भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय ६४
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय ६४
आशादशमी-व्रत-कथा एवं व्रत-विधान

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — पार्थ ! अब मैं आपसे आशा-दशमी व्रत-कथा एवं उसके विधान का वर्णन कर रहा हूँ । प्राचीन काल में निषध देश में नल नाम के एक राजा थे । उनके भाई पुष्कर ने द्यूत में जब उन्हें पराजित कर दिया, तब नल अपनी भार्या दमयन्ती के साथ राज्य से बाहर चले गये । वे प्रतिदिन एक वन से दूसरे वन में भ्रमण करते रहते थे, केवल जलमात्र से अपना जीवन निर्वाह करते थे और जनशून्य भयंकर वनों में घूमते रहते थे ।om, ॐ एक बार राजा ने वन में स्वर्ण-सी कान्तिवाले कुछ पक्षियों को देखा । उन्हें पकड़ने की इच्छा से राजा ने उनके ऊपर वस्त्र फैलाया, परंतु ये सभी उस वस्त्र लेकर आकाश में उड़ गये । इससे राजा बड़े दुःखी हो गये । वे दमयन्ती को गाढ़ निद्रा में देखकर उसे उसी स्थिति में छोड़कर चले गये ।

दमयन्ती ने निद्रा से उठकर देखा तो नल को न पाकर वह उस घोर वन में हाहाकार करते हुए रोने लगी । महान् दुःख और शोक से संतप्त होकर वह नल के दर्शनों की इच्छा से इधर-उधर भटकने लगी । इसी प्रकार कई दिन बीत गये और भटकते हुए वह चेदिदेश में पहुँची । वहाँ यह उन्मत्त-सी रहने लगी । छोटे-छोटे शिशु उसे कौतुकवश घेरे रहते थे । किसी दिन मनुष्यों से घिरी हुई उसे चेदिदेश के राजा की माता ने देखा । उस समय दमयन्ती चन्द्रमा की रेखा के समान भूमि पर पड़ी हुई थी । उसका मुखमण्डल प्रकाशित था । राजमाता ने उसे अपने भवन में बुलाकर पूछा — ‘वरानने ! तुम कौन हो ?’ इस पर दमयन्ती ने लज्जित होते हुए कहा — ‘मैं सैरन्ध्री (दासी) हूँ । मैं न किसी के चरण धोती हूँ और न किसी का उच्छिष्ट भक्षण करती हूँ । यहाँ रहते हुए कोई मुझे प्राप्त करेगा तो वह आपके द्वारा दण्डनीय होगा । देवि ! इस प्रतिज्ञा के साथ मैं यहाँ रह सकती हूँ ।’ राजमाता ने कहा — “ठीक हैं ऐसा ही होगा ।’ तब दमयन्ती ने वहाँ रहना स्वीकार किया और इसी प्रकार कुछ समय व्यतीत हुआ और फिर एक ब्राह्मण दमयन्ती को उसके माता-पिता के घर ले आया । पर माता-पिता तथा भाइयों का स्नेह पाने पर भी पति के बिना वह अत्यन्त दुःखी रहती थी ।

एक बार दमयन्ती ने एक श्रेष्ठ ब्राह्मण को बुलाकर उससे पूछा — हे ब्राह्मणदेवता ! आप कोई ऐसा दान एवं व्रत बतलायें, जिससे मेरे पति मुझे प्राप्त हो जायें ।’ इसपर उस बुद्धिमान् ब्राह्मण ने कहा — ‘भद्रे ! तुम मनोवाञ्छित सिद्धि प्रदान करनेवाले आशादशमी-व्रत को करो ।’ तब दमयन्ती ने पुराणवेत्ता उस दमन नामक पुरोहित ब्राह्मण के द्वारा ऐसा कहे जाने पर आशादशमी-व्रत का अनुष्ठान किया । उस व्रत के प्रभाव से दमयन्ती ने अपने पति को पुनः प्राप्त किया ।

