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भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय ७०
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय ७०
देवशयनी एवं देवोत्थानी द्वादशी व्रतोंका विधान

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — राजन् ! अब मैं गोविन्दशयन नामक व्रत का वर्णन कर रहा हूँ और कटिदान, समुत्थान एवं चातुर्मास्यव्रत का भी वर्णन करता हैं, उसे आप सुनें ।

युधिष्ठिर ने पूछा — महाराज ! यह देव-शयन क्या है ? जब देवता भी सो जाते हैं तब संसार कैसे चलता है ? देव क्यों सोते हैं ? और इस व्रत का क्या विधान है — इसे कहें ।om, ॐ
भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — भगवान् सूर्य के मिथुन राशि में आने पर भगवान् मधुसूदन की मूर्ति को शयन करा दे और तुलाराशि में सूर्य के जाने पर पुनः भगवान् जनार्दन को शयन से उठाये । अधिमास आने पर भी यहीं विधि है । अन्य प्रकार से न तो हरि को शयन कराये और न उन्हें निद्रा से उठाये ।

आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की देवशयनी एकादशी को उपवास करे । भक्तिमान् पुरुष शुक्ल वस्त्र से आच्छादित तकिये से युक्त उत्तम शय्या पर पीताम्बरधारी, सौम्य, शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान् विष्णु को शयन कराये । इतिहास और पुराणवेत्ता विष्णुभक्त पुरुष दही, दूध, शहद, घी और जल से भगवान् की प्रतिमा को स्नान कराकर गन्ध, धूप, कुंकुम तथा वस्त्रों से अलंकृत कर निम्नलिखित मन्त्र से प्रार्थना करे —

“सुप्ते त्वयि जगन्नाथ जगत् सुप्तं भवेदिदम् ।
विबुद्धे स्वयि बुध्येत जगत् सर्व चराचरम् ॥”
(उत्तरपर्व ७० | १०)

हे जगन्नाथ ! आपके सो जाने पर यह सारा जगत् सुप्त हो जाता है और आपके जग जाने पर सम्पूर्ण चराचर जगत् प्रबुद्ध हो जाता है ।’

महाराज ! इस प्रकार भगवान् विष्णु की प्रतिमा को शय्या पर स्थापित कर उसके सम्मुख वाणी पर नियन्त्रण रखने का और अन्य नियमों का व्रत ग्रहण करे । वर्ष के चार मास तक देवाधिदेव के शयन और उसके बाद उत्थापन की विधि कही गयी है ।

राजन् ! इस व्रत के त्यागने एवं ग्रहण करने योग्य पदार्थों के अलग-अलग नियमों को आप सुनें । गुड़ का परित्याग करने से व्रती अगले जन्म में मधुर वाणीवाला राजा होता है । इसी प्रकार चार मास तक तेल का परित्याग करनेवाला सुन्दर शरीरवाला होता है । कटु तैल का त्याग करने से उसके शत्रुओं का नाश होता है । महुए तेल का त्याग करने से अतुल सौभाग्य की प्राप्ति होती है । पुष्प आदि के भोग का परित्याग करने से स्वर्ग में विद्याधर होता है । इन चार मासों में जो योग का अभ्यास करता है, वह ब्रह्मपद को प्राप्त करता है । कडुवा, खट्टा, तीता, मधुर, क्षार, कषाय आदि रस का जो त्याग करता है, वह वैरूप्य और दुर्गति को कभी भी प्राप्त नहीं होता । ताम्बूल के त्याग से श्रेष्ठ भोग को प्राप्त करता है और मधुर कण्ठवाला होता है । घृत के त्याग से रमणीय लावण्य और सभी प्रकार की सिद्धि को प्राप्त करता है । फल का त्याग करने से बुद्धिमान् होता है और अनेक पुत्रों की प्राप्ति होती है । पत्तों का साग खाने से रोगी, अपक्व अन्न खाने से निर्मल शरीर से युक्त होता है । तैल-मर्दन के परित्याग से व्रती दीप्तिमान्, दीप्तकरण, राजाधिराज धनाध्यक्ष कुबेर के सायुज्य को प्राप्त करता है । दही, दूध, तक्र (मट्ठा)— के त्याग का नियम (सावन में मठ्ठा, भाद्रपद में दही और आश्विन में दूध का परित्याग करना चाहिये।) लेने से मनुष्य गोलोक को प्राप्त करता है । स्थालीपाक का परित्याग करने पर इन्द्र का अतिधि होता है । तापपक्व वस्तु के भक्षण का नियम लेने पर दीर्घायु संतान की प्राप्ति होती है । पृथ्वी पर शयन का नियम लेने से विष्णु का भक्त होता हैं ।

