भविष्यपुराण – उत्तरपर्व – अध्याय १
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(उत्तरपर्व)

अध्याय १

महाराज युधिष्ठिर के पास व्यासादि महर्षियों का आगमन एवं उनसे उपदेश करने के लिये युधिष्ठिर की प्रार्थना

कल्याणानि ददातु वो गणपतिर्यस्मिन्नतुष्टे सति
क्षोदीयस्यपि कर्मणि प्रभवितुं ब्रह्मापि जिह्यायते ।
भेजे यश्चरणारविन्दमसकृत्सौभाग्यभाग्योदयै-
स्तेनैषा जगति प्रसिद्धिमगमददेवेन्दलक्ष्मीरपि ॥
शश्वत्पूण्यहिरण्यगर्भरसनासिंहासनाध्यासिनी
सेयं वागधिदेवता वितरतु श्रेयांसि भूयांसि वः ।
यत्पादामलकोमलाङ्गुलिनखज्योत्स्राभिरुद्वेल्लितः
शब्दब्रह्मसुधाम्बुधिर्बुधमनस्युच्छृङ्खलं खेलति ॥
(उत्तरपर्व १ । १-२)om, ॐ

‘जिनकी प्रसन्नता के बिना ब्रह्मा भी एक क्षुद्रकार्य का सम्पादन नहीं कर सकते और जिनके चरणों के एक बार आश्रय लेने से देवेन्द्र का भाग्य चमक उठा तथा उन्हें अखण्ड राजलक्ष्मी की प्राप्ति हो गयी, वे भगवान् गणपतिदेव आप लोगों का कल्याण करें । जो ब्रह्मा के जिह्वाग्र भाग पर निरन्तर सिंहासनासीन रहती है और जिनके चरण-नख की चन्द्रिका से प्रकाशित होकर शब्दब्रह्म का समुद्र विद्वानों के हृदय पर नृत्य करता हैं, वे भगवती सरस्वती आप सब का अनन्त कल्याण करें ।’
शिवं ध्यात्वा हरिं स्तुत्वा प्रणम्य परमेष्ठिनम् ।’
चित्रभानुं च भानुं च नत्वा ग्रन्थमुदीरयेत् ॥ (उत्तरपर्व १ । ७)

‘भगवान् शंकर का ध्यान कर, भगवान् (विष्णु) कृष्ण की स्तुति कर और ब्रह्माजी को नमस्कार कर तथा सूर्यदेव एवं अग्निदेव को प्रणाम कर इस ग्रन्थ का वाचन करना चाहिये ।’

एक बार धर्म के पुत्र धर्मवेत्ता महाराज युधिष्ठिर को देखने की लिये व्यास, मार्कण्डेय, माण्डव्य, शाण्डिल्य, गौतम, शातातप, पराशर, भरद्वाज, शौनक, पुलस्त्य, पुलह तथा देवर्षि नारद आदि श्रेष्ठ ऋषिगण पधारे ।

उन महान तपस्वी एवं वेदवेदाङ्गपारंगत ऋषियों को देखकर भक्तिमान् राजा युधिष्ठिर ने अपने भाइयों के साथ प्रसन्नचित्त हो सिंहासन से उठकर भगवान् श्रीकृष्ण तथा पुरोहित धौम्य को आगे कर उनका अभिवादन किया और आचमन एवं पाद्यादि से उनकी पूजाकर आसन प्रदान किया । उन तपस्वियों के बैठनेपर विनय से अवनत हो महाराज युधिष्ठिर ने श्रीवेदव्यासजी से कहा —
‘भगवन ! आपके प्रसाद से मैंने यह महान राज्य प्राप्त किया तथा दुर्योधानादि को परास्त किया । किन्तु जैसे रोगीको सुख प्राप्त होनेपर भी वह सुख उसके लिये सुखकर नहीं होता, वैसे ही अपने बन्धु-बान्धवों को मारकर वह राज्य-सुख मुझे प्रिय नहीं लग रहा है । जो आनन्द वन में निवास करते हुए कन्द-मूल तथा फलों के भक्षण से प्राप्त होता है, वह सुख शत्रुओं को जीतकर सम्पूर्ण पृथ्वी का राज्य करनेपर भी नहीं होता । जो भीष्मपितामह हमारे गुरु, बन्धु, रक्षक, कल्याण और कवचस्वरुप थे, उन्हें भी मुझ—जैसे पापी ने राज्य के लोभ से मार डाला । मैंने बहुत विवेकशून्य कार्य किया हैं । मेरा मन पाप-पंक में लिप्त हो गया है । भगवन ! आप कृपाकर अपने ज्ञानरुपी जलसे मेरे अज्ञान तथा पाप-पंक को धोकर सर्वथा निर्मल बना दीजिये और अपने प्रज्ञारुपी दीपक से मेरा धर्मरुपी मार्ग प्रशस्त कीजिये । धर्म के संरक्षक ये मुनिगण कृपाकर यहाँ आये हुए हैं । गंगापुत्र महाराज भीष्मपितामह से मैंने अर्थशास्त्र, धर्मशास्त्र और मोक्षशास्त्र का विस्तार से श्रवण किया है । उन शान्तनुपुत्र भीष्म के स्वर्गलोक चले जानेपर अब श्रीकृष्ण और आप ही मैत्री एवं बन्धुता के कारण मेरे मार्गदर्शक हैं ।’

व्यासजी बोले – राजन ! आपको करने योग्य सभी बाते मैंने, पितामह भीष्म ने, महर्षि मार्कण्डेय, धौम्य और महामुनि लोमश ने बता दी हैं । आप धर्मज्ञ, गुणी, मेधावी तथा धीमान् पुरुषों के समान हैं, धर्म और अधर्म के निश्चय में कोई भी बात आपको अज्ञात नहीं है । हृषिकेश भगवान् श्रीकृष्ण के यहाँ उपस्थित रहते हुए धर्म का उपदेश करने का साहस कौन कर सकता है ? क्योंकि ये ही संसार की सृष्टि, स्थिति तथा पालन करते हैं एवं प्रत्यक्षदर्शी हैं । अतः ये ही आपको उपदेश करेंगे । इतना कहकर तथा पाण्डवों की पूजा ग्रहणकर बादरायण व्यासजी तपोवन चले गये ।
(अध्याय १)

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