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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १४
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — द्वितीय भाग)
अध्याय – १४
चन्द्रावलीकथा

सूत जी बोले — भृगुवर्य, महाभाग ! वैताल ने राजा से कहा — राजन् ! पुष्पावती नामक रमणीक नगरी में सुविचार नामक राजा राज करता था । वह प्रजाओं के पालन-पोषण में सदैव कटिबद्ध रहता था । रूप-यौवन सम्पन्न चन्द्रप्रभा नामक उसकी पत्नी थी । उस रानी से चन्द्रावती नामक एक पुत्री उत्पन्न हुई । एक बार वह अपनी सखियों समेत एक जंगल में गई, जहाँ भाँति-भाँति के पुष्प सुशोभित हो रहे थे । वहाँ सुदेव नामक ब्राह्मण को देखकर वह मुग्ध हो गई और वह ब्राह्मण भी मोहित होकर पृथिवी पर गिर पड़ा । काम के बाणों से पीड़ित होकर निर्जीव की भाँति वह दिखाई देता था । उस कुमारी के घर चले जाने पर मूलदेव और शशी नामक दो ब्राह्मण उस ब्राह्मण के दरवाजे पर आये ।om, ॐ रूप-यौवन सम्पन्न उस ब्राह्मण को देखकर उसके मोहित होने का कारण उन्होंने पूँछा । उसने रुदन करके सभी वृत्तान्त कह सुनाया । वह दयालुमूलदेव अपने घर आकर चामुण्डा देवी के बीज समेत मंत्र का जप करके दो गुटिका बनाकर सुदेव को दे दिया । उसके द्वारा उनमें से एक बारह वर्ष की सुन्दरी कन्या और दूसरा मूलदेव अत्यन्त वृद्ध का रूप धारण करके राज दरबार में पहुँचे । वहाँ आशीर्वाद प्रदान कर राजा का सम्मान प्रकट किया । महामते ! उनके वहाँ प्रविष्ट होने का कारण भी सुनो !

उसने कहा — राजन् ! तांत्रिक नगर में मेरा एक सौन्दर्यपूर्ण गृह है। वहाँ के विलापध्वज नामक राजा बलात् मेरे घर को लुटवाना चाहता था, इससे मेरे घर के दोनों पुत्र और पत्नी घर से न जाने कहाँ चले गये । मैं उन दोनों पुत्र एवं पत्नी को ढूंढने आया हूँ । महाराज ! यह मेरी पुत्रवधू है । जब तक मैं न आऊँ अपने गृह में इसकी धर्मपूर्वक रक्षा कीजिये । इसको सुनकर राजा ने अपनी पुत्री को बुलाकर उसे उस वधू को सौंप दिया और वह ब्राह्मण भी अपने घर चला गया ।

आधी रात के समय उस रमणी ने राजकन्या से कहा — सखि ! तुम्हारा मुख म्लान क्यों है, मुझे सत्य बताओ !

उसने कहा — मेरे हृदय में सुदेव नामक ब्राह्मण नित्य निवास करता है, अतः सखे ! उसी के वियोग-व्यथा से पीड़ित रहती हूँ ।

उसने कहा — सुभ्र ! यदि मैं उस श्रेष्ठ ब्राह्मण सुदेव को तुम्हारे पास पहुँचा दें, तो मुझे क्या (पुरस्कार) दे सकोगी ।

उसने कहा — द्विजभामिनी ! मैं तुम्हारी सर्वदा दासी रहूँगी ।

यह सुनकर उसने अपने मुख से उस यंत्र को निकालकर पूर्व शरीर की प्राप्ति की और उसके साथ रमण करना आरम्भ किया । नृप ! वह कुमारी चारमास की गर्भवती हो गई । उस समय मंत्री का पुत्र उस ब्राह्मण पत्नी को देखकर मोहित हो गया था । उस मंत्री पुत्र मदनालस को निष्प्राण होने की भाँति देखकर मंत्री के स्नेहवश राजा ने हृदय में विचारते हुए पण्डितों की सम्मति से उस मंत्र सम्भूत नारी को उसे समर्पित कर दिया ।

अनन्तर उस ब्राह्मण स्त्री ने उससे कहा — अमात्य पुत्र ! तीन मास तक आप तीर्थों में स्नान करते हुए मेरे अनुरूप योग्य होने का प्रयत्न कीजिये । उसे स्वीकार कर मंत्री पुत्र मदनलालस ने विनम्रतया तीर्थयात्रा के लिए प्रस्थान किया । पश्चात् उस कामुक ने उसकी पत्नी का जो रानी के समान सुन्दरी एवं कामपीड़ित थी, उपभोग करके उसे भी दो मास की गर्भवती बना दिया । पश्चात् मनुष्यरूप धारणकर उसने मूलदेव के घर पहुँचकर उनसे सम्पूर्ण वृत्तान्त कह सुनाया । प्रसन्न होकर मूल देव ने उस शशी नामक मित्र को बीस वर्ष का युवक और स्वयं वृद्ध का रूप धारणकर राजा के पास पहुँचा ।