युधिष्ठिर ने पूछा — हे गोविन्द ! यह आशादशमी-व्रत किस प्रकार और कैसे किया जाता है, आप सर्वज्ञ हैं, आप इसे बतलायें ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — हे राजन् ! इस व्रत के प्रभाव से राजपुत्र अपना राज्य, कृषक खेती, वणिक् व्यापार में लाभ, पुत्रार्थी पुत्र तथा मानव धर्म, अर्थ एवं काम की सिद्धि प्राप्त करते हैं । कन्या श्रेष्ठ वर प्राप्त करती है, ब्राह्मण निर्विघ्न यज्ञ सम्पन्न कर लेता है, रोगी रोग से मुक्त हो जाता है और पति के चिर-प्रवास हो जाने पर स्त्री उसे शीघ्र ही प्राप्त कर लेती हैं । शिशु के दन्तजनित पीड़ा में भी इस व्रत से पीड़ा दूर हो जाती है और कष्ट नहीं होता । इसी प्रकार अन्य कार्यों की सिद्धि के लिये इस आशादशमी-व्रत को करना चाहिये । जब भी जिस किसी को कोई कष्ट पड़े, उसकी निवृत्ति के लिये इस व्रत को करना चाहिये ।

यह आशादशमी-व्रत किसी भी मास के शुक्ल पक्ष की दशमी को किया जाता है । इस दिन प्रातःकाल स्नान करके देवताओं की पूजा कर रात्रि में पुष्प, अलक्त(लाख, महावर) तथा चन्दन आदि से दस आशादेवियों की पूजा करनी चाहिये । घर के आँगन में जौ से अथवा पिष्टातक से पूर्वादि दसों दिशाओं के अधिपतियों की प्रतिमाओं को उनके वाहन तथा अस्त्र-शस्त्रों से सुसज्जित कर उन्हें ही ऐन्द्री आदि दिशा-देवियों के रूप में मानकर पूजन करना चाहिये । सबको घृतपूर्ण नैवेद्य, पृथक्-पृथक् दीपक तथा ऋतुफल आदि समर्पित करना चाहिये । इसके अनन्तर अपने कार्य की सिद्धि के लिये इस प्रकार प्रार्थना करनी चाहिये —

“आशाश्चाशाः सदा सन्तु सिद्ध्यन्तां मे मनोरथाः ।
भवतीनां प्रसादेन सदा कल्याणमस्त्विति ॥
(उत्तरपर्व ६४ । २५)

‘हे आशादेवियो ! मेरी आशाएँ सदा सफल हों, मेरे मनोरथ पूर्ण हों, आपलोगों के अनुग्रह से मेरा सदा कल्याण हो ।’

इस प्रकार विधिवत् पूजा कर ब्राह्मण को दक्षिणा प्रदानकर प्रसाद ग्रहण करना चाहिये । इसी क्रम से प्रत्येक मास में इस व्रत को करना चाहिये । जबतक अपना मनोरथ पूर्ण न हो जाय, तबतक इस व्रत को करना चाहिये । अनन्तर उद्यापन करना चाहिये । उद्यापन में आशादेवियों की सोने, चाँदी अथवा पिष्टातक से प्रतिमा बनाकर घर के आँगन में उनकी पूजा करके ऐन्द्री, आग्नेयी, याम्या, नैर्ऋति, वारुणि, वायव्या, सौम्या, ऐशानी, अधः तथा ब्राह्मी — इन दस आशादेवियों (दिशादेवियों) से अभीष्ट कामनाओं की सिद्धि के लिये प्रार्थना करनी चाहिये, साथ ही नक्षत्रों, ग्रहों, ताराग्रहों, नक्षत्र-मातृकाओं, भूत-प्रेत-विनायकों से भी अभीष्ट-सिद्धि के लिये प्रार्थना करनी चाहिये । पुष्प, फल, धूप, गन्ध, वस्त्र आदि से उनकी पूजा करनी चाहिये । सुहागिनी स्त्रियों को नृत्य-गीत आदि के द्वारा रात्रि जागरण करना चाहिये । प्रातःकाल विद्वान् ब्राह्मण को सब कुछ पूजित पदार्थ निवेदित कर देना चाहिये और उन्हें प्रणाम कर क्षमा-याचना करनी चाहिये । अनन्तर बन्धु-बान्धवों एवं मित्रों के साथ प्रसन्न-मन से भोजन करना चाहिये । हे पार्थ ! जो इस आशादशमी-व्रत को श्रद्धापूर्वक करता है, उसके सभी मनोरथ पूर्ण हो जाते हैं । यह व्रत स्त्रियों के लिये विशेष श्रेयस्कर है ।
(अध्याय ६४)

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