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भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २९
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — द्वितीय भाग)
अध्याय – २९
सत्य-धर्म के आश्रय से सबका उद्धार
(लीलावती एवं कलावती की कथा)

सूतजी ने कहा — ऋषियों ! अध्यात्मिक, आधिदैविक तथा आधिभौतिक – इन तीनों तापों को हरण करनेवाले भगवान् विष्णु के मङ्गलमय चरित्र को जो सुनते हैं, वे सदा हरि के धाम में निवास करते हैं, किन्तु जो भगवान् का आश्रय नहीं ग्रहण करते — उन्हें विस्मृत कर देते हैं, उन्हें कष्टमय नरक प्राप्त होता है । भगवान् विष्णु की पत्नी का नाम कमला (लक्ष्मी) है । om, ॐइनके चार पुत्र है — धर्म, यज्ञ, राजा और चोर । ये सभी लक्ष्मी-प्रिय हैं अर्थात् ये लक्ष्मी की इच्छा करते है । ब्राह्मणों और अतिथियों को जो दान दिया जाता है, वह धर्म कहा जाता है, उसके लिये धन की आवश्यकता है । स्वाहा और स्वधा के द्वारा जो देवयज्ञ और पितृयज्ञ किया जाता है, वह यज्ञ कहा जाता है, उसमें भी धन की अपेक्षा होती है । धर्म और यज्ञ की रक्षा करनेवाला राजा कहलाता है, इसलिये राजाको भी लक्ष्मी – धनकी अपेक्षा रहती है । धर्म और यज्ञ को नष्ट करनेवाला चोर कहलाता है, वह भी धन की इच्छासे चोरी करता है । इसलिए ये चारों किसी-न-किसी रूपमें लक्ष्मी के किंकर है । परन्तु जहाँ सत्य रहता है, वहीँ धर्म रहता है और वहीँ लक्ष्मी भी स्थिर-रूपमें रहती है ।वह वणिक् सत्य-धर्म से च्युत हो गया था (उसने सत्यनारायण का व्रत न कर प्रतिज्ञा-भंग की थी) इसीलिये राजा ने उस वणिक के घर से भी सारा धन हरण करवा लिया और घर में चोरी भी हो गयी । बेचारी उसकी पत्नी लीलावती एवं पुत्री कलावती के साथ अपने वस्त्र-आभूषण तथा मकान बेचकर जैसे-तैसे जीवन-यापन करने लगी ।
एक दिन उसकी कन्या कलावती भूख से व्याकुल होकर किसी ब्राह्मण के घर गयी और वहाँ इसने ब्राह्मण को भगवान् सत्यनारायण की पूजा करते हुए देखा । जगन्नाथ सत्यदेव की प्रार्थना करते हुए देखकर उसने भी भगवान् से प्रार्थना की — ‘हे सत्यनारायण देव ! मेरे पिता और पति यदि घ रपर आ जायेंगे तो मैं भी आपकी पूजा करुँगी ।’ उसकी बात सुनकर ब्राह्मणों ने कहा — ‘ऐसा ही होगा ।’ इस प्रकार सुनकर ब्राह्मणों से आश्वासनयुक्त आशीर्वाद प्राप्त कर वह अपने घर वापस आ गयी । रात्रि में देर से लौटने के कारण माता ने उससे डाँटते हुए पूछा कि ‘बेटी ! इतनी रात तक तुम कहाँ रही ?’ इसपर उसने उसे प्रसाद देते हुए सत्यनारायण के पूजा-वृतान्त को बताया और कहा — ‘माँ ! मैंने वहाँ सुना कि भगवान् सत्यनारायण कलियुग में प्रत्यक्ष फल देनेवाले हैं, उनकी पूजा मनुष्यगण सदा करते हैं । माँ ! मैं भी उनकी पूजा करना चाहती हूँ, तुम मुझे आज्ञा प्रदान करो । मेरे पिता और स्वामी अपने घर आ जायें, यही मेरी कामना है ।’

रात में ऐसा मन में निश्चयकर प्रातः वह कलावती शीलपाल नामक एक वणिक् के घरपर धन प्राप्त करने की इच्छा से गयी और उसने कहा — ‘बन्धो ! थोडा धन दें, जिससे मैं भगवान् सत्यनारायण की पूजा कर सकूँ ।’ यह सुनकर शीलपाल ने उसे पाँच अशर्फियाँ दीं और कहा — ‘कलावती ! तुम्हारे पिता का कुछ ऋण शेष था, मैं उन्हें ही वापस कर रहा हूँ, इसे देकर आज मैं उऋण हो गया ।’ यह कहकर शीलपाल गया-तीर्थ में श्राद्ध करने चला गया । कन्या ने अपनी माँ लीलावती के साथ उस द्रव्य से कल्याणप्रद सत्यनारायण-व्रत का श्रद्धा-भक्ति से विधिपूर्वक अनुष्ठान किया । इससे सत्यनारायण भगवान् संतुष्ट हो गये ।

