भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय ११
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)
अध्याय ११
कोकिलाव्रत का विधान और माहात्म्य

राजा युधिष्ठिरने पूछा— भगवन् ! जिस व्रत के करने से कुलीन स्त्रियों का अपने पति के साथ परस्पर विशुद्ध प्रेम बना रहे, उसे आप बतलाइये ।

भगवान् श्रीकृष्ण बोले — महाराज ! यमुना के तट पर मथुरा नामक एक सुन्दर नगरी है । वहाँ श्रीरामचन्द्रजी ने अपने भाई शत्रुघ्न को राजा के पद पर प्रतिष्ठित किया था ।om, ॐ उनकी रानी का नाम कीर्तिमाला था (सभी रामायण में शत्रुघ्न पत्नी का नाम श्रुतिकीर्ति प्राप्त होता है, लेकिन भाव प्रायः समान है ।) । वह बड़ी पतिव्रता थी । एक दिन कीर्तिमाला ने अपने कुलगुरु, वसिष्ठमुनि से प्रणामकर पूछा — ‘मुनिश्रेष्ठ ! आप मुझे कोई ऐसा व्रत बतायें, जिससे मेरे अखण्ड सौभाग्य की वृद्धि हो ।’वसिष्ठजी ने कहा — कीर्तिमाले ! कल्याण-कामिनी स्त्री आषाढ़ मास की पूर्णिमा को सायंकाल यह संकल्प करे कि ‘श्रावण मास भर नित्य-स्नान, रात्रि-भोजन और भूमि-शयन करूँगी तथा ब्रह्मचर्य से रहूँगी और प्राणियों पर दया करूँगी ।’ प्रातः उठकर सब सामग्री लेकर नदी, तालाब आदि पर जाय । वहाँ दन्तधावन कर सुन्गधित द्रव्य, तिल और आँवले का उबटन लगाये और विधि से स्नान करे । इस प्रकार आठ दिन तक स्नान करे । अनन्तर सर्वौषधियों का उबटन लगाकर आठ दिन तक स्नान करें । शेष दिनों में वच का उबटन मलकर स्नान करे । तदनन्तर सूर्यभगवान् का ध्यान करे । इसके बाद तिल पीस करके उससे कोकिला पक्षी की मूर्ति बनाये । रक्तचन्दन, चम्पा के पुष्प, पत्र, धूप, दीप, नैवेद्य, तिल, चावल, दूर्वा आदि से उसका पूजनकर इस मन्त्र से प्रार्थना करे –

“तिलसहे तिलसौख्ये तिलवर्णे तिलप्रिये ।
सौभाग्यद्रव्यपुत्रांश्व देहि में कोकिले नमः ॥
(उत्तरपर्व ११ । १४)

‘तिलसहे कोकिला देवि ! आप तिल के समान कृष्णवर्णवाली हैं । आपको तिल से सुख प्राप्त होता है तथा आपको तिल अत्यन्त प्रिय हैं । आप मुझे सौभाग्य, सम्पत्ति तथा पुत्र प्रदान करें । आपको नमस्कार है ।’

इस प्रकार पूजन कर घर में आकर भोजन ग्रहण करे । इस विधि से एक मास व्रतकर अन्त में तिलपिष्ट की कोकिला बनाकर उसमें रत्न के नेत्र और सुवर्ण के पंख लगाकर ताम्रपात्र में स्थापित करे । दक्षिणा सहित वस्त्र, धान्य और गुड़, ससुर, दैवज्ञ, पुरोहित अथवा किसी ब्राह्मण को दान करे ।

इस विधि से जो नारी कोकिलाव्रत करती है, वह सात जन्म तक सौभाग्यवती रहती है और अन्त में उत्तम विमान में बैठकर गौरीलोक को जाती है । वसिष्ठ जी से व्रत का विधान सुनकर कीर्तिमाला ने उसी प्रकार कोकिलाव्रत का अनुष्ठान किया । उससे उन्हें अखण्ड सौभाग्य, पुत्र, सुख-समृद्धि और शत्रुघ्न जी की कृपा एवं प्रीति प्राप्त हुई । अन्य भी जो स्त्रियाँ इस व्रत को भक्तिपूर्वक करती है उन्हें भी सुख, सौभाग्य आदि की प्राप्ति होती है ।
(अध्याय ११)

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