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भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय ५७
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय ५७
मासिक कृष्णाष्टमी-व्रतों की विधि यह श्रीकृष्णजन्माष्टमी से भिन्न शिवोपासना का एक मुख्य अद्भभूत व्रत है । इसकी महिमा तथा अनुष्ठान-विधि का वर्णन मत्स्यपुराण अध्याय ५६, नारदपुराण, सौरपुराण १४ । १-३६, व्रत-कल्पद्रुम आदि में बहुत विस्तार से है । विशेष जानकारी के लिये उन्हें भी देखना चाहिये । ज्योतिषग्रन्थों और पुराणों के अनुसार अष्टमी तिथि के स्वामी शिव ही हैं । अत: अष्टमी तथा चतुर्दशी को उनकी उपासना विशेष कल्याणकारिणी होती है।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — पार्थ ! अब आप समस्त पापों तथा भयों के नाशक, धर्मप्रद और भगवान् शंकर के प्रीतिकारक मासिक कृष्णाष्टमी-व्रतों के विधान का श्रवण करें । मार्गशीर्ष मास की कृष्णाष्टमी को उपवास के नियम ग्रहणकर जितेन्द्रिय और क्रोधरहित हो गुरु की आज्ञानुसार उपवास करे । om, ॐमध्याह्न के अनन्तर नदी आदि में स्नान कर गन्ध, उत्तम पुष्प, गुग्गुल धूप, दीप अनेक प्रकार के नैवेद्य तथा ताम्बूल आदि उपचारों से शिवलिङ्ग का पूजनकर काले तिलों से हवन करे । इस मास में शंकरजी का पूजन करे और गोमूत्र-पान कर रात्रि में भूमि पर शयन करे, इससे अतिरात्र-यज्ञ का फल प्राप्त होता है ।

पौष मास की कृष्णाष्टमी को शम्भु नाम से ‍महेश्वर का पूजनकर घृत प्राशन करने से वाजपेय यज्ञ का फल प्राप्त होता है ।

माघ मासकी कृष्णाष्टमी को महेश्वर नाम से भगवान् शंकर का पूजनकर गोदुग्ध प्राशन करने से अनेक यज्ञों का फल प्राप्त होता है ।

फाल्गुन मास की कृष्णाष्टमी में महादेव नाम से उनका पूजनकर तिल भक्षण करने से आठ राजसूय यज्ञों का फल प्राप्त होता है ।

चैत्र मास की कृष्णाष्टमी में स्थाणु नाम से शिव का पूजनकर यव का भोजन करने से अश्वमेध यज्ञ का फल मिलता हैं ।

वैशाख मास की कृष्णाष्टमी में शिव नाम से इनका पूजनकर रात्रि में कुशोदक-पान करने से दस पुरुषमेध यज्ञों का फल मिलता है ।

ज्येष्ठ मास की कृष्णाष्टमी में पशुपति नाम से भगवान् शंकर का पूजनकर गोशृंगजल का पान करने से लाख गोदान का फल मिलता है ।

आषाढ़ मास की कृष्णाष्टमी में उग्र नाम से शंकर का पूजनकर गोमय प्राशन करनेवाला दस लाख वर्ष से भी अधिक समय तक रुद्रलोक में निवास करता है ।

श्रावण मास की कृष्णाष्टमी में शर्व नाम से भगवान् शंकर की पूजाकर रात्रि में अर्क प्राशन करने से बहुत-सा सुवर्ण-दान किये जानेवाले यज्ञ का फल मिलता हैं ।

भाद्रपद मास की कृष्णाष्टमी में त्र्यम्बक नाम से इनकी पूजाकर एवं बिल्वपत्र का भक्षण करने से अन्न-दान का फल मिलता है ।

आश्विन मास की कृष्णाष्टमी में भव नाम से भगवान् शंकर का यजनकर तण्डुलोदक का पान करने से सौ पुण्डरीक यज्ञ का फल प्राप्त होता है ।

इसी प्रकार कार्तिक मास की कृष्णाष्टमी में रुद्र नाम से भगवान् शंकर की भक्ति से पूजाकर रात्रि में दही का प्राशन करने से अग्निष्टोम यज्ञ का फल प्राप्त होता है ।

इस प्रकार बारह महीने शिवजी का पूजन कर अन्त में शिवभक्त ब्राह्मणों को घृत, शर्करायुक्त पायस भोजन कराये तथा यथाशक्ति सुवर्ण, वस्त्र आदि उनको देकर प्रसन्न करे । काले तिल से पूर्ण बारह कलश, छाता, जूता तथा वस्त्र आदि ब्राह्मणों को देकर दूध देनेवाली सवत्सा एक कृष्णवर्ण की गौ भी महादेवजी को निवेदित करे । इस मासिक कृष्णाष्टमी-व्रत को जो एक वर्ष तक निरन्तर करता है, वह सभी पापों से मुक्त होकर उत्तम ऐश्वर्य प्राप्त करता है और सौ वर्षपर्यन्त संसार के आनन्दों का उपभोग करता है । इसी व्रत का अनुष्ठान कर इन्द्र, चन्द्र, ब्रह्मा तथा विष्णु आदि देवताओं ने उत्तम-उत्तम पद को प्राप्त किया है । जो स्त्री-पुरुष इस व्रत को भक्तिपूर्वक करते हैं वे उत्तम विमान में बैठकर देवताओं द्वारा स्तुत होते हुए शिवलोक में जाते हैं और भगवान् शंकर के ऐश्वर्यं से सम्पन्न हो जाते हैं । वहाँ आठ कल्पपर्यन्त निवास करते हैं और जो इस व्रत के माहात्म्य को सुनता हैं, वह सभी पापों से मुक्त हो जाता है ।
(अध्याय ५७)

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