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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २५
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — द्वितीय भाग)
अध्याय – २५
सत्यनारायण की व्रत-कथा में शतानन्द ब्राह्मण की कथा

सूतजी बोले — ऋषियों ! भगवान् नारायण ने स्वयं कृपापूर्वक देवर्षि नारदजी द्वारा जिस प्रकार इस व्रत का प्रचार किया, अब मैं उस कथा को कहता हूँ, आप लोग सुने —
लोकप्रसिद्ध काशी नगरी में एक श्रेष्ठ विद्वान् ब्राह्मण रहते थे, जो विष्णु-व्रतपरायण थे, वे गृहस्थ थे, दीन थे तथा स्त्री-पुत्रवान् थे । वे भिक्षा-वृत्ति से अपना जीवन-यापन करते थे । उनका नाम शतानन्द था । एक समय वे भिक्षा माँगने के लिए जा रहे थे । उन विनीत एवं अतिशय शान्त शतानन्द को मार्ग में एक वृद्ध ब्राह्मण दिखायी दिये, जो साक्षात हरि ही थे ।om, ॐ उन वृद्ध ब्राह्मणवेषधारी श्रीहरि ने ब्राह्मण शतानंद से पूछा —‘द्विजश्रेष्ठ ! आप किस निमित्त से कहा जा रहे है ?’ शतानंद बोले –‘सौम्य ! अपने पुत्र-कलत्रादि के भरण-पोषण के लिये धन-याचना की कामना से मैं धनिकों के पास जा रहा हूँ ।’नारायण ने कहा — द्विज ! निर्धनता के कारण आपने दीर्घकाल से भिक्षा-वृत्ति अपना रखी है, इसकी निवृत्ति के लिये सत्यनारायणव्रत कलियुग में सर्वोत्तम उपाय है । इसलिए मेरे कथन के अनुसार आप कमलनेत्र भगवान् सत्यनारायण के चरणों की शरण-ग्रहण करें, इससे दारिद्र्य, शोक और सभी संतापों का विनाश होता है और मोक्ष भी प्राप्त होता है ।

करुणामूर्ति भगवान् के इन वचनों को सुनकर ब्राह्मण शतानंद ने पूछा — ‘ये सत्यनारायण कौन है ?’

ब्राह्मणरूपधारी भगवान् बोले — नानारूप धारण करनेवाले, सत्यव्रत, सर्वत्र व्याप्त रहनेवाले तथा निरञ्जन वे देव इस समय विप्र का रूप धारणकर तुम्हारे सामने आये हैं । इस महान दुःखरूपी संसार-सागर में पड़े हुए प्राणियों को तारने के लिये भगवान् के चरण नौकारूप हैं । जो बुद्धिमान् व्यक्ति हैं, वे भगवान् की शरण में जाते हैं, किन्तु विषयों से व्याप्त विषयबुद्धिवाले व्यक्ति भगवान की शरण में न जाकर इसी संसार-सागर में पड़े रहते हैं ।
दुःखोदधिनिमग्नां तरणिश्चरणौ हरेः ।
कुशलाः शरणं यान्ति नेतरे विषयत्मिकाः ॥ (प्रतिसर्गपर्व २ । २५ । १०)

इसलिये द्विज ! संसार के कल्याण के लिये विविध उपचारों से भगवान् सत्यनारायण-देव की पूजा, आराधना तथा ध्यान करते हुए तुम इस व्रत को प्रकाश में लाओ ।

विप्ररुपधारी भगवान् के ऐसा कहते ही उस ब्राह्मण शतानन्द ने मेघों के समान नीलवर्ण, सुन्दर चार भुजाओं में शंख, चक्र, गदा तथा पद्म लिये हुए और पीताम्बर धारण किये हुए, नवीन विकसित कमल के समान नेत्रवाले तथा मन्द-मन्द मधुर मुसकानवाले, वनमालायुक्त और भौंरों के द्वारा चुम्बित चरण-कमलवाले पुरुषोत्तम भगवान् नारायण के साक्षात दर्शन किये ।भगवान् की वाणी सुनने और उनका प्रत्यक्ष दर्शन करने से उस विप्र के सभी अङ्ग पुलकित हो उठे, आँखों में प्रेमाश्रु भर आये । उसने भूमिपर गिरकर भगवान् को साष्टाङ्ग प्रणाम किया और गद्गद वाणी से वह उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगा –

