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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १८
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — द्वितीय भाग)
अध्याय – १८
मोहिनीनामकचोरविप्रपत्नी-चोरपिण्ड कथा

सूतजी बोले  —  शौनक, महाप्राज्ञ ! वैताल ने राजा से कहा-कम्बल नगर में सूदक्ष नामक राजा रहता था, जो न्यायी, धार्मिक, शूर, दानी एवं शिव जी का उपासक था। उसकी राजधानी में धनाध्यक्ष नामक वैश्य रहता था, उसकी धनवती नामक परमसुन्दरी कन्या थी। उस रमणीक कन्या को उसके पिता ने गौरीदत्त वैश्य को प्रदान कर दिया। कुछ समय के अनन्तर मोहिनी नामक कन्या उससे उत्पन्न हुई। उसकी बारहवर्ष की अवस्था होने पर उसके पिता का निधन हो गया। om, ॐउस समय धनवती पति के निधन होने के नाते निर्धनावस्था में अपनी कन्या समेत अपने पिता के यहाँ जा रही थी । अंधेरी रात में उसे मार्ग में न्याय शर्मा नामक एक ब्राह्मण मिला, जिसे किसी ब्राह्मण का सर्वस्व का अपहरण करने पर भी अपने नाम की सत्यता के नाते उसे शूली हुई और उसका निधन नहीं हुआ (अर्थात् उसके धन का हरण भी नहीं किया गया) । अकस्मात् उसकी पुत्री उसके पास जाकर अपने हाथ से उसके चरण स्पर्श किया कि वह अत्यन्त दु:खी होकर हा राम कृष्ण’ प्रद्युम्न एवं अनिरूद्ध ! इन्हीं नामों का बार-बार उच्चारण करते हुए रुदन करने लगा ।
उसे सुनकर वह दीन-कृपणा धनवती उसके समीप जाकर कहने लगी-आप कौन हैं ?

ब्राह्मण ने कहा-मैं ब्राह्मण हूँ किन्तु तीन दिन से मेरे मन में अत्यन्त पीड़ा हो रही है, यदि इस कन्या को मुझे अर्पित कर दो तो मैं तुम्हें कोटि सुवर्ण प्रदान करूंगा। यह सुनकर धनदती ने अपनी मोहिनी नामक पुत्री का विवाह संस्कार उसके साथ सम्पन्न कर दिया। पश्चात् बरगद के नीचे पृथ्वी के भीतर सुरक्षित द्रव्य को खोदकर अपने घर चली आई।

मोहिनी ने अपने पति से कहा—दयानिधे आप तो मरणासन्न हो रहे हैं, मेरे पुत्र कैसे उत्पन्न होगा ।

ब्राह्मण ने कहा—प्रिये ! जब तुम्हें काम उत्पन्न हो तो तुम किसी पण्डित के पास पहुँचकर उसी द्वारा पुत्र को उत्पन्न करना ।

