भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय ४ से ५
ॐ श्रीपरमात्मने नमः
श्रीगणेशाय नमः
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय
भविष्यपुराण
(प्रतिसर्गपर्व — प्रथम भाग)
अध्याय – ४ से ५
म्लेच्छवंशीय राजाओं का वर्णन तथा म्लेच्छ-भाषा आदि का संक्षिप्त परिचय

शौनक ने पूछा — त्रिकालज्ञ महामुने ! उस प्रद्योत ने कैसे म्लेच्छ-यज्ञ किया ? मुझे यह सब बतलायें ।

श्रीसूतजी ने कहा — महामुने ! किसी समय क्षेमक के पुत्र प्रद्योत हस्तिनापुर में विराजमान थे । उस समय नारदजी वहाँ आये । उनको देखकर प्रसन्न हो राजा प्रद्योत ने विधिवत् उनकी पूजा की । सुखपूर्वक बैठे हुए मुनि ने राजा प्रद्योत से कहा — ‘म्लेच्छों के द्वारा मारे गये तुम्हारे पिता यमलोक को चले गये हैं । म्लेच्छ यज्ञ के प्रभाव से उनकी नरक से मुक्ति होगी और उन्हें स्वर्गीय गति प्राप्त होगी । om, ॐअतः तुम म्लेच्छ यज्ञ करो ।’ यह सुनकर राजा प्रद्योत की आँखे क्रोध से लाल हो गयी । तब उन्होंने वेदज्ञ ब्राह्मणों को बुलाकर कुरुक्षेत्र में म्लेच्छ-यज्ञ को तत्काल आरम्भ करा दिया । सोलह योजन में चतुष्कोण यज्ञ-कुण्ड का निर्माणकर देवताओं का आवाहन कर उस राजा ने म्लेच्छों का हनन किया । ब्राह्मणों को दक्षिणा देकर अभिषेक कराया । इस यज्ञ के प्रभाव से उनके पिता क्षेमक स्वर्गलोक चले गये । तभी से राजा प्रद्योत सर्वत्र पृथ्वीपर म्लेच्छहन्ता (म्लेच्छों को मारनेवाले) नाम से प्रसिद्ध हो गये । उनका पुत्र वेदवान् नाम से प्रसिद्ध हुआ ।

म्लेच्छ रूप में स्वयं कलि ने ही राज्य किया था । अनन्तर कलि ने अपनी पत्नी के साथ नारायण की पूजाकर दिव्य स्तुति की; स्तुति से प्रसन्न होकर नारायण प्रकट हो गये । कली ने उनसे कहा — ‘हे नाथ ! राजा वेदवान् के पिता प्रद्योत ने मेरे स्थान का विनाश कर दिया है और मेरे प्रिय म्लेच्छों को नष्ट कर दिया हैं ।’भगवान ने कहा — कले ! कई कारणों से अन्य युगों की अपेक्षा तुम श्रेष्ठ हो । अनेक रूपों को धारणकर मैं तुम्हारी इच्छा को पूर्ण करूँगा । आदम नाम का पुरुष और ह्व्यवती (हौवा) नाम की पत्नी से म्लेच्छवंशों की वृद्धि करनेवाले उत्पन्न होंगे । यह कहकर श्रीहरि अन्तर्धान हो गये और कलियुग को इससे बहुत आनन्द हुआ । उसने नीलाचल पर्वत पर आकर कुछ दिनों तक निवास किया ।

राजा वेदवान् को सुनन्द नाम का पुत्र हुआ और बिना संतति के ही वह मृत्यु को प्राप्त हुआ । इसके बाद आर्यावर्त देश सभी प्रकार क्षीण हो गया और धीरे-धीरे म्लेच्छों का बल बढ़ने लगा । तब नैमिषारण्य निवासी अठासी हजार ऋषि-मुनि हिमालय पर चले गये और वे बदरी-क्षेत्र में आकर भगवान् विष्णु की कथा-वार्ता में संलग्न हो गये ।

