भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय ६१
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय ६१
ध्वज-नवमी-व्रत-कथा

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाराज ! भगवती दुर्गा द्वारा महिषासुर के वध किये जाने पर दैत्यों ने पूर्व-वैर का स्मरण कर देवताओं के साथ अनेक संग्राम किये । भगवती ने भी धर्म की रक्षा के लिये अनेक रूप धारण कर दैत्यों का संहार किया । महिषासुर के पुत्र रक्तासुर ने बहुत लम्बे समय तक घोर तपस्या कर ब्रह्माजी को प्रसन्न किया और ब्रह्माजी ने प्रसन्न होकर उसे तीनों लोको का राज्य दे दिया । om, ॐउसने वर प्राप्तकर दैत्यों को एकत्रित किया तथा इन्द्र के साथ युद्ध करने के लिये अमरावती पर आक्रमण कर दिया । देवताओं ने देखा कि दैत्य-सेना युद्ध के लिये आ रही है, तब वे भी एकत्रित होकर देवराज इन्द्र की अध्यक्षता में युद्ध के लिये आ डटे । घोर युद्ध प्रारम्भ हो गया । दानवों ने इतना भयंकर युद्ध किया कि देवगण रण छोड़कर भाग गये । दैत्य रक्तासुर अमरावती को अपने अधीन कर राज्य करने लगा । देवगण वहाँ से भागकर करच्छत्रा-पुरी में गये, जहाँ भववल्लभा दुर्गा निवास करती हैं । चामुण्डा भी नवदुर्गा के साथ वहाँ विराजमान रहती है । यहाँ देवताओं ने महालक्ष्मी, नन्दा, क्षेमकरी, शिवदूती, महारुण्डा, भ्रामरी, चन्द्रमङ्गला, रेवती और हरसिद्धि — इन नौ दुर्गाओं की भक्तिपूर्वक स्तुति करते हुए कहा —