हे धर्मनन्दन ! इन वस्तुओं के परित्याग से धर्म होता है । नख और केशक धारण करने पर, प्रतिदिन गङ्गा-स्नान करने पर एवं मौनव्रती रहने पर उसकी आज्ञा का कोई भी उल्लङ्घन नहीं कर सकता । जो सदा पृथ्वी पर भोजन करता है, वह पृथ्वीपति होता हैं । ‘ॐ नमो नारायणाय’ इस अष्टाक्षर मन्त्र का निराहार रहकर जप करने एवं भगवान् विष्णु के चरणों की वन्दना करने से गोदानजन्य फल प्राप्त होता है । भगवान् विष्णु के चरणोदक के संस्पर्श से मनुष्य कृतकृत्य हो जाता है । चातुर्मास्य में भगवान् विष्णु मन्दिर में उपलेपन और अर्चना करने से मनुष्य कल्पपर्यन्त स्थायी राजा होता है, इसमें संशय नहीं है । स्तुतिपाठ करता हुआ जो सौ बार भगवान् विष्णु की प्रदक्षिणा करता है एवं पुष्प, माला आदि से पूजा करता है, वह हंसयुक्त विमान के द्वारा विष्णुलोक को जाता है । विष्णु-सम्बन्धी गान और वाद्य करनेवाला गन्धर्वलोक को प्राप्त होता है । प्रतिदिन शास्त्र-चर्चा से जो लोगों को ज्ञान प्रदान करता है, वह व्यासरूपी भगवान् के रूप में मान्य होता है और अन्त्त में विष्णुलोक को जाता है । नित्य स्नान करनेवाला मनुष्य कभी नरकॉ में नहीं जाता । भोजन का संयम करनेवाला मनुष्य पुष्कर क्षेत्र में स्नान करने का फल प्राप्त करता है । भगवत् सम्बन्धी लीला-नाटक आदि का आयोजन करनेवाला अप्सराओं का राज्य प्राप्त करता है । अयाचित भोजन करनेवाला श्रेष्ठ बावली और कुंआं बनाने को फल प्राप्त करता है । दिन के छठे (अन्तिम) भाग में अन्न के भक्षण करने से मनुष्य स्थायीरूप से स्वर्ग प्राप्त करता है । पत्तल में भोजन करनेवाला मनुष्य कुरुक्षेत्र में वास करने का फल प्राप्त करता है । शिला पर नित्य भोजन करने से प्रयाग में स्नान करने का फल प्राप्त करता है । दो प्रहर तक जल का त्याग करने से कभी रोगी नहीं होता ।

हे पार्थ ! चातुर्मास्य में इस प्रकार के व्रत एवं नियमों के पालन से साधक पूर्ण संतोष को प्राप्त करता है । अर्थात् सभी प्रकार सुखी एवं संतुष्ट हो जाता है । गरुडध्वज़ जगन्नाथ के शयन करने पर चारों वर्णों की विवाह, यज्ञ आदि सभी क्रियाएँ सम्पादित नहीं होती । विवाह, यज्ञोपवीतादि संस्कार, दीक्षाग्रहण, यज्ञ, गृहप्रवेशादि, गोदान, प्रतिष्ठा एवं जितने भी शुभ कर्म हैं, वे सभी चातुर्मास्य में त्याज्य हैं । संक्रान्तिरहित मास में अर्थात् मलमास में देवता एवं पितरों से सम्बन्धित कोई भी क्रिया सम्पादित नहीं की जानी चाहिये । भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की एकादशी को भगवान् विष्णु का कटिदान होता है अर्थात् करवट बदलने की क्रिया सम्पन्न करनी चाहिये । इस दिन महापूजा करनी चाहिये ।

