भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय ८
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय ८
तिलकव्रत के माहात्म्य में चित्रलेखा का चरित्र
(संवत्सर-प्रतिपदा का कृत्य)

राजा युधिष्ठिर ने पूछा — भगवन ! ब्रह्मा, विष्णु, शिव, गौरी, गणपति, दुर्गा, सोम, अग्नि तथा सूर्य आदि देवताओं के व्रत शास्त्रों में निर्दिष्ट हैं, उन व्रतों का वर्णन आप पतिपदादि क्रम से करें । जिस देवता की जो तिथि है तथा जिस तिथि में जो कर्तव्य है, उसे आप पूरी तरह बतलायें ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाराज ! चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की जो प्रतिपदा होती है, उस दिन स्त्री अथवा पुरुष नदी, तालाब या घर पर स्नान कर देवता और पितरों का तर्पण करें ।om, ॐ फिर घर आकर आटे की पुरुषाकर संवत्सर की मूर्ति बनाकर चन्दन, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य आदि उपचारों से उसकी पूजा करें । ऋतु तथा मासों का उच्चारण करते हुए पूजन तथा प्रणाम कर संवत्सर की प्रार्थना करे और –

‘संवत्सरोऽसि परिवत्सरोऽसीदावत्सरोऽसीद्वत्सरोऽसि वत्सरोऽसि ।
उषसस् ते कल्पन्तामहोरात्रास् ते कल्पन्ताम् अर्धमासास् ते कल्पन्तां मासास् ते
कल्पन्ताम् ऋतवस् ते कल्पन्ताम् संवत्सरस्ते कल्पताम् ।
प्रेत्या ऽएत्यै सं चाञ्च प्र च सारय ।
सुपर्णचिद् असि तया देवतयाऽङ्गिरस्वद् ध्रुवः सीद ॥’
(यजु० २७ । ४५)

यह मन्त्र पढकर वस्त्र से प्रतिमा को वेष्टित करे । तदनन्तर फल, पुष्प, मोदक आदि नैवेद्य चढाकर हाथ जोडकर प्रार्थना करे – ‘भगवान् ! आपके अनुग्रह से मेरा वर्ष सुखपूर्वक व्यतीत हो ।’ यह कहकर यथाशक्ति ब्राह्मण को दक्षिणा दे और उसी दिन से आरम्भ कर ललाट को नित्य चन्दन से अलंकृत करे । इस प्रकार स्त्री या पुरुष इस व्रत के प्रभाव से उत्तम फल प्राप्त करते हैं । भुत, प्रेत, पिशाच, ग्रह, डाकिनी और शत्रु उसके मस्तक में तिलक देखते ही भाग खड़े होते हैं ।

इस सम्बन्ध में मैं एक इतिहास कहता हूँ – पूर्व काल मे शत्रुञ्जय नाम के एक राजा थे और चित्रलेखा नाम की अत्यन्त सदाचारिणी उनकी पत्नी थी । उसी ने सर्वप्रथम ब्राह्मणों से संकल्पपूर्वक इस व्रत को ग्रहण किया था । इसके प्रभाव से बहुत अवस्था बीतने पर उनको एक पुत्र हुआ । उसके जन्म से उनको बहुत आनन्द प्राप्त हुआ । वह रानी सदा संवत्सरव्रत किया करती और नित्य ही मस्तक में तिलक लगाती । जो उसको तिरस्कृत करने की इच्छा से उसके पास आता, वह उसके तिलक को देखकर पराभूत-सा हो जाता । कुछ समय के बाद राजा को उन्मत्त हाथी ने मार डाला और उनका बालक भी सिर की पीड़ा से मर गया । तब रानी अति शोकाकुल हुई । धर्मराज के किंकर (यमदूत) — उन्हें लेने के लिये आये । उन्होंने देखा कि तिलक लगाये चित्रलेखा रानी समीप में बैठी है । उसको देखते ही वे उलटे लौट गये । यमदूतों के चले जाने पर राजा अपने पुत्र के साथ स्वस्थ हो गया और पुर्वकर्मानुसार शुभ भोगों का उपयोग करने लगा । महाराज ! इस परम उत्तम व्रत का पूर्वकाल में भगवान् शंकर ने मुझे उपदेश किया था आर हमने आपको सुनाया । यह तिलकव्रत समस्त दुःखों को हरनेवाला है । इस व्रत को जो भक्तिपूर्वक करता है, वह चिरकालपर्यन्त संसार का सुख भोगकर अन्त में ब्रह्मलोक को प्राप्त होता है ।
(अध्याय ८)

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