उधर नर्मदा-तटवासी राजा अपने राजमहल में सो रहा था । रात्रि के अन्तिम प्रहर में ब्राह्मण-वेशधारी भगवान् सत्यनारायण स्वप्न में उससे कहा — ‘राजन ! तुम शीघ्र उठकर उन निर्दोष वणिकों को बन्धनमुक्त कर दो । वे दोनों बिना अपराध के ही बंदी बना लिये गये हैं । यदि तुम ऐसा नहीं करोगे तो तुम्हारा कल्याण नहीं होगा ।’ इतना कहकर वे अन्तर्हित हो गये । राजा निद्रा से सहसा जग उठा । वह परमात्मा का स्मरण करने लगा । प्रातःकाल राजा अपनी सभा में आया और उसने अपने मन्त्री से देखे गये स्वप्न का फल पूछा । महामन्त्री ने भी राजा से कहा — ‘राजन ! बड़े आश्चर्य की बात हैं, मुझे भी आज ऐसा ही स्वप्न दिखलायी पड़ा । अतः उस वणिक् और उसके जामाता को बुलाकर पूछ-ताछ कर लेनी चाहिये ।’ राजा ने उन दोनों को बंदी-गृह से बुलवाया और पूछा — ‘तुम दोनों कहाँ रहते हो और तुम कौन हो ?’ इस पर साधु वणिक् ने कहा — ‘राजन ! मैं रत्नपुर का निवासी एक वणिक् हूँ । मैं व्यापार करने के लिये यहाँ आया था । पर दैववश आपके सेवकों ने हमें चोर समझकर पकड़ लिया । साथ में यह मेरा जामाता है । बिना अपराध के ही हमें मणि-मुक्ता की चोरी लगी है । राजेन्द्र ! हम दोनों चोर नहीं हैं । आप भली-भाँति विचार कर लें ।’ उसकी बातें सुनकर राजा को बड़ा पश्चाताप हुआ । उन्होंने उन्हें बन्धनमुक्त कर दिया । अनेक प्रकार से उन्हें अलंकृत कर भोजन कराया और वस्त्र, आभूषण आदि देकर उनका सम्मान किया । साधु वणिक् ने कहा — ‘राजन ! मैंने कारागार में अनेक कष्ट भोगे हैं, अब मैं अपने नगर जाना चाहता हूँ, आप मुझे आज्ञा दें ।’ इस पर राजा ने कोषाध्यक्ष के माध्यम से साधु वणिक् की नौका रत्नों आदि से परिपूर्ण करवा दी । फिर वह साधु वणिक् अपने जामाता के साथ राजा द्वारा सम्मानित हो द्विगुणित धन लेकर रत्नपुर की ओर चला ।