“प्रणमामि जगन्नाथं जगत्कारणकारणम् ।
अनाथनाथं शिवदं शरण्यमनघं शुचिम् ॥
अव्यक्तं व्यक्ततां यातं तापत्रयाविमोचनम् ॥
नमः सत्यनारायणायास्य कर्त्रे नमः शुद्धसत्वाय विश्वस्य भर्त्रे ।
करालाय कालाय विश्वस्व हर्त्रे नमस्ते जगन्मङ्गलायात्ममूर्ते ॥
धन्योऽस्म्यद्य कृतो धन्यो भवोऽद्य सफलोमम ।
वाङ्मनोऽगोचरो यस्त्वं मम प्रत्यक्षमागतः ॥
दिष्टं किं वर्णयाम्याहो न जाने कस्य वा फलम् ।
क्रियाहीनस्य मन्दस्य देहोऽयं फलवान् कृतः ॥”
(प्रतिसर्गपर्व २ । २५ । १५-१९)

‘संसार के स्वामी, जगत् के कारण के भी कारण, अनाथों के नाथ, कल्याण-मङ्गल को देनेवाले, शरण देनेवाले, पुण्यरूप, पवित्र, अव्यक्त तथा व्यक्त होनेवाले और आधिभौतिक, आधिदैविक तथा आध्यात्मिक तीनों प्रकार के तापों का समूल उच्छेद करनेवाले भगवान् सत्यनारायण को मैं प्रणाम करता हूँ । इस संसार के रचयिता सत्यनारायणदेव को नमस्कार है तथा विश्व का विनाश करनेवाले कराल महाकालस्वरुप को नमस्कार है । सम्पूर्ण संसार का मङ्गल करनेवाले आत्ममूर्तिस्वरुप हे भगवन ! आपको नमस्कार है । आज मैं धन्य हो गया, पुण्यवान् हो गया, आज मेरा जन्म लेना सफल हो गया, जो कि मन-वाणी से अगम-अगोचर आपका मुझे प्रत्यक्ष दर्शन हुआ । मैं अपने भाग्य की क्या सराहना करूँ । न जाने मेरे किस पुण्यकर्म का यह फल था, जो मुझे आपके दर्शन हुए । प्रभो ! आपने क्रियाहीन इस मन्द-बुद्धि के शरीर को सफल कर दिया ।’

लोकनाथ ! रमापते ! किस विधि से भगवान् सत्यनारायण का पूजन करना चाहिये, विभो ! कृपाकर उसे भी आप बतायें । संसार को मोहित करनेवाले भगवान् नारायण मधुर वाणी में बोले — ‘विपेंद्र ! मेरी पूजा में बहुत अधिक धन की आवश्यकता नहीं, अनायास जो धन प्राप्त हो जाय, उसी से श्रद्धापूर्वक मेरा यजन करना चाहिये । जिस प्रकार मेरी स्तुति से, स्मृति से ग्राह-ग्रस्त गजेन्द्र, अजामिल संकट से मुक्त हो गये, इसी प्रकार इस व्रत के आश्रय से मनुष्य तत्काल क्लेशमुक्त हो जाता है । इस व्रत की विधि को सुनें —

अभीष्ट कामना की सिद्धि के लिये पूजा की सामग्री एकत्रकर विधिपूर्वक भगवान् सत्यनारायण की पूजा करनी चाहिये । सवा सेर के लगभग गोधूम(गेहूँ)-चूर्ण में दूध और शक्कर मिलाकर, उस चूर्ण को घृत से युक्तकर हरि को निवेदित करना चाहिये, यह भगवान् को अत्यन्त प्रिय है । पञ्चामृत के द्वारा भगवान् शालग्राम को स्नान कराकर गन्ध, पुष्प, धुप, दीप, नैवेद्य तथा ताम्बुलादि उपचारों से मन्त्रों द्वारा उनकी अर्चना करनी चाहिये । अनेक मिष्टान्न तथा भक्ष्य-भोज्य पदार्थों एवं ऋतुकालोद्भुत विविध फलों तथा फूलों से भक्तिपूर्वक पूजा करनी चाहिये । फिर ब्राह्मणों तथा स्वजनों के साथ मेरी कथा, राजा (तुङ्गध्वज) के इतिहास, भीलों की और वणिक (साधू) की कथा को आदरपूर्वक श्रवण करना चाहिये । कथा के अनन्तर भक्तिपूर्वक सत्यदेव को प्रणामकर प्रसाद का वितरण करना चाहिये । तदनन्तर भोजन करना चाहिये । मेरी प्रसन्नता द्रव्यादि से नहीं, अपितु श्रद्धा-भक्ति से ही होती है ।

