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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १७
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — द्वितीय भाग)
अध्याय – १७
गुणाकराख्यद्विजसुत -यक्षिणीकथा

सूत जी बोले — उस ब्राह्मण रूपधारी वैताल ने पुनः राजा से कहा — राजन् महाभाग ! मैं तुम्हें मनोहर कथा सुना रहा हूँ सुनो —
महाभाग ! उज्जयिनी नगर में महासेन नामक राजा रहता था । उसी के राज्य में देव शर्मा नामक ब्राह्मण निवास करता था ऐसा बताया जाता है । गुणाकर नामक उसी का पुत्र था । om, ॐनित्य मद्य-मांस का सेवन करता था । उस पापी ने द्युत (जूए) खेलकर अपना सम्पूर्ण धन नष्ट कर दिया । पश्चात् बन्धुओं द्वारा त्याग करने पर पृथ्वी पर चारों ओर घूमने लगा । एक बार वह दैवयोग से सिद्धाश्रम में पहुँच गया ।
वहाँ कपर्दी नामक योगी रहता था । उसने कपाल में अन्न रखकर उससे उस अतिथि की सेवा करनी चाही, किन्तु उसे पिशाच का पुत्र समझकर उसने भूखा रहने पर भी उसका ग्रहण नहीं किया । पश्चात् उसने उसकी आथित्य सेवा के निमित्त यक्षिणी का आह्वान किया । उस रात्रि ब्राह्मण ने उसके साथ शयनादि करके महान, आनन्द की प्राप्ति की। प्रातःकाल होने पर वह यक्षिणी कैलास पर्वत पर चली गई । उपरांत उसके वियोग से दुःखी होकर वह उस योगी के पास गया । कपर्दी ने उसे यक्षिणी का आकर्षण करने वाली विद्या प्रदान किया। मध्य रात्रि में वह जल के भीतर जाकर उस शुभ मंत्र का जप करने लगा । इस प्रकार चालीस दिन तक उस मंत्र का जप करने पर भी वह यक्षिणी की प्राप्ति न कर सका।

उस समय योगी की आज्ञा प्राप्तकर वह ब्राह्मण माया-मोह के त्याग पूर्वक अपने माता पिता का अभिवादन करके प्रातःकाल संन्यासी का वेष धारण करके रोते कलपते अपने परिवारों को छोड़कर प्रतिबोधि वन में चला गया । वहाँ उनके शिष्य होने के उपरांत पंचाग्नि के मध्य में स्थित होकर आचरण पूर्वक वह उस मंत्र का जप करने लगा वहां भी योगिनी की प्राप्ति न होने पर उसे चिंता होने लगी।

इतना कहकर वैताल ने ज्ञाननिपुण राजा से कहा —उसे वह यक्षिणी देवी प्रेयसी के रूप में क्यों नहीं प्राप्त हुई !

इसे सुनकर राजा ने उस रुद्र सेवक वैताल से कहा — विप्र ! साधक को सिद्धि प्राप्ति करने के लिए तीन प्रकार का कर्म बताया गया है — मन और वाणी द्वारा किया गया कर्म परलोक में सुख प्रदान करता है, वाणी और शरीर द्वारा किये गये कर्म से शरीर सौन्दर्य और इसी जन्म में कुछ सिद्धि भी प्राप्त हो जाती है, मन और काय द्वारा किये गये कर्मवश परलोक में भुवलोक की प्राप्ति और अगले जन्म में राज्य की प्राप्ति होती है । मन, वाणी और शरीर द्वारा सुसम्पन्न किया गया कर्म इसी जन्म में सिद्धि तथा परलोक में परमसिद्धि की प्राप्ति प्रदान करता है । इसलिए साधकों को इस तीन प्रकार के कर्म को सुसम्पन्न करना चाहिए । उस ब्राह्मण ने दूसरे के धन का उपभोग करते हुए उस मंत्र का जप किया था । अतः उसे दूसरे जन्म में यक्षत्व की प्राप्ति होगी ।

सूत जी बोले-इतना कहने पर वह वैताल हर्षित होकर साधु, साधु कहते हुए उत्तम वाणी द्वारा उसका अत्यन्त सम्मान किया । उपरांत राजा के परीक्षार्थ इतिहास कहना पुनः आरम्भ किया।
(अध्याय १७)

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १९ से २१
3. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १९ से २१

4. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय – अध्याय २०
5. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय ७
6. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १
7. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २
8. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ३
9. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ४
10. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ५
11. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ६
12. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ७
13. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ८
14. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ९
15. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १०
16. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ११
17. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १२
18. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १३
19. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १४
20. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १५
21. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १६

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