भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय ७६
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय ७६
विजय-श्रवण-द्वादशीव्रत में वामनावतार की कथा तथा व्रत-विधि

भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा — युधिष्ठिर ! भाद्रपद मास की एकादशी तिथि यदि श्रवण नक्षत्र से युक्त हो तो उसे विजया तिथि कहते हैं, वह भक्तों को विजय प्रदान करनेवाली है । एक बार दैत्यराज बलि से पराजित होकर सभी देवता भगवान् विष्णु की शरण में पहुँचे और कहने लगे — ‘प्रभो ! सभी देवताओं के एकमात्र आश्रय आप ही हैं । आप महान् कष्ट से हमारा उद्धार कीजिये । om, ॐइस दैत्य बलि का आप विनाश कीजिये ।’ इसपर भगवान् ने कहा- ‘देवगणो ! मैं यह जानता हूँ कि विरोचन-पुत्र बलि तीनों लोकों का कण्टक बना हुआ है, पर उसने तपस्या द्वारा अपनी आत्मा की अपने में भावना कर ली हैं, वह शान्त हैं, जितेन्द्रिय हैं और मेरा भक्त है, उसके प्राण मुझमें ही लगे हैं, वह सत्यप्रतिज्ञ है । बहुत दिनों के बाद उसकी तपस्या का अन्त होगा । जब मैं इसे अविनयसम्पन्न समझेूँगा, तब उसका अभीष्ट हरण कर लूँगा और आपको दे दूँगा । पुत्र की इच्छा से देवमाता अदिति भी मेरे पास आयी थीं । देवताओ ! मैं उनका भी कल्याण करूँगा, अवतार लेकर देवताओं का संरक्षण और असुरों का विनाश करूँगा । इसलिये आपलोग निश्चिन्त होकर जायें और समय की प्रतीक्षा करें । देवगण भगवान् विष्णु को स्मरण करते हुए वापस आ गये । इधर अदिति भी भगवान् विष्णु का ध्यान करती थीं । कुछ काल में उसने गर्भ में भगवान् को धारण किया । नवें मास में वामन भगवान् अदिति के गर्भ से प्रादुर्भूत हुए । उनके पैर छोटे, शरीर छोटा, सिर बड़ा और छोटे बच्चे के समान हाथ-पैर, उदर आदि थे । वामनरूप में जब अदिति ने पुत्र को देखा और जब वह कुछ कहने को उद्यत हुई तो देवमाया से उनकी वाणी अवरुद्ध हो गयी ।

हे नरोत्तम ! भाद्रपद मास के श्रवण नक्षत्र से युक्त एकादशी तिथि में जब त्रिविक्रम वामन भगवान् का पृथ्वी पर अवतार हुआ तब पृथ्वी डगमगाने लगी । दैत्यों में भय छा गया और देवगण प्रसन्न हो गये । महामुनि कश्यप ने शिशु के जातकर्मादि संस्कार स्वयं ही किये । वामन भगवान् दण्ड, मेखला, यज्ञोपवीत, कमण्डलु तथा छत्र धारणकर राजा बलि के यज्ञस्थल में गये । उन्होंने बलि से कहा — ‘यज्ञपते ! मुझे तीन पग भूमि प्रदान करो ।’ बलि ने कहा — ‘मैंने दे दिया ।’ उसी समय भगवान् वामन ने अपना शरीर बढ़ाना प्रारम्भ किया । भगवान् ने अपना शरीर इतना विशाल बना लिया कि एक पग से सम्पूर्ण पृथ्वीलोक को नाप लिया तथा द्वितीय पग से ब्रह्मलोक नाप लिया । तीसरा पग रखने के लिये जब कोई स्थान न मिला तो देवगण, सिद्ध, ऋषि-मुनि इस कृत्य को देखकर साधु-साधु कहने लगे और भगवान् की स्तुति करने लगे । तदनन्तर सभी दैत्यगणों को जीतकर उन्होंने दैत्यराज बलि से कहा — ‘तुम अपने परिजनों के साथ सुतललोक में चले जाओ । मेरे द्वारा सुरक्षित रहकर तुम वहाँ अभीप्सित भाग का उपभोग करोगे । वर्तमान में जो इन्द्र है, उनके बाद तुम इन्द्रत्व को प्राप्त करोगे ।’ बलि भगवान् को प्रणाम कर प्रसन्न हो सुतललोक को चला गया । भगवान् ने देवताओं से कहा — ‘आपलोग अपने-अपने स्थान पर निश्चिन्त होकर रहें । भगवान् भी संसार का कल्याण करके वहीं अन्तर्धान हो गये ।

