले उत्तम मार्ग से सुखपूर्वक पहुँचकर सौम्य-स्वरुप धर्मराज का दर्शन करते हैं और वे उनका बहुत आदर करते हैं, वे कहते हैं कि महात्माओं ! आपलोग धन्य हैं, दूसरों का उपकार करनेवाले हैं । अपने दिव्य सुख की प्राप्ति के लिये बहुत पुण्य किया है । इसलिये इस उत्तम विमानपर चढकर स्वर्ग को जायँ । पुण्यात्मा यमराज को प्रसन्नचित्त अपने पिता की भाँति देखते हैं, परन्तु पापी लोग उन्हें भयानक रूप में देखते हैं । यमराज के समीप ही कालाग्नि के समान क्रूर कृष्णवर्ण मृत्युदेव विराजमान रहते हैं और काल की भयंकर शक्तियाँ तथा अनेक प्रकार के रूप धारण किये सम्पूर्ण रोग वहाँ बैठे दिखायी देते हैं । कृष्णवर्ण के असंख्य यमदूत अपने हाथों में शक्ति, शूल, अंकुश, पाश, चक्र, खड्ग, वज्र, दण्ड आदि शस्त्र धारण किये वहाँ स्थित रहते हैं । पापी जीव यमराज को इस रुप मे स्थित देखते है और यमराज के समीप बैठे हुए चित्रगुप्त उनकी भर्त्स्ना करके कहते है कि पापियों ! तुमने ऐसे बुरे कर्म क्यों किये ? तुमने पराया धन अपहरण किया है, रूप के गर्व से पर-स्त्रियों का सम्पर्क किया है, और भी अनेक प्रकार के पातक उपपातक तुमने किये हैं । अब उन कर्मों का फल भोगो । अब कोई तुम्हारी रक्षा नहीं कर सकता । इस प्रकार पापी राजाओं का तर्जनकर चित्रगुप्त यमदूत को आज्ञा देते है कि इनको ले जाकर नरकों की अग्नि में डाल दो ।

सातवें पाताल में घोर अन्धकार के बीच अति दारुण अठ्ठाईस करोड़ नरक है, जिनमे पापी जीव यातना भोगते हैं । यमदूत वहाँ उनको ऊँचे वृक्षों की शाखाओं में टाँग देते हैं और सैकड़ों मन लोहा उनके पैरों में बाँध देते हैं । उस बोझ से उनका शरीर टूटने लगता है और वे अपने अशुभ कर्मों को यादकर रोते और चिल्लाते हैं । तपाये हुए काँटों से युक्त लौह-दण्ड से और चाबुकों से यमदूत उन्हें बार-बार ताडित करते हैं और साँपों से कटवाते हैं । जब उनके देहों में घाव हो जाता है तब उनमें नमक लगाते हैं । कभी उनको उतारकर खौलते हुए तेल में डालते हैं, वहाँ से निकालकर विष्ठा के कूप में उनको डुबोते हैं, जिनमें कीड़े काट-काटकर खाते हैं, फिर मेद, रुधिर, पूय आदि के कुण्डों में उनको ढकेल देते हैं । जहाँ लोहे की चोंचवाले काक और श्वान आदि जीव उनका मांस नोच-नोच कर खाते हैं । कभी उनको तीक्ष्ण शूलों में पिरोते हैं ।

अभक्ष्य-भक्षण और मिथ्या भाषण करनेवाली जिह्वा को बहुत दण्ड मिलता है । जो पुरुष माता, पिता और गुरु को कठोर वचन बोलते हैं, उनके मुख में जलते हुए अंगारे भर दिये जाते है और घावों में नमक भरकर खौलते हुआ तेल डाल दिया जाता है । जो अतिथि को अन्न-जल दिये बिना उसके सम्मुख ही स्वयं भोजन करते हैं, वे इक्षु की तरह कोल्हू में पेरे जाते हैं तथा वे असिताल वन नामक नरक में जाते हैं । इस प्रकार अनेक क्लेश भोगते रहने पर भी उनके प्राण नहीं निकलते । जिसने परनारी के साथ संग किया हो, यमदूत उसे तप्त लोहे की नारी से आलिंगन कराते हैं और पर-पुरुषगामिनी स्त्री को तप्त लौह पुरुष से लिपटाते हैं और कहते हैं कि ‘दुष्टे ! जिस प्रकार तुमने अपने पति का परित्याग कर पर-पुरुष का आलिंगन किया, उसी प्रकार से इस लौह-पुरुष का भी आलिंगन करो ।’ जो पुरुष देवालय, बाग़, वापी, कूप, मठ आदि को नष्ट करते हैं और वहाँ रहकर मैथुन आदि अनेक प्रकार के पाप करते हैं, यमदूत उनको अनेक प्रकार के यन्त्रों से पीड़ित करते हैं और वे जब तक चन्द्र-सूर्य हैं, तब तक नरक की अग्नि में पड़े जलते रहते हैं । जो गुरु की निन्दा श्रवण करते हैं, उनके कानों को दण्ड मिलता है । इस प्रकार जिन-जिन इन्द्रियों से मनुष्य पाप करते हैं, वे इन्द्रियाँ कष्ट पाती हैं । इस प्रकार की अनेक घोर यातना पापी पुरुष सभी नरकों में भोगते हैं । इनका सौ वर्षों में भी वर्णन नहीं हो सकता । जीव नरकों में अनेक प्रकार की दारुण व्यथा भोगते रहते हैं, परुन्तु उनके प्राण नही निकलते ।