सूतजी ने पुनः कहा — मुने ! द्वापर युग के सोलह हजार वर्ष शेष काल में आर्य-देश की भूमि अनेक कीर्तियों से समन्वित रही; पर इतने समय में कहीं शुद्र और कहीं वर्णसंकर राजा भी हुए । आठ हजार दो सौ दो वर्ष द्वापर युग के शेष रह जाने पर यह भूमि म्लेच्छ देश के राजाओं के प्रभाव में आने लग गयी । म्लेच्छों का आदि पुरुष आदम, उसकी स्त्री हव्यवती (हौवा) दोनों इन्द्रियों का दमनकर ध्यानपरायण रहते थे । ईश्वर ने प्रदान नगर के पूर्वभाग में चार कोसवाला एक रमणीय महावन का निर्माण किया । पापवृक्ष के नीचे जाकर कलियुग सर्प-रूप धारण कर हौवा के पास आया । उस धूर्त कलि ने हौवा को धोखा देकर गूलर के पत्तों में लपेटकर दूषित वायुयुक्त फल उसे खिला दिया, जिससे विष्णु की आज्ञा भंग हो गयी । इससे अनेक पुत्र हुए, जो सभी म्लेच्छ कहलाये । आदम पत्नी के साथ स्वर्ग चला गया । उसका श्वेत नाम से विख्यात श्रेष्ठ पुत्र हुआ, जिसकी एक सौ बारह वर्ष की आयु कही गयी है । उसका पुत्र अनुह हुआ, जिसने अपने पिता से कुछ कम ही वर्ष शासन किया । उसका पुत्र कीनाश था, जिसने पितामह के समान राज्य किया । महल्लल नाम का उसका पुत्र हुआ, उसका पुत्र मानगर हुआ । उसको विरद नाम का पुत्र हुआ और अपने नाम से नगर बसाया । उसका पुत्र विष्णु-भक्ति-परायण हनूक हुआ । फलों का हवन कर उसने अध्यात्मतत्व का ज्ञान प्राप्त किया । म्लेच्छ-धर्म-परायण वह सशरीर स्वर्ग चला गया । इसने द्विजों के आचार-विचार का पालन किया और देवपूजा भी की, फिर भी वह विद्वानों के द्वारा म्लेच्छ ही कहा गया । मुनियों के द्वारा विष्णुभक्ति, अग्निपूजा, अहिंसा, तपस्या और इन्द्रियदमन – ये म्लेच्छों के धर्म कहे गये हैं । हनूक का पुत्र मतोच्छिल हुआ । उसका पुत्र लोमक हुआ, अन्त में उसने स्वर्ग प्राप्त किया । तदनन्तर उसका न्यूह नाम का पुत्र हुआ, न्यूह के सीम, शम और भाव – ये तीन पुत्र हुए । न्यूह आत्म-ध्यान-परायण तथा विष्णु-भक्त था । किसी समय उसने स्वप्न में विष्णु का दर्शन प्राप्त किया और उन्होंने न्यूह से कहा – ‘वत्स ! सुनो, आज से सातवे दिन प्रलय होगा । हे भक्तश्रेष्ठ ! तुम सभी लोगों के साथ नाव पर चढ़कर अपने जीवन की रक्षा करना । फिर तुम बहुत विख्यात व्यक्ति बन जाओगे । भगवान् की बात मानकर उसने एक सुदृढ़ नौका का निर्माण कराया, जो तीन सौ हाथ लम्बी, पचास हाथ चौड़ी और तीस हाथ ऊँची थी और सभी जीवों से समन्वित थी । विष्णु के ध्यान में तत्पर होता हुआ वह अपने वंशजो के साथ उस नावपर चढ़ गया । इसी बीच इन्द्रदेव ने चालीस दिनों तक लगातार मेघों से मूसलधार वृष्टि करायी । सम्पूर्ण भारत सागरों के जल से प्लावित हो गया । चारों सागर मिल गए, पृथ्वी डूब गयी, पर हिमालय पर्वत का बदरी-क्षेत्र पानी से ऊपर ही रहा, वह नहीं डूब पाया । अट्ठासी हजार ब्रह्मवादी मुनिगण, अपने शिष्यों के साथ वही स्थिर और सुरक्षित रहें । न्यूह भी अपनी नौका के साथ वहीँ आकर बच गये । संसार के शेष सभी प्राणी विनष्ट हो गये । उस समय मुनियों ने विष्णुमाया की स्तुति की ।
मुनियों ने कहा – ‘महाकाली को नमस्कार हैं, माता देवकी को नमस्कार हैं, विष्णुपत्नी महालक्ष्मी को, राधादेवी को और रेवती, पुष्पवती तथा स्वर्णवती को नमस्कार है । कामाक्षी, माया और माता को नमस्कार है । महावायु के प्रभाव से – मेघों के भयंकर शब्द से एवं उग्र जल की धाराओं से दारुण भय उत्पन्न हो गया है । भैरवि ! तुम इस भय से हम किंकरों की रक्षा करो ।’ देवी ने प्रसन्न होकर जल की वृद्धि को तुरंत शान्त कर दिया । हिमालय की प्रान्तवर्ती सिषिणा नाम की भूमि एक वर्ष में जल के हट जाने पर स्थल के रूप में दीखने लगी । न्यूह अपने वंशजों के साथ उस भूमि पर आकर निवास करने लगा ।