साधु वणिक् ने अपने नगर के लिये प्रस्थान किया, पर भगवान् सत्यनारायण का पूजन वह उस समय भी भूल गया । भगवान् सत्यदेव ने जो कलियुग में तत्काल फल देते हैं, पुनः तपस्वी का रूप धारणकर वहाँ आकर उससे पुछा — ‘साधो ! तुम्हारी इस नौका में क्या है ?’ इसपर साधु वणिक् ने उत्तर दिया — ‘आपको देने के लिये कुछ भी धन मेरे पास नहीं है । नाव में केवल कुछ लताओं के पत्ते भरे पड़े हैं ।’ साधु वणिक् के ऐसा कहने पर तपस्वी ने कहा — ‘ऐसा ही होगा ।’ इतना कहकर तपस्वी अन्तर्धान हो गये । उनके ऐसा कहते ही नौका में धन के बदले केवल पत्ते ही दीखने लगे । यह सब देखकर साधु अत्यन्त चकित एवं चिन्तित हो गया, उसे मूर्च्छा-सी आ गयी । वह अनेक प्रकार से विलाप करने लगा । वज्रपात होने के समान वह स्तब्ध होकर सोचने लगा कि मैं अब क्या करूँ ? कहाँ जाऊँ ? मेरा धन कहाँ चला गया ? जामाता के समझाने बुझाने पर इसे तपस्वी का शाप समझकर वह पुनः उन्हीं तपस्वी की शरण में गया और गले ने कपड़ा लपेटकर उस तपस्वी को प्रणाम कर कहा — ‘महाभाग ! आप कौन हैं ? कोई गन्धर्व हैं या देवता हैं या साक्षात परमात्मा हैं ? प्रभो ! मैं आपकी महिमा को लेशमात्र भी नहीं जानता । आप मेरे अपराधों को क्षमा कर दें और मेरी नौका के धन को पुनः पूर्ववत् कर दे ।’ इसपर तपस्वी-रूप भगवान् सत्यनारायण ने कहा कि तुमने चन्द्रचूड राजा के सत्यनारायण के मण्डप में ‘संतति के प्राप्त होने पर भगवान् सत्यदेव की पूजा करूँगा’ – ऐसी प्रतिज्ञा की थी । तुम्हे कन्या प्राप्त हुई, उसका विवाह भी तुमने किया, व्यापार से धन भी प्राप्त किया, बंदी-गृह से तुम मुक्त भी हो गये, पर तुमने भगवान् सत्यनारायण की पूजा कभी नहीं की । इससे मिथ्था-भाषण, प्रतिज्ञा-लोप और देवता की अवज्ञा आदि अनेक दोष हुए, तुम भगवान् का स्मरण तक भी नहीं करते । इसी कारण हे मूढ़ ! तुम कष्ट भोग रहे हो । सत्यनारायण भगवान् सर्वव्यापी हैं, वे सभी फलों को देनेवाले हैं । उनका अनादर कर तुम कैसे सुख प्राप्त कर सकते हो । तुम भगवान् को याद करो, उनका स्मरण करो ।’ इस पर साधु वणिक् को भगवान् सत्यनारायण का स्मरण हो आया और वह पश्चाताप करने लगा । उसके देखते-ही-देखते वहाँ वे तपस्वी भगवान् सत्यनारायण रूप में परिवर्तित हो गये और तब वह उनकी इस प्रकार स्तुति करने लगा –

सत्यरूपं सत्यसन्धं सत्यनारायणं हरिम् ।
यत्सत्यत्वेन जगतस्तं सत्यं त्वां नमाम्यहम् ॥
त्वन्मायामोहितात्मानो न पश्यन्त्यात्मनः शुभम् ।
दुःखाम्भोधौ सदा मना दुःखे च सुखमानिनः ॥
मूढोऽहं धनगर्वेण मदान्धीकृतलोचनः ।
न जाने स्वात्मनः क्षेमं कथं पश्यामि मूढधीः ॥
क्षमस्व मम दौरात्म्यं तपोधाम्ने हरे नमः ।
आज्ञापयात्मदास्यं मे येन ते चरणौ स्मरे ॥ (प्रतिसर्गपर्व २ । २९ । ४८-५१)

‘सत्यस्वरुप, सत्यसंध, सत्यनारायण भगवान् हरि को नमस्कार है । जिस सत्यसे जगत की प्रतिष्ठा है, उस सत्यस्वरूप आपको बार-बार नमस्कार है । भगवन ! आपकी मायासे मोहित होने के कारण मनुष्य आपके स्वरुप को जान नहीं पाता और इस दुःखरूपी संसार-समुद्र को सुख मानकर उसीमें लिप्त रहता है । धन के गर्वसे मैं मूढ़ होकर मदान्धकार से कर्तव्य और अकर्तव्य की दृष्टि से शून्य हो गया । मैं अपने कल्याण को भी नहीं समझ पा रहा हूँ । मेरे दौरात्म्य-भाव के लिये आप क्षमा करें । हे तपोनिधे ! आपको नमस्कार है । कृपासागर ! आप मुझे अपने चरणों का दास बना लें, जिससे मुझे आपके चरणकमलों का नित्य स्मरण होता रहे ।’

इस प्रकार स्तुति कर उस साधु वणिक् ने एक लाख मुद्रा से पुरोहित के द्वारा घर आकर सत्यनारायण की पूजा करने के लिये प्रतिज्ञा की । इस पर भगवान् ने प्रसन्न होकर कहा — ‘वत्स ! तुम्हारी इच्छा पूर्ण होगी, तुम पुत्र-पौत्र से समन्वित होकर श्रेष्ठ भोगों को भोगकर मेरे सत्यलोक को प्राप्त करोगे और मेरे साथ आनन्द प्राप्त करोगे ।’ यह कहकर भगवान् सत्यनारायण अन्तर्हित हो गये और साधु ने पुनः अपनी यात्रा प्रारम्भ की ।