इतना कहकर वह ब्राह्मण मरणोपरांत यमलोक में पहुँच गया। वहाँ वह अपने किये हुए निन्दित कर्मों के परिणाम स्वरूप नारकीय यातनाओं का अनुभव करने लगा। अपनी माता के घर में रहकर वह मोहिनी यौवनावस्था प्राप्त होने पर भी अपने पति की प्रतिज्ञा का बार-बार स्मरण करके (अनुचितपथ से) रुक जाती थी । कौन भोग हैं, क्या आश्चर्य है, कौन जागरण करताहै, कौन शयन कर रहा है, पाप, व्याधि एवं दुःख, हृदय में रहकर कैसे उत्पन्न हो जाते हैं । इसी श्लोक का अर्थ वह ब्राह्मणों से पूछती थी, पर किसी ने उसका उत्तर न दिया । पश्चात् मेधावी नामक एक काश्मीर निवासी ब्राह्मण वहाँ आया।
मेधावी ने प्रसन्न होकर उस मोहिनी से कहा-सुन्दर ! इसका अर्थ मैं बता रहा हूँ, सुनो ! सुगंध, स्त्री, वस्त्र, ज्ञान, पेयपदार्थ, भोजन, शय्या और भूषण इन्हीं आठ प्रकार के भोग को विद्वानों ने बताया है। नित्य प्रति जीव मरते और उत्पन्न होते हैं, इसके लिए जो मोहित होता है विद्वानों ने उसे ही आश्चर्य बताया है । जो कोई विवेकपूर्वक कर्मशील होता है, वही विवेकी इस घोर अन्धकारपूर्ण संसार में जागरण करता है। संसार को अजगर की भाँति जानकर जो विरागी होकर उदासीनता एवं समाधिनिष्ठ होता है, वही मनुष्य सुखपूर्वक शयन करता है। संकल्प से नाम, काम से लोभ और लोभ से तृष्णा उत्पन्न होती है, जो इन्हें अपनाता है, उसे पापी कहा गया है, जो नरकप्रद है। जलप्रकृति से जिस रस की उत्पत्ति होती है, वही रस विकारी होता है, इस देह में उसी रसद्वारा अशुभ कर्म भय की उत्पत्ति होती है, उसे ही व्याधि कहा गया है। रुद्र द्वारा काली में लोक का अपहरण करने वाला मोह हृदय में उत्पन्न हुआ। उन्होंने पत्नी के लिए महादेवी की आराधना की, उससे सुरपूजित मिथ्या दृष्टि उत्पन्न हुई, जो मोह की प्रेयसी कही जाती है। उसी पत्नी से स्नेह और ममता की उत्पत्ति हुई। इन्हीं दोनों के संगम से शोकपूर्ण दुःख की उत्पत्ति हुई है।

इसे सुनकर वह उत्तमांगी मोहिनी मुग्ध हो गई। क्योंकि मानी, शूर, चतुर, अधिकारी, गुणवान् सखा तथा स्त्रीरक्षक पुरुष के वश में स्त्रियाँ सदैव रहती हैं । उस ब्राह्मण ने उसे गर्भवती करने के उपरांत उसका धन ग्रहण करके प्रस्थान किया । पश्चात् वह स्त्री भी उस गर्भ के द्वारा प्रतिदिन सुख का अनुभव करने लगी। दशवें मास के आरम्भ में शिव जी ने उस मोहिनी से कहा-महाराज ! वह स्वप्न की बातें वैसी ही सुसम्पन्न की । पालकी के भीतर एक सहस्र सुवर्ण संपन्न उस बालक को शयन कराकर राजा के दरवाजे पर जाकर उस पुत्र को वहीं रखकर स्वयं भी निद्रित हो गई। उसी समय शिव जी ने उस राजा को जो सुतार्थी एवं रुद्र का उपासक था उस बालक को अपनाने के लिए आदेश दिया।

मोहिनी के गर्भ से उत्पन्न उसे ब्राह्मण पुत्र को राजा ने अपना पुत्र बनाकर उसका जात संस्कार किया जिसमें अत्यन्त धन का व्यय किया गया । उसका नाम हरदत्त रखा गया। वह सम्पूर्ण विद्या का पारगामी हुआ। पिता के निधन होने पर उस राज्य का स्वामी होकर उसने धर्म का विस्तार किया । फल्गु नदी के तटपर उसने विधानपूर्वक गया का श्राद्ध आरम्भ किया। उस समय उस नदी में से तीन हाथ निकले जिसे देखकर उस राजा को महान्, आश्चर्य हुआ ।

इतना कहकर उस वैताल ने राजा से कहा-नृप ! उस पिंड का अधिकारी कौन हुआ।

इसे सुनकर राजा ने कहा-पण्डित तो द्रव्यार्थी थे, और राजा गुरु के समान होता है, अतः वह पिण्ड उस चोर को प्राप्त होना चाहिए, जिसकी मोहिनी स्त्री थी ।

सूत जी बोले-विप्र ! उस पिण्ड के प्रभाव से ब्राह्मण द्रव्य का अपहरण करने वाले उस चोर ब्राह्मण ने नरक से मुक्त होकर स्वर्ग की प्राप्ति की ।
(अध्याय १८)

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १९ से २१
3. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १९ से २१

4. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय – अध्याय २०
5. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय ७
6. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १
7. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २
8. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ३
9. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ४
10. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ५
11. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ६
12. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ७
13. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ८
14. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ९
15. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १०
16. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ११
17. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १२
18. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १३
19. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १४
20. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १५
21. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १६
22. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १७

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