शौनक ने कहा — मुनीश्वर ! प्रलय के बाद इस समय जो कुछ वर्तमान है, उसे अपनी दिव्य दृष्टि के प्रभाव से जानकार बतलायें ।

सुतजी बोले — शौनक ! न्यूह नाम का पूर्वनिर्दिष्ट म्लेच्छ राजा भगवान् विष्णु की भक्ति में लीन रहने लगा, इससे भगवान् विष्णु ने प्रसन्न होकर उसके वंश की वृद्धि की । उसने वेद-वाक्य और संस्कृत से बहिर्भुत म्लेच्छ-भाषा का विस्तार किया और कलि की वृद्धि के लिये ब्राह्मी भाषा ब्राह्मी को लिपियों का मूल माना गया है । राजा न्यूह के हृदय में स्वयं प्रविष्ट होकर भगवान् विष्णु ने उसकी बुद्धि को प्रेरित किया, इसलिये उसने अपनी लिपि को उलटी गति से दाहिने से बायीं ओर प्रकाशित किया, जो उर्दू, अरबी, फारसी और हिब्रू की लेखन-प्रक्रिया में देखी जाती है को अपशब्दवाली भाषा बनाया और उसने अपने तीन पुत्रों – सीम, शम तथा भाव के नाम क्रमशः सिम, हाम तथा याकूत रख दिये । याकूत के सात पुत्र हुए – जुम्र, माजूज, मादी, यूनान, तुवलोम, सक तथा तीरास । इन्हीं के नाम पर अलग-अलग देश प्रसिद्ध हुए । जुम्र के दस पुत्र हुए । उनके नामों से भी देश प्रसिद्ध हुए । यूनान की अलग-अलग संताने इलीश, तरलीश,कित्ती और हुदा — इन चार नामों से प्रसिद्ध हुई तथा उनके नाम से भी अलग-अलग देश बसे । न्यूह के द्वितीय पुत्र हाम (शम) से चार पुत्र कहे गये है — कुश, मिश्र, कुज, कनाआँ । इनके नाम पर भी देश प्रसिद्ध हैं । कुश के छः पुत्र हुए – सवा, हबील, सर्वत, उरगम, सवतिका और महाबली निमरुह । इनकी भी कलन, सिना, रोरक, अक्वद, बावुन और रसनादेशक आदि संताने हुई । इतनी बातें ऋषियों को सुनाकर सूतजी समाधिस्थ हो गये ।

बहुत वर्षों के बाद उनकी समाधि खुली और वे कहने लगे – ‘ऋषियों ! अब मैं न्यूह के ज्येष्ठ पुत्र राजा सिम के वंश का वर्णन करता हूँ, म्लेच्छ राजा सिम ने पाँच सौ वर्षों तक भली-भाँति राज्य किया । अर्कन्सद उसका पुत्र था, जिसने चार सौ चौंतीस वर्षों तक राज्य किया । उसका पुत्र सिंहल हुआ, उसने भी चार सौ साठ वर्षों तक राज्य किया । उसका पुत्र इब्र हुआ, उसने पिता के समान ही राज्य किया । उसका पुत्र फलज हुआ, जिसने दो सौ चालीस वर्षों तक राज्य किया । उसका पुत्र रऊ हुआ, उसने दो सौ सैंतीस वर्षों तक राज्य किया । उसके जुज नामक पुत्र हुआ, पिता के समान ही उसने राज्य किया । उसका पुत्र नहुर हुआ, उसने एक सौ साठ वर्षों तक राज्य किया । हे राजन ! अनेक शत्रुओं का भी उसने विनाश किया । नहुर का पुत्र ताहर हुआ, पिताके समान उसने राज्य किया । उसके अविराम, नहुर और हारन – ये तीन पुत्र हुए ।