सत्यदेव भगवान् से रक्षित हो वह साधु वणिक् एक सप्ताह में नगर के समीप पहुँच गया और उसने अपने आगमन का समाचार देने के लिये घर पर दूत भेजा । दूत ने घर आकर साधु वणिक् की स्त्री लीलावती से कहा — ‘जामाता के साथ सफल-मनोरथ साधु वणिक् आ रहे हैं ।’ वह साध्वी लीलावती कन्या के साथ सत्यनारायण भगवान् की पूजा कर रही थी । पति के आगमन को सुनकर उसने पूजा वहीं पर छोड़ दी और पूजा का शेष दायित्व अपनी पुत्री को सौपकर वह शीघ्रता से नौका के समीप चली आयी । इधर कलावती भी अपनी सखियों के साथ सत्यनारायण की जैसे-तैसे पूजा समाप्तकर बिना प्रसाद लिये ही अपने पति को देखने के लिये उतावली हो नौका की ओर चली गयी ।

भगवान् सत्यनारायण के प्रसाद के अपमान से जामाता सहित साधु वणिक् की नौका जल के मध्य अलक्षित हो गयी । यह देखकर सभी दुःख में निमग्न हो गये । साधु वणिक् भी मुर्च्छित हो गया । कलावती भी यह देखकर मुर्च्छित हो पृथ्वी पर गिर पड़ी और उसका सारा शरीर आँसुओं से भीग गया । वह हवा के वेग से हिलते हुए केले के पत्ते के समान काँपने लगी । हा नाथ ! हा कान्त ! कहकर विलाप करने लगी और कहने लगी – ‘हे विधाता ! आपने मुझे पति से वियुक्त कर मेरी आशा तोड़ दी । पति के बिना स्त्री का जीवन अधूरा एवं निष्फल है ।’ कलावती आर्तस्वर में भगवान् सत्यनारायण से बोली — ‘हे सत्यसिंधो ! हे भगवान् सत्यनारायण ! मैं अपने पति के वियोग में जल में डूबनेवाली हूँ, आप मेरे अपराधों को क्षमा करें । पति को प्रकट कर मेरे प्राणों की रक्षा करें ।’ (इस प्रकार जब वह अपने पति के पादुकाओं को लेकर जल में प्रवेश करनेवाली ही थी) उसी समय आकाशवाणी हुई — ‘हे साधो ! तुम्हारी पुत्री ने मेरे प्रसाद का अपमान किया है । यदि वह पुनः घर जाकर श्रद्धापूर्वक प्रसाद को ग्रहण कर ले तो उसका पति नौका सहित वहाँ अवश्य दीखेगा, चिन्ता मत करो ।’ इस पर आश्चर्यचकित हो कलावती ने वैसा ही किया और उसे उसका पति पुनः अपनी नौका सहित दीखने लगा । फिर क्या था ? सभी परस्पर आनन्द से मिले और घर आकर साधु वणिक् ने एक लाख मुद्राओं से बड़े समारोहपूर्वक भगवान् सत्यदेव की पूजा की और आनन्द से रहने लगा । पुनः कभी भगवान सत्यदेव की उपेक्षा नहीं की । उस व्रत के प्रभाव से पुत्र-पौत्र-समन्वित अनेक भोगों का उपभोग करते हुए सभी स्वर्गलोक चले गये । इस इतिहास को जो मनुष्य भक्तिपूर्वक सुनता है, वह भी विष्णु का अत्यन्त प्रिय हो जाता है । अपनी मनःकामना की सिद्धि प्राप्त कर लेता है ।

सूतजी बोले – ऋषिगणों ! मैंने सभी व्रतों में श्रेष्ठ इस सत्यनारायण-व्रत को कहा । ब्राह्मण के मुख से निकला हुआ यह व्रत कलिकाल में अतिशय पुण्यप्रद है ।
(‘सत्यनारायणव्रत – कथा’ का षष्टम अध्याय)
(अध्याय २९)

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १९ से २१
3. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १९ से २१

4. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय – अध्याय २०
5. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय ७
6. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १
7. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २
8. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ३
9. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ४
10. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ५
11. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ६
12. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ७
13. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ८
14. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ९
15. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १०
16. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय ११
17. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १२
18. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १३
19. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १४
20. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १५
21. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १६
22. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १७
23. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १८
24. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय १९
25. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २०
26. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २१
27. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २२
28. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २३
29. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २४
30. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २५
31. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २६
32. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २७
33. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व द्वितीय – अध्याय २८

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