“अमरपति-मुकुट-चुम्बित-चरणाम्बुज-सकल-भुवन-सुख-जननी ।
जयति जगदीशवन्दिता सकलामलनिष्कला दुर्गा ॥
विकृत-नख-दशनभूषण-रुधिरवशाच्छुरितक्षत-खड्ग-हस्ता ।
जयति नरमुण्ड-मुण्डितपिशित सुराहारकृच्चण्डी ॥
प्रज्छादित-शिखिगणोद्वल-विकट-जटाबद्ध-चन्द्र-मणि-शोभा ।
जयति दिगम्बरभूषा सिद्धवटेशा महालक्ष्मीः ॥
करकमलजनितशोभा पद्मासनबद्धपद्मवदना च ।
जयति कमण्डलुहस्ता नन्दा देवी नतार्तिहरा ॥
दिग्वसना विकृतमुखा फेत्कारोद्दामपूरितदिशौघा ।
जयति विकरालदेहा क्षेमङ्करी रौद्रभावस्था ॥
क्रोशितब्रह्माण्डोदरसुरवरमुखरहुंकृतनिनादा ।
जयति मदातिमिहस्ता शिवदूती प्रथमशिवशक्ति ॥
मुक्ताट्टहासभैरवदुःसहतरचकितसकलदिक्चक्रा ।
जयति भुजगेन्द्रमणिशोभितकर्णा महातुण्डा ॥
पटुपटहमुरजमर्दलझल्लरिझङ्कारनर्तितावयवा ।
जयति मधुव्रतरूपा दैत्यहरी भ्रामरी देवी ॥
शान्ता प्रशान्तवदना सिंहवरा ध्यानयोगतन्निष्ठा ।
जयति चतुर्भुजदेहा चन्द्रकला चन्द्रमण्डला देवी ॥
पक्षपुटचंचुघातैः संचूर्णितविविधशत्रुसङ्घाता ।
जयति शितशूलहस्ता बहुरूपा रेवती भद्रा ॥
पर्यटति जगति हृष्टा पितृवननिलरोषु योगिनीसहिता ।
जयति हरसिद्धिनाम्नी हरसिद्धिर्वंदिता सिद्धैः ॥”
(उत्तरपर्व ६१ । ११-२१)
‘ब्रह्माण्ड के समस्त प्राणियों को सुख प्रदान करने वाली उस दुर्गा जी की जय हो, जिसके चरण कमल को सुरेश का मुकुट सदैव चुम्बन करता है और जगदीश की वन्द्या, कलायुक्त, अमलच्छवि एवं निर्गुण रूप हैं । नरमुण्ड की माला एवं राक्षसों के मांस-रक्त के पान करने वाली चण्डी देवी की जय हो । जो भूषण रूप नख और दशनों के विकृत होने के कारण प्रवाहित रक्त की धारावश क्षत अंगों में चमकने वाले खड्ग को धारण करती हैं । दिगम्बर वेष धारिणी, एवं सिद्धों की स्वामिनी महालक्ष्मी की जय हो । जो अपनी विकराल जटा में बाँधे हुए चन्द्रमणि की शोभा को मयूरों द्वारा आच्छादित करती हैं । कर में कमण्डलु लिए एवं प्रणत भक्तों की आर्तहरिणी नन्दा देवी की जय हो, जो अपनी करकमल-जनित शोभा को कमलासन में आबद्ध-सा किये एवं कमल मुखी परम सुन्दरी हैं । दिगम्बर वेश, विकृत मुख, अपनी रोष पूर्ण श्वास की ज्वाला से चारों दिशाओं को प्रज्वलित करने वाली, विकराल देह एवं रौद्रमास से स्थित रहने वाली क्षेमकरी देवी की जय हो । शिव की शिव दूती नामक उस आधा शक्ति की जय हो, जो इस ब्रह्माण्ड के उदर में क्रन्दन करने वाले देवेन्द्र की उस गुखरता को अपने हुंकार निनाद से नष्ट करती हैं और अत्यन्त प्रमत्त होकर अपने हाथ में मत्स्य धारण करती हैं । भुजगेन्द्र से अपने कर्ण को आबद्ध करने वाली उस महातुण्डा देवी की जय हो । जो अपने भीषण एवं अत्यन्त दुःसह अट्टहास से सम्पूर्ण दिशाओं को चकित करती हैं । पटह, मुरज, मर्दल एवं झालर वाद्यों के अलङ्कारों से सात शरीर के अंग को नचाने वाली, मधुव्रत रूप एवं दैत्य-घातिनी भ्रामरी देवी की जय हो । चार भुजाओं से भूषित, चन्द्र कलाओं से पूर्ण उस चन्द्र मण्डल देवी की जय हो, जो शांत स्वभाव, अत्यन्त शान्त मुख, और परमोत्तम सिंह पर सुशोभित होकर योगियों की भाँति ध्यान मग्न रहती हैं । भद्र रूप धारिणी रेवती देवी की जय हो, जो अपने दोनों पक्षों और चोंच के आघातों द्वारा अनेक शत्रु संघ का मर्दन करती हैं तथा तीक्ष्ण शूल हाथ में लिए अनके रूप धारण करती हैं । उसी भाँति सिद्धों से सुसेवित हर सिद्धि देवी की जय हो, जो हर्ष मग्न होकर योगिनियों समेत अपने पिता हिमालय के वन निवेशों में स्वतंत्र विचरण किया करती हैं ।’