हे मुने ! इस प्रकार मैंने नाममात्र से म्लेच्छ राजाओं के वंशों का वर्णन किया । सरस्वती के शाप से ये राज म्लेच्छ-भाषा-भाषी हो गये और आचार अधम सिद्ध हुए । कलियुग में इनकी संख्या मे विशेष वृद्धि हुई, किन्तु मैंने संक्षेप में ही इन वंशों का वर्णन किया । संस्कृत-भाषा भारतवर्ष में ही किसी तरह बची रही । अन्य भागों में म्लेच्छ भाषा ही आनन्द देनेवाली हुई ।

सूतजी पुन: बोले — भार्गवतनय महामुने शौनक ! तीन सहस्र वर्ष कलियुग के बीत जाने पर अवन्ती नगरी में शङ्ख नाम का एक राजा हुआ और म्लेच्छ देश में शकों का राजा राज्य करता था । इनकी अभिवृद्धि का कारण सुनो । दो हजार वर्ष कलियुग के बीत जाने पर म्लेच्छवंश की अधिक वृद्धि हुई और विश्व के अधिकांश भाग की भूमि म्लेच्छमयी हो गयी तथा भाँती-भाँती के मत चल पड़े । सरस्वती का तट ब्रह्मावर्त-क्षेत्र ही शुद्ध बचा था । मुशा नाम का व्यक्ति म्लेच्छों का आचार्य और पूर्व पुरुष था । उसने अपने मत को सारे संसार में फैलाया । कलियुग के आने से भारत में देवपूजा और वेदभाषा प्रायः नष्ट हो गयी । भारत में भी धीरे-धीरे प्राकृत और म्लेच्छ भाषा का प्रचार प्रारम्भ हुआ । व्रजभाषा और महाराष्ट्री – ये प्राकृत के मुख्य भेद हैं । यावनी औरत गुरुण्डिका (अंग्रेजी)— म्लेच्छ-भाषा के मुख्य भेद हैं । इन भाषाओं के और भी चार लाख सूक्ष्म भेद हैं । प्राकृत में पानीय को पानी और बुभुक्षा को भूख कहा जाता है । इसी तरह से म्लेच्छ भाषा में पितृ को पैतर-फादर और भ्रातृ को बादर-ब्रदर कहते हैं । इसी प्रकार आहुति को आजु, जानु को जैनु, रविवार को संडे, फाल्गुन को फरवरी और षष्टि को सिक्सटी कहते हैं । भारत में अयोध्या, मथुरा, काशी आदि पवित्र सात पुरियाँ हैं, उनमें भी अब हिंसा होने लग गयी है । डाकू, शबर, भिल्ल तथा मुर्ख व्यक्ति भी आर्यदेश – भारतवर्ष में भर गये हैं । म्लेच्छदेश में म्लेच्छ-धर्म को माननेवाले सुख से रहते हैं । यही कलियुग की विशेषता है । भारत और इसके द्वीपों में म्लेच्छों का राज्य रहेगा, ऐसा समझकर हे मुनिश्रेष्ठ ! आपलोग हरि का भजन करें ।
(अध्याय ४-५)

See Also :-

1.  भविष्यपुराण – ब्राह्म पर्व – अध्याय २१६
2. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व प्रथम – अध्याय १९ से २१
3. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व द्वितीय – अध्याय १९ से २१

4. भविष्यपुराण – मध्यमपर्व तृतीय – अध्याय २०
5. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय १
6. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय २
7. भविष्यपुराण – प्रतिसर्गपर्व प्रथम – अध्याय ३

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