राजन् ! ये सभी कर्म एकादशी तिथि को हुए थे । अतः यह तिथि देवताओं की विजयतिथि मानी गयी है । यही एकादशी तिथि फाल्गुन मास में पुष्य नक्षत्र से युक्त होने पर विजया तिथि कही गयी है । एकादशी के दिन उपवास कर रात्रि में भगवान् वामन की प्रतिमा बनाकर पूजा करनी चाहिये । प्रतिमा के समीप ही कुण्डिका, छत्र, चरणपादुका, यष्टि, यज्ञोपवीत, कमण्डलु तथा मृगचर्म आदि स्थापित करना चाहिये । अनन्तर विधिवत् उनकी पूजा करनी चाहिये । निम्न मन्त्रों से उन्हें पूजा व नमस्कार करे और प्रार्थना करे —

स्नान मन्त्र
ॐ जलजोपमदेहाय जलजास्याय शंखिने ।
जलराशिस्वरूपाय नमस्ते पुरुषोत्तम ॥ ३७
नमः कमलनाभाय नमस्ते जलशायिने ।
नमस्ते केशवानंत वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥ ३८

चन्दन अर्पण मन्त्र
मलयेषु सगुत्पन्नं गन्धाढ्यं सुमनोहरम् ।
मया निदेदितं तुभ्यं गृहाण परमेश्वर ॥३९

पुष्प अर्पण मन्त्र
वनस्पतिसमुत्पन्नं गन्धाढ्यं सुमनोहरम् ।
मया निवेदितं पुष्पं गृहाण पुरुषोत्तम ॥४०

पूजा मन्त्र
नमः कमलकिंजल्कपीतनिर्मलवाससे ।
मनोहरवपुःस्कन्धधृतचक्राय शार्ङ्गिणे ॥४१

सर्वाङ्ग पूजा मन्त्र
मत्स्यः कूर्मो वराहश्च नारसिंहश्च वामनः ।
रामो रामश्च कृष्णश्च नामभिर्वामनाय ते ॥४२

धूप मन्त्र
धूपोऽयं देवदेवेश शङ्खचक्रगदाधर ।
अच्युतानंत गोविन्द दासुदेव नमोऽस्तु ते ॥४३

दीप मन्त्र
त्वमेव पृथिवी ज्योतिर्वायुराकाशमेव च ।
त्वमेव ज्योतिषां ज्योतिर्दिपोऽयं प्रतिगृह्यताम् ॥४४

नैवेद्य मन्त्र
अन्नं चतुर्विधं स्वादु रसैः षड्भिः समन्वितम् ।
भक्ष्यभोज्यसमायुक्तं प्रसीद परमेश्वर ॥४५
अन्नं प्रजापतिर्विष्णुरुदेंन्द्रशशिभास्कराः ।
अन्नं त्वष्टा यमोऽग्निश्च पापं हरतु मेऽव्ययः ॥४६

प्रीणन मंत्र
जगदादिर्जगद्रूपमनादिर्जगदन्तकृत् ।
जलाशयो जगद्योनिः प्रीयतां मे जनार्दनः ॥४७

नमस्कार मन्त्र
अनेक-कर्म-निर्बन्ध-ध्वंसिने जलशायिनम् ।
नतोऽस्मि मधुरावासं माधवं मधुसूदनम् ॥४८
नमो वामनरूपाय नमस्तेऽस्तु त्रिविक्रम ।
नमस्ते मणिबन्धाय वासुदेव नमोऽस्तु ते ॥४९

प्रार्थना मन्त्र
नमो नमस्ते गोविन्द वामनेश त्रिविक्रम ॥५०
अघौघसंक्षयं कृत्वा सर्वकामप्रदो भव ॥५१

शयन मन्त्र
सर्वगः सर्वदेवेशः श्रीधरः श्रीनिकेतनः ।
विश्वेश्वरश्च विष्णुश्च श्रीशाय च नमोनमः ॥५२
(उत्तरपर्व ७६ । ३७ -५२)

इसके अनन्तर भगवान् को शयन कराये । गीत-वाद्य, स्तुति आदि के द्वारा जागरण करे । प्रातःकाल उस प्रतिमा की पूजाकर मन्त्रपूर्वक उसे ब्राह्मण को निवेदित कर दे । ब्राह्मणों को भोजन कराकर स्वयं भी मौन होकर भोजन करे । इस व्रत के करने से व्रती का एक मन्वन्तरपर्यन्त विष्णुलोक में वास होता है, तदनन्तर वह इस लोक में आकर चक्रवर्ती दानी राजा होता है । वह नीरोग, दीर्घायु एवं पुत्रवान् होता है ।
(अध्याय ७६)

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