इस प्रकार आर्या छन्द वाली स्तुतियों द्वारा नवदुर्गा की स्तुति करने के उपरान्त देवराज इन्द्र ने देवों के साथ यह भी कहा कि — समस्त भय से हम लोगों की रक्षा करो पश्चात् प्रणत होकर अनुनय विनय पूर्वक बार-बार उस सिंह वाहिनी भवानी से कहा — शरण्ये ! हम भयभीतों की शरण हो ।
देवताओं की यह आर्त वाणी सुनकर बीस भुजाओं में विभिन्न आयुध धारण किये सिंहारूढ़ा नवदुर्गा के साथ कुमारी स्वरूपा भगवती प्रकट हो गयीं । तदनन्तर परम पराक्रमी और ब्रह्माजी के वरदान से अभिमानी अधम अब्रह्मण्य प्रचण्ड दैत्यगण भी यहाँ आये, जिनमें इन्द्रमारी, गुरुकेशी, प्रलम्ब, नरक, कुष्ठ, पुलोमा, शरभ, शम्बर, दुन्दुभि, इल्वल, नमुचि, भौम, वातापि, धेनुक, कलि, मायावृत, बलबन्धु, कैटभ, कालजित्, राहु, पौण्ड्र आदि दैत्य मुख्य थे । ये प्रज्वलित अग्नि के समान तेजस्वी, विविध वाहनों पर आरूढ़ अनेक प्रकार के शस्त्र, अस्त्र और ध्वजाओं को धारण किये हुए थे । उनके आगे पणव, भेरी, गोमुख, शङक, डमरू, डिण्डिम आदि बाजे बज रहे थे । दैत्यों ने युद्ध आरम्भ कर दिया और भगवती पर शर, शूल, परिघ, पट्टिश, शक्ति, तोमर, कुन्त्त, शतघ्नी, गदा, मुद्गर आदि अनेक आयुधों की वृष्टि करने लगे । भगवती भी क्रोध से प्रज्वलित हो दैत्यों का संहार करने लगीं । उनके ध्वज आदि चिह्नों को बलपूर्वक छीनकर देवगणों को सौंप दिया । क्षणभर में ही उन्होंने अनन्त दैत्यों का नाश कर दिया । रक्तासुर के कण्ठ को पकड़कर पृथ्वी पर पटककर त्रिशूल से उसका हृदय विदीर्ण कर दिया । बचे हुए दैत्यगण वहाँ से जान बचाकर भाग निकले । इस प्रकार देवी की कृपा से देवताओं ने विजय प्राप्तकर करच्छत्रपुरी में आकर भगवती का विशेष उत्सव मनाया । नगर तोरणों और ध्वजाओं से अलंकृत किया गया । राजन् ! जो नवमी तिथि को उपवासकर भगवती का उत्सव करता है तथा उन्हें ध्वज अर्पण करता है, वह अवश्य ही विजयी होता है ।

महाराज ! अब इस व्रत की विधि सुनिये । पौष मास के शुक्ल पक्ष की नवमी तिथि को स्नानकर पूजा के लिये पुष्प अपने हाथ से चुने और उनसे सिंहवाहिनी कुमारी भगवती का पूजन करे साथ ही विविध ध्वजाओं को भगवती के सम्मुख स्थापित करे और मालती-पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, गन्ध, चन्दन, विविध फल, माला, वस्त्र, दधि एवं बिना अग्नि से सिद्ध विविध भक्ष्य भगवती को निवेदित करे एवं इस मन्त्र को पढ़े —

“भद्रां भगवती कृष्णां विश्वस्य जगतो हिताम् ।
सम्वेशिनीं संयमनीं ग्रहनक्षत्रमालिनीम् ॥
प्रपन्नोहं शिवां रात्रीं भद्रे पारय मे व्रतम् ।
सर्वभूतपिशादेभ्यः सर्वसत्वसरीसृपैः ॥
देवेभ्यो मानुषेभ्यश्च भयेभ्यो रक्ष मां सदा ॥”
(उत्तरपर्व ६१ । ४९-५०)

‘भद्रे ! ब्रह्म विश्व के हितार्थ आविर्भूत होने वाली कृष्णा एवं भगवती भद्रा की शरण में प्राप्त हूँ, जो आब्रह्माण्ड की संवेशिनी, संयमन करने वाली एवं ग्रह, नक्षत्रमालाओं से विभूषित है तथा शिवा एवं कालरात्रि रूप हैं । भद्रे ! मैं तुम्हें नमस्कार कर रहा हूँ, समस्त भूत, पिशाच, सभी प्राणियों, सर्प, देव, और उभय भाँति के मनुष्यों से मेरी सदैव रक्षा करो ।’

फिर कुमारियों और देवीभक्त ब्राह्मणोंको भोजन कराये, क्षमा-प्रार्थना करे, उपवास करे या भक्तिपूर्वक एकभुक्त रहे । इस प्रकार से जो पुरुष नवमी को उपवास करता हैं और ध्वजाओं से भगवती को अलंकृत कर उनकी पूजा करता है, उसे चोर, अग्नि, जल, राजा, शत्रु आदिका भय नहीं रहता । इस नवमी तिथि को भगवती ने विजय प्राप्त की थी, अतः यह नवमी इन्हें बहुत प्रिय है । जो नवमी को भक्तिपूर्वक भगवती को पूजा कर इन्हें ध्वजारोपण करता है, यह सभी प्रकार के सुख को भोगकर अन्त में वीरलोक को प्राप्त होता है ।
(अध्याय ६१)

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