विपेंद्र ! इस प्रकार जो विधिपूर्वक पूजा कहते है, वे पुत्र-पौत्र तथा धन-सम्पत्ति से युक्त होकर श्रेष्ठ भोगों का उपभोग करते है और अन्त में मेरा सांनिध्य प्राप्त कर मेरे साथ आनन्दपूर्वक रहते है । व्रती जो-जो कामना करता है, वह उसे अवश्य ही प्राप्त हो जाती है ।

इतना कहकर भगवान् अन्तर्धान हो गये और वे ब्राह्मण भी अत्यन्त प्रसन्न हो गये । मन-ही-मन उन्हें प्रणाम कर वे भिक्षा के लिये नगर की ओर चले गये और उन्होंने मन में यह निश्चय किया कि ‘आज भिक्षा में जो धन मुझे प्राप्त होगा, मैं उससे भगवान् सत्यनारायण की पूजा करूँगा ।’

उस दिन अनायास बिना माँगे ही उन्हें प्रचुर धन प्राप्त हो गया । वे आश्चर्यचकित हो अपने घर आये । उन्होंने सारा वृतान्त अपनी धर्मपत्नी को बताया । उसने भी सत्यनारायण के व्रत-पूजा का अनुमोदन किया । वह पति की आज्ञा से श्रद्धापूर्वक बाजार से पूजा की सभी सामग्रियों को ले आयी और अपने बन्धु-बान्धवों तथा पड़ोसियों को भगवान् सत्यनारायण की पूजा में सम्मिलित होने के लिये बुला ले आयी । अनन्तर शतानन्द ने भक्तिपूर्वक भगवान् की पूजा की । कथा की समाप्तिपर प्रसन्न होकर उनकी कामनाओं को पूर्ण करने के उद्देश्य से भक्तवत्सल भगवान् सत्यनारायणदेव प्रकट हो गये । उनका दर्शनकर ब्राह्मण शतानन्द ने भगवान् से इस लोक में तथा परलोक में सुख तथा पराभक्ति की याचना की और कहा — ‘हे भगवन ! आप मुझे अपना दास बना लें ।’ भगवान् भी ‘तथास्तु’ कहकर अन्तर्धान हो गये । यह देखकर कथा में आये सभी जन अत्यन्त विस्मित हो गये और ब्राह्मण भी कृतकृत्य हो गया । वे सभी भगवान् को दण्डवत् प्रणामकर आदरपूर्वक प्रसाद ग्रहणकर ‘यह ब्राह्मण धन्य है, धन्य है’ इसप्रकार कहते हुए अपने-अपने घर चले गये । तभी से लोक में यह प्रचार हो गया कि भगवान् सत्यनारायण का व्रत अभीष्ट कामनाओं की सिद्धि प्रदान करनेवाला, क्लेशनाशक और भोग-मोक्ष को प्रदान करनेवाला है ।
(सत्यनारायणव्रत – कथा’ का द्वितीय अध्याय)
(अध्याय २५)

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १९ से २१
3. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १९ से २१

4. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय – अध्याय २०
5. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय ७
6. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १
7. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २
8. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ३
9. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ४
10. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ५
11. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ६
12. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ७
13. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ८
14. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ९
15. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १०
16. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ११
17. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १२
18. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १३
19. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १४
20. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १५
21. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १६
22. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १७
23. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १८
24. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १९
25. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २०
26. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २१
27. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २२
28. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २३
29. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २४

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