भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १०१
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय १०१
युगादि तिथियों की विधि

राजा युधिष्ठिर ने पूछा — भगवन् ! आप उन तिथियों का वर्णन करें, जिनमें स्वल्प भी किया गया स्नान, दान, जप आदि पुण्यकर्म अक्षय हो जाते हैं और महान् धर्म तथा शुभ फल प्राप्त होता है ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाराज ! मैं आपने अत्यन्त रहस्य की बात बताता हूँ, जिसे आजतक मैंने किसी से नहीं कहा था । वैशाख मास के शुक्ल पक्ष की तृतीया, कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी, भाद्रपद मास कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी और माघ की पूर्णिमा ये चारों युगादि तिथियाँ हैं ।om, ॐ अर्थात् इन तिथियों में क्रमशः सत्य, त्रेता, द्वापर तथा कलि— चारों युग का प्रारम्भ हुआ है । इन तिथियों को उपवास, तप, दान, जप, होम आदि करने से कोटि गुना पुण्य प्राप्त होता है । वैशाख शुक्ल तृतीया को गन्ध, पुष्प, धूप, दीप, नैवेद्य, वस्त्राभूषणादि से लक्ष्मीसहित नारायण का पूजन कर सवत्सा लवण-धेनु का दान करना चाहिये । कार्तिक मास के शुक्ल पक्ष की नवमी को नदी, तड़ाग आदि में स्नान कर पुष्प, धूप, नैवेद्य आदि उपचारों से उमा के साथ नीलकण्ठ भगवान् शंकर की पूजा कर तिल-धेनु का दान करना चाहिये । भाद्रपद कृष्ण त्रयोदशी को पितृ-तर्पण कर शहद और घृतयुक्त अनेक प्रका रके पक्वान्नों से ब्राह्मण-भोजन कराये तथा दूध देनेवाली सुन्दर सुपुष्ट सवत्सा प्रत्यक्ष गौ ब्राह्मणों को दान करना चाहिये । माघ-पूर्णिमा को गायत्रीसहित ब्रह्माजी का पूजन कर सुवर्ण, वस्त्र अनेक प्रकार के फलों सहित नवनीत-घेनु का दान करना चाहिये ।

राजन् ! इस प्रकार दान करनेवालों को तीनों लोकों में किसी वस्तु को अभाव नहीं होता । इन युगादि तिथियों में जो दान दिया जाता है वह अक्षय होता है । निर्धन हो तो थोड़ा-थोड़ा ही दान करे, उसका भी अनन्त पुण्य प्राप्त होता है । वित्त के अनुसार शय्या, आसन, छतरी, जूता, वस्त्र, सुवर्ण, भोजन आदि ब्राह्मणों को देना चाहिये । इन तिथियों में यथाशक्ति ब्राह्मणों को भोजन भी कराये । अनन्त्तर प्रसन्न-मन से बन्धु-बान्धवों के साथ मौन हो स्वयं भी भोजन करे । युगादि तिथियों में दान-पूजन आदि करने से कायिक, वाचिक और मानसिक सभी प्रकार के पाप नष्ट हो जाते हैं और दाता अक्षय स्वर्ग प्राप्त करता है ।
(अध्याय १०१)

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