उन्होंने कहा — भूपते ! मेरी पुत्रवधू प्रदान कीजिये ।

उस समय भयभीत होकर राजा ने नम्रता पूर्वक कहा — राजकर नामक मंत्री का पुत्र मदनलालस उस अधिक सुन्दरी वधू को देखकर मोहित हो गया था । उसके लिए उसे मरणासन्न देखकर मंत्री ने अपने पुत्र के वियोग का कारण मुझसे कहा मैंने वृद्ध ब्राह्मणों की आज्ञा प्राप्तकर उसे उसको सौंप दिया । अब आप जिस भाँति प्रसन्न हो सके मुझे आदेश दें । मूलदेव ने विषपूर्ण शब्दों को उच्चारण करते हुए कहा — राजन् ! मेरे पुत्र के सुखार्थ आप अपनी कन्या प्रदान करें । उसे स्वीकार करके राजा ने चन्द्रावली नाम अपनी पुत्री को अनेक भाँति के द्रव्यों समेत वैदिक विधान द्वारा उन्हें प्रदानकर उपस्थित ब्रह्मदोष से मुक्त होकर राज्य का उपभोग किया ।

शशी राजकन्या को साथ लेकर अपने घर चला गया । उस समय सुदेव ने दुःखी होकर मूलदेव से कहा — यह राजपुत्री मेरे उपभोगार्थ है । उसे सुनकर मूलदेव ने आश्चर्य प्रकट करते हुए वैसा ही किया ।

इतना कहकर रुद्रसेवक वैताल ने राजा से कहा — धर्मतः राजकन्या किसे प्राप्त होनी चाहिए मुझे बताने की कृपा कीजिये ।

राजा ने कहा — माता-पिता की आज्ञा प्राप्तकर कन्या देवों के सम्मुख उपस्थित होकर जिसके लिए निवेदित की जाती है, वह धर्मतः सदैव उसी के योग्य रहती है । देव ! शास्त्रों में स्त्रियों को सदैव रत्नरूप बताया गया है, जिस प्रकार पार्थिव क्षेत्रों (खेतों) में बीज का आरोपण किसी दूसरे के द्वारा होने पर वह क्षेत्र किसान का ही रह जाता है, बीज बोने वाले का नहीं । उसी प्रकार राजपुत्री शशी का ही वरण करेगी और उसका गर्भस्थित पुत्र सुदेव को प्राप्त होना चाहिए । देव ! इस प्रकार मैंने शास्त्र विहित नियमों की व्याख्या कर दी ।

उसने पुनः राजा से कहा — पश्चात् मंत्रिपुत्र ने क्या किया, मुझसे बताइये । ऐसा सुनकर उन्होंने कहा — मंत्रीपुत्र मदनलालस ने वृन्दावन में पहुँचकर बहुलाष्टमी के दिन राधा कुण्ड में स्नान किया । नृपसत्तम ! उसी पुण्य के प्रभाव से उसका वह पाप, जिसके द्वारा वह मोहित हुआ था, भस्म हो गया । उपरान्त अपने हृदय में गोविन्द जी का स्मरण करते हुए श्लक्ष्णवाणी से उनकी स्तुति की ।

मदनलालस ने कहा — हे कृष्णदेव ! सागर रूप इस विश्व का विस्तार आप ने ही किया है, अतः आप दयासिंधु को नमस्कार है, तथा देवदेव ! अपनी लीला के निमित्त आप एकाकी इसकी रचना करके अपनी प्रेयसी राधा जी के समेत इसकी रक्षा करते हैं, और अन्त समय में आप ही कालमूत होकर इस विश्व का संहार करते हैं, अतः तुम्हें बार-बार नमस्कार है । हृषीकेश ! मेरी बुद्धि की शुद्धि जिस प्रकार हो सके शीघ्रतया वही आप करें । इस स्तोत्र के प्रभाव से देवाधिदेव द्वारा उसकी बुद्धि कामपाश से मुक्त हो गई ।

पश्चात् वह क्षत्रीय अपने घर आया । नृप ! अपनी पत्नी का आलिङ्गन करके वह अत्यन्त हर्षित हुआ । उस बुद्धिमान् ने अपने हृदय में विप्रदोष द्वारा विनाश की कल्पना करके उनके प्रसन्नार्थ सुदेव ब्राह्मण को बुलाकर प्रसन्न मुद्रा समेत अपनी भगिनी का पाणिग्रहण उनके साथ कर दिया । सुदेव ने कामकिंकर होने के नाते उसकी मदोन्मत्त भगिनी का पाणिग्रहण धर्मतः सुसम्पन्न करके अपने घर के लिए प्रस्थान किया । इस प्रकार राजा का चरित्र और उस बुद्धिमान् मूलदेव की कथा के बाद अन्य को कथा कहकर बात समाप्त किया ।
(अध्याय १४)

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १९ से २१
3. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १९ से २१

4. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय – अध्याय २०
5. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय ७
6. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १
7. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २
8. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ३
9. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ४
10. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ५
11. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ६
12. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ७
13. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ८
14. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ९
15. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १०
16. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ११
17. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १२
18. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १३

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