राजन् ! अब इस विष्णु-शयन का कारण सुनिये । किसी समय तपस्या के प्रभाव से हरि को संतुष्टकर योगनिद्रा ने प्रार्थना की कि भगवन् ! आप मुझे भी अपने अङ्गों में स्थान दीजिये । तब मैंने देखा कि मेरा सम्पूर्ण शरीर तो लक्ष्मी आदि के द्वारा अधिष्ठित है । लक्ष्मी के द्वारा उरःस्थल, शङ्ख, चक्र, शार्ङ्गधनुष तथा असि के द्वारा बाहु, वैनतेय के द्वारा नाभि के नीचे के अङ्ग. मुकुट से सिर, कुण्डलों से कान अवरुद्ध हैं । इसलिये मैने संतुष्ट होकर नेत्रों में आदर से योगनिद्रा को स्थान दिया और कहा कि तुम वर्ष में चार मास मेरे आश्रित रहोगी । यह सुनकर प्रसन्न होकर योगनिद्रा ने मेरे नेत्रों में वास किया । मैं उस मनस्विनी को आदर देता हूँ । योगनिद्रा में जब मैं क्षीरसागर में इस महानिद्रारूपी शेषशय्या पर शयन करती हैं, उस समय ब्रह्मा के सांनिध्य में भगवती लक्ष्मी अपने करकमलों से मेरे दोनों चरणों का मर्दन करती हैं और क्षीरसागर की लहरें मेरे चरणों को धोती हैं । हे पाण्डवश्रेष्ठ ! जो मनुष्य इस चातुर्मास्य के समय अनेक व्रत-नियमपूर्वक रहता है, वह कल्पपर्यन्त विष्णुलोक में निवास करता है, इसमें संशय नहीं ।
शङ्ख, चक्र, गदाधारी भगवान् विष्णु कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष को एकादशी में जागते हैं, उसकी व्रत विधि आप सुनिये । भगवान् को इस मन्त्र से जगाना चाहिये —

“इदं विष्णुर्वि चक्रमे त्रेधा नि दधे पदम् ।
समूढमस्यँ् पासुरे स्वाहा ॥” (यजु० ५ । १५)

अपने आसन पर विष्णु के जागने पर संसार की सभी धार्मिक क्रियाएँ प्रवृत्त हो जाती हैं । शङ्ख, मृदंग आदि वाद्यों की ध्वनि एवं जयघोष के साथ भगवान् को रात्रि में रथ पर बैठाकर घुमाना चाहिये । देवदेवेश के उठने पर नगर को दीपादि से देदीप्यमान कर नृत्य-गीत वाद्य आदि से मङ्गलोत्सव करना चाहिये । धरणीधर दामोदर भगवान् विष्णु उठकर जिस-जिसको देखते हैं, उस समय उन्हें प्रदत्त सभी वस्तुएँ मानव को स्वर्ग में प्राप्त होती हैं । एकादशी के दिन रात्रि मन्दिर में जागरण करे । द्वादशी में प्रातःकाल स्वच्छ जल से स्नानकर विष्णु की पूजा करे । अग्नि में घृत आदि हव्य द्रव्यों से हवन करे, अनन्तर स्नानकर ब्राह्मण को विशिष्ट अन्नों का भोजन कराये । घी, दही, मधु, गुड आदि के द्वारा निर्मित मोदक को भोजन के लिये समर्पित करे । यजमान भी प्रसन्नतापूर्वक संयमित होकर ग्यारह, दस, आठ, पाँच या दो विप्रों की पुष्प, गन्ध आदि से विधिवत् पूजा करे । श्रेष्ठ संन्यासियों को भी भोजन कराये और संकल्प में व्यक्त पदार्थ तथा अभीष्ट पत्र-पुष्य आदि दक्षिणा के साथ देकर उन्हें विदा करे । अनन्त्तर स्वयं भोजन करना चाहिये । जिस वस्तु को चार मास तक छोड़ा है, उसे भी खाना चाहिये । ऐसा करने से धर्म की प्राप्ति होती है । अन्त मे व्रती विष्णुपुरी (वैकुण्ठ) को प्राप्त करता है । जिस व्यक्ति का चातुर्मास्यव्रत निर्विघ्न सम्पन्न होता है, वह कृतकृत्य हो जाता है, उसका पुनर्जन्म नहीं होता । हे। पार्थ ! जो देवशयन-व्रत को विधिपूर्वक सम्पन्न करता हुआ अन्त में भगवान् विष्णु को जगाता है, वह विष्णुलोक को प्राप्त करता है । इस माहात्म्य को जो मनुष्य ध्यान से सुनता है, स्तुति करता एवं कहता है, वह विष्णुलोक को प्राप्त करता है । क्षीरसागर में भगवान् अनन्त जिस दिन सोते हैं और जागते हैं, उस दिन अनन्यचित्त से उपवास करनेवाला पुरुष सद्गति को प्राप्त करता है ।
(अध्याय ७०)

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