इससे भी अधिक दारुण यातनाएँ हैं, मृदुचित्त पुरुष उनको सुनकर ही दहलने लगते हैं । पुत्र, मित्र, स्त्री आदि के लिये प्राणी अनेक प्रकार का पाप करता है, परन्तु उस समय कोई सहायता नहीं करता । केवल एकाकी ही वह दुःख भोगता है और प्रलयपर्यन्त नरक में पडा रहता हैं । यह ध्रुव सिद्धान्त है कि अपना किया पाप स्वयं भोगना पड़ता है । इसलिये बुद्धिमान् मनुष्य शरीर को नश्वर जानकार लेशमात्र भी पाप न करे, पाप से अवश्य ही नरक भोगना पड़ता है । पाप का फल दुःख है और नरक से बढ़कर अधिक दुःख कहीं नहीं है । पापी मनुष्य नरकवास के अनन्तर फिर पृथ्वी पर जन्म लेते हैं । वृक्ष आदि अनेक प्रकार की स्थावर योनियों में वे जन्म ग्रहण करते है और अनेक कष्ट भोगते हैं । अनन्तर कीट, पतंग, पक्षी, पशु आदि अनेक योनियों में जन्म लेते हुए अति दुर्लभ मनुष्य-जन्म पाते हैं । स्वर्ग एवं मोक्ष देनेवाले मनुष्य-जन्म को पाकर ऐसा कर्म करना चाहिये, जिससे नरक न देखना पड़े । यह मनुष्य-योनि देवताओं तथा असुरों के लिये भी अत्यंत दुर्लभ है । धर्म से ही मनुष्य का जन्म मिलता है । मनुष्य-जन्म पाकर उसे धर्म की वृद्धि करनी चाहिये । जो अपने कल्याण के लिए धर्म का पालन नहीं करता है, उसके समान मुर्ख कौन होगा ?

यह देश सब देशों में उत्तम है । बहुत पुण्य से प्राणी का जन्म भारतवर्ष में होता है । इस देश में जन्म पाकर जो अपने कल्याण के लिये पुण्य करता है, वही बुद्धिमान है । जिसने ऐसा नहीं किया, उसने अपने आत्मा के साथ वञ्चना की । जब तक यह शरीर स्वस्थ है, तबतक जो कुछ पुण्य बन सके वह कर लेना चाहिये । बाद में कुछ भी नहीं हो सकता । दिन-रात के बहाने नित्य आयु के ही अंश खण्डित हो रहे हैं । फिर भी मनुष्यों को बोध नहीं होता कि एक दिन मृत्यु आ पहुँचेगी । यह तो किसी को भी निश्चय नहीं है कि किसकी मृत्यु किस समय में होगी, फिर मनुष्य को क्यों कर धैर्य और सुख मिलता है ? यह जानते हुए कि एक दिन इन सभी सामग्रियों को छोडकर अकेले चले-जायेंगे, फिर अपने हाथ से ही अपनी सम्पति सत्पात्रों को क्यों नहीं बाँट देते ? मनुष्य के लिये दान ही पाथेय अर्थात् रास्ते के लिये भोजन है । जो दान करते हैं, वे सुखपूर्वक जाते हैं । दानहीन मार्ग में अनेक दुःख पाते हैं, भूखे मरते जाते हैं । इन सब बातों को विचारकर पुण्य ही करना चाहिये, पाप से सदा बचना चाहिये । पुण्य कर्मों से देवत्त्व प्राप्त होता है और पाप करने से नरक की प्राप्ति होती है । जो सत्पुरुष सर्वात्मभाव से श्रीसदाशिव की शरण में जाते हैं, वे पद्मपत्र पर स्थित जल की तरह पापों से लिप्त नहीं होते । इसलिए द्वंद्व से छूटकर भक्तिपूर्वक ईश्वर की आराधना करनी चाहिये तथा सभी प्रकार के पापों से निरन्तर बचना चाहिये ।
(अध्याय